यह असंभव है कि नगरों का एक ही-सा मूड
मौजूद रहे हर एक में। वरना, उन नगरों में
जहाँ मैं रहता बेचैन, जहाँ मैं रहता उदास,
कोई भी वहाँ नहीं रह पाता, चाहता नहीं रहना ख़ुशी-ख़ुशी।
वरना, न होते अनेक नगर, होता बस एक नगर,
वरना, न होते इतने कमरे, होता बस एक ही कमरा,
वरना न होते इतने कुटुंब, होता बस एक ही
कुटुंब, वरना, न होते इतने प्यार होता बस
एक ही प्यार। वरना, न होते इतने सारे मैं,
होता बस एकमेव मैं। यह असंभव है कि जो है
हर-एक में, हो ही वह हर-एक में। असंभव है
जीना लंबा ऐसे संसार में जो समझा ही नहीं जाता।
जुड़ गया मैं इस सब से, जैसे स्मृतियाँ, जैसे
मेरा जीवन, फिर भी एक महान् कलाकृति, भयावनी
कलाकृति, अब भी मुझ में सरसराती है। कला की यह कृति
पैर-पाँव चलती है, नगर में चलती है, इसलिए
हो जाओ सावधान तुम, जिसके ख़िलाफ़
यह बोलेगी। देख लिया मैंने संसार,
मगर, आज भी, नज़र रखे रहता हूँ।
- पुस्तक : दस आधुनिक हंगारी कवि (पृष्ठ 105)
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक गिरधर राठी, मारगित कोवैश
- प्रकाशन : वाग्देवी प्रकाशन
- संस्करण : 2008
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