एक गिटार-गीत
ek gitar geet
तुम्हारी मीठी धुन के साथ
मैं खिंचता चला आया इतनी दूर
गाँव के खलिहान
रात के द्वार तक।
तुम्हारी स्वर्णिम मुस्कान की पहेली
बूझने के लिए शब्द नहीं पास मेरे,
सीतारों की झिलमिल रोशनी
क्षण-भर, तैर जाती तुम्हारे चेहरे पर
लगता जैसे किसी दैवी प्यार की चमक
उतरी हो चेहरे पर!
उस ऊँची पहाड़ी से
जहाँ रोशनी करती है विश्राम
मैंने देखा,
तुम्हारे चमकीले कपड़ों की चमक मटमैली होती
और तुम्हारे बालों का जूड़ा खुलते
जैसे चावल के खेतों की छाया तले
टपक पड़ा हो सूरज!
इसी वक़्त घेर लेतीं चिंताएँ मुझे
पुरखों के डर, तेंदुओं से कहीं ज़्यादा चालाक
खेत का क्षितिज हो चमकीला कितना भी
मगर डर निकल नहीं पाता दिमाग़ से
और लगता
क्या हो गई है रात हमेशा के लिए?
और बिछड़ गए हम कभी न मिलने के लिए?
मैं इस मातृवत् धरती के
ख़ाली चक्राकार में
बहाऊँगा काले आँसू
सो जाऊँगा अपने आँसुओं के मौन में
और सोया रहूँगा तब तक
जब तक तुम्हारी झंकार का तार
दूधिया सवेरे के साथ
माथे पर टाँक नहीं देता
तुम्हारा मीठा चुंबन!
- पुस्तक : पुनर्वसु (पृष्ठ 69)
- संपादक : अशोक वाजपेयी
- रचनाकार : लियोपोल्ड सेडार सेंगोर
- प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
- संस्करण : 1989
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