जब मैं ब्रिटिश-गायना में था, तब डच-गायना की राजधानी सुरी नाम के भारतीयों ने मुझे वहाँ की दशा देखने के लिए बुलाया था। ये भारतीय इस सुदूर निर्जन देश में अपनी मातृभूमि से विस्मृत होकर रहते हैं। उनके निमंत्रणा पर मैं वहाँ 14 जून सन् 1928 को पहुँचा और इस उपनिवेश में दो मास तक रहा। मैंने अपने इस प्रवास-काल में तेईस ग्रामों की यात्रा की, और भित्र-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न विषयों पर—जैसे वैदिक संस्कृति, भारतीय दर्शन, भारतीय सभ्यता, एकता, शिक्षा, प्रेम, शराब की बुराइयाँ, सच्चा धर्म आदि—सैंतालीस व्याख्यान दिए। प्रत्येक स्थान में सफलता पूर्वक सभाएँ हुई और लोगों ने प्रेम-पूर्वक मेरा स्वागत किया। यहाँ के सरकारी स्कूलों कि हेड मास्टरों ने और बहुत से कोठियों कि मालिकों ने भी मेरे प्रति सद्भाष प्रदर्शित किए, जिनके लिए मैं उनका आभारी हूँ। मैं यही के उच्च गर्वनर तथा उनकी धर्मपत्नी लेडी स्टजर्स का बड़ा कृतज्ञ है, क्योंकि उन्होंने मुझे न केवल पारस्परिक विचार परिवर्तन का ही अवसर दिए, बल्कि मेरी सभाओं में पधारने की भी कृपा की। इतना ही नहीं, बल्कि उन्होंने मुझे समस्त डच-गायना में घूमने के लिए जहाज़ और रेलवे का फ़स्ट क्लास का पास भी दे दिया था।
यहाँ के भारतीयों की आर्थिक दशा के संबंध में मुझे मालूम हुआ कि कुछ कोठियों कि भारतीय तो अवश्य ही अच्छी दशा में है, परंतु बहुत से स्थान कि भारतीयों की दशा संतोषजनक नहीं है, और सरकार तथा स्टेटों कि मालिकों को उनके प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करने की आवश्यकता है। गत महायुद्ध के बाद से सभी देशों में आर्थिक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई हैं। बाज़ारों का कारवार मंदा हो गया। डच-गायना के भारतीयों पर भी, जो अधिकांश में धान और कोको की खेती करनेवाले हैं, इसका प्रभाव पड़ा है। वे अपना तथा मज़दूरों का ख़र्च चलाने में असमर्थ है, इसलिए वे सरकार की सहानुभूति के पात्र हैं।
कुछ ग़रीब भारतीयों ने मुझसे इस बात की शिकायत की कि उन्हें सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरी सहायता मुफ़्त में नहीं मिलती। उनकी यह शिकायत न्यायोचित है, क्योंकि सभी जगह ग़रीब लोग सरकार से डॉक्टरी सहायता मुफ़्त पाया करते है। मैं आशा करता हूँ कि डच-सरकार उनकी इस शिकायत पर ध्यान देगी।
यहाँ की सरकार पिछले तीस वर्षों से भारतीयों को उनकी भाषा में शिक्षा दे रही है। इसलिए वे अपनी संस्कृति और अपनी भारतीयता अपने धर्म और अपने रीत-रिवाजों को जीवित बनाए हैं। अब सरकार स्कूलों से हिंदुस्तानी भाषा को उठा देना चाहती है और पुराने-पुराने हिंदुस्तानी शिक्षकों को बरख़ास्त कर देना चाहती है। अभी तक डच-सरकार भारतीयों के प्रति उदारता दिखलाती रही है, मगर यदि बालकों को उनकी मातृभाषा न पढ़ाई जाएगी और वे अपनी प्राचीन गाथाएँ और संस्कृति भूल जाएँगे, तो वे उतने लाभदायक और राजभक्त न रहेंगे, इसलिए मैं विश्वास करता हूँ कि डच-सरकार इस बात पर पुनः विचार करेगी।
डच-सरकार ने भारतीयों की इन शिकायतों को जो अब तक दूर नहीं किया है, उसका मुख्य कारण यह है कि यह उपनिवेश अब तक स्वावलंबी नहीं है। सरकार को प्रति वर्ष 30 साल गिल्डर (डच सिक्का) की हानि होती है, इसीलिए सरकार ख़र्च में कमी कर रही है। परंतु हिंदी-टीचरों को डिसमिस करने के बजाए दो अन्य उपायों से भी यह कमी दूर की जा सकती है। एक तो यह कि शराब, तंबाकू आदि चीनों पर टैक्स लगाकर, और दूसरे उपनिवेश की उत्पादक शक्ति और द्रव्य साधनों का यथोचित उपयोग करके वहाँ पर सोने की खाने, बलाढ़ा (रबर) आदि चीज़ें बहुतायत से मिलती हैं। यदि सरकार विशेषज्ञों का एक कमीशन बिठाकर उनकी जाँच कराने और उनका समुचित उपयोग करने का प्रबंध करे तो सरकार को भी कमी पूरी हो जाए और सैकड़ों प्रजा-जनकी भी रोटी चलने लगे।
सभी जगह भारतीय अपनी मेहनत, कड़े परिश्रम, मालिकों के प्रति स्वामिभक्ति और सरकार के प्रति राजभक्ति के लिए प्रसिद्ध है। कई एक मिशनरी पादरियों ने उनके इन गुणों की प्रशंसा की है। मुझसे ट्रिनीडाड के गवर्नर ने कहा था कि बिना भारतीयों की सहायता के न तो ट्रिनीडाड बस ही सकता था और न उपजाऊ ही हो सकता था। ब्रिटिश-गायना सरकार अपने यहाँ और भी भारतीय प्रवासियों को लाकर बसाना चाहती है, और इसके लिए उन्हें सब प्रकार की सुविधा दे रही है। आगामी वर्ष में संभवतः चार भारतीय नेताओं का कमीशन ब्रिटिश-गायना की सरकार से इस विषय में बातचीत करने के लिए आनेवाला है। डच-सरकार भी इस सुअवसर से लाभ उठा सकती है और लाभदायक उद्योगों में भारतीयों की सेवाएँ और मेहनत का उपयोग करके उपनिवेशकों स्वावलंबी बना सकती है।
कुछ भारतीयों ने मुझसे जहाज़ के संबंध में शिकायत की। जाँच करने पर मुझे मालूम हुआ कि उनकी यह शिकायत अनुचित है। सरकार ने उनसे यह शर्त की थी कि उनकी शर्तबंदी की मियाद समाप्त होने पर या तो उन्हें भारतवर्ष वापस आने का मुफ़्ती जहाज़ मिल जाएगा, या यदि वे डच-गायना ही में रहना चाहेंगे, तो उन्हें एक सौ गिल्डर मिल जाएँगे। अधिकांश कुलियों ने बिना किसी प्रकार के डर या दबाव के एक सौ गिल्डर सेना स्वीकार कर लिया। इसलिए वे बिना किराए के भारत लौटने के अधिकारी नहीं रहे। इस हालत में उनकी शिकायत बेजा है। जहाज़ी कंपनियों ने किराये में जो वृद्धि की है, उसके लिए सरकार उत्तरदायी नहीं है। फिर भी डच-गायना में दो हज़ार व्यक्ति ऐसे हैं, जिन्हें बिना किराए के भारत लौटने का अधिकार है। सरकार को चाहिए कि जो लोग सचमुच में भारत लौटना चाहते हों, उनके लिए सुविधा कर दे।1
यहाँ कि भारतीय बड़े उदार और अतिथि-सेवी हैं। और उन्हें अपनी मातृभूमि भारत से बहुत प्रेम भी है, परंतु शिक्षा की कमी के कारण उनमें बहुत से दोष भी हैं। आशा है कि शिक्षा के प्रचार से ये दोष दूर हो जाएँगे।
अंत में मैं भारतोदय सभा और गोस्वामी रामप्रसाद भी को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मुझे सब प्रकार की सहायता दी।
- पुस्तक : विशाल-भारत वर्ष-3, भाग-4 (पृष्ठ 20)
- संपादक : बनारसीदास चतुर्वेदी, रामानंद चट्टोपध्याय
- रचनाकार : मेहता जैमिनि
- प्रकाशन : विशाल-भारत कार्यालय
- संस्करण : 1930
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