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धुरंधर : दुख और जिन्न

दुख आदमी के जिस्म में दाख़िल होता है और फिर कभी नहीं निकलता। कोई मौलवी बताए, कोई हकीम समझाए, कोई फ़लसफ़ेबाज़ अपनी मोटी किताब खोलकर साबित करे—मगर दुख जाता नहीं। वो बदलता है। रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्द शरीर के दूसरे कंकाल की तरह लिपट जाता है—चुपचाप, अदृश्य। और फिर एक सुबह आदमी उठता है और पाता है कि वो दुख को नहीं ढो रहा—दुख उसे ढो रहा है। जो हम बाहर से देखते हैं और उसका मुक़द्दर कहते हैं—उसके कर्म, उसके जुर्म, उसकी हिंसा, उसकी आँखों की वो भूख जो हर चीज़ को निगल जाती है—वो सब दुख ही है, जिसने आख़िरकार अपने फेफड़े ढूँढ़ लिए, अपने जबड़े ढूँढ़ लिए, अपनी मुट्ठियाँ ढूँढ़ लीं और फिर बंदूक़ की ज़ुबान ढूँढ़ ली।

यही धुरंधर समझता है और उसके पास ये कहने की हिम्मत नहीं होती। वह खोज रहा है। अपना चेहरा।

एक

इन दोनों फ़िल्मों का जिन्न वो गैंगस्टर नहीं है, जो कराची के बेहया लौंडों पर हुकूमत करता है। बल्कि जिन्न वो पैंट-शर्ट पहने लड़का है, जिसे सबने छोड़ दिया था—नरक में जाने के लिए और अब वो उसी ज़ुबान में चिल्ला रहा है जो ज़ुबान उसे दी गई थी, जिंदा रहने के लिए।

दोनों फ़िल्मों में हमें बताया जाता है कि हमज़ा अली मज़ारी गैंगस्टर है, दहशत का मेमार है, ल्यारी के तख़्त पर क़ब्ज़ा करने वाला, भारत देश का देशभक्त है। यह ऊपरी सतह है। मगर बड़ी कहानियों में सतह सिर्फ़ एक नेवता होता है—अंदर आने के लिए। असली हमज़ा, जिसे स्क्रीनराइटर ने अपने किसी सबसे अँधेरे पहर में देखा और काग़ज़ पर उतारा—एक जिन्न है। और जिन्न क्या होता है? दो दुनियाओं के बीच फँसी रूह, जो न इधर की है न उधर की, जो भटकती है ऐसी ताक़तों के साथ जो उसे किसी तरह का सुकून देने में असमर्थ हैं।

एसपी असलम चौधरी जिन्न नहीं है। चौधरी के पास नफ़रत है, मक़सद है, क़ानून है, इंस्टीट्यूशन है। हमज़ा के पास सिर्फ़ उसका ज़ख़्म है—जिसे उसने ग़लती से अपनी पहचान मान लिया है।

पहली फ़िल्म ने अपनी दंतकथा एक अजीब किमियागरी से अर्जित की। मात्र तीन महीने पहले आई फ़िल्म ने 70 वर्षों की कहानी का खिताब अर्जित कर लिया। ल्यारी के गैंगवॉर—वो तंग गलियाँ जिन्हें तारीख़ ने ख़ून से भिगोया है—ने कहानी को एक ऐसी ज़मीन दी जो ख़ुद मातम में थी। और फिर वो ओल्ड सोल म्यूज़िक था—था तो बंबई का—लेकिन था पुराने कराची का वो सुर, जो इन जुर्मों की पिछली पीढ़ी का है। हिंसा के नीचे आँसुओं की तरह गले में उठता हुआ जैसे—किसी ऐसे जनाज़े में फ़ातिहा पढ़ी जाए, जिसका कोई हक़दार नहीं मगर सबको ज़रूरत है। दोनों फ़िल्में वही जनाजा हैं।

और फिर था अक्षय खन्ना—वो सबसे दिलचस्प चेहरा, जो हमेशा से ऐसा दिखता है—जैसे कोई बहुत भयानक बात याद कर रहा हो, जिस बात को बोलने की मनाही हो और राकेश बेदी, जो हिंदी सिनेमा की 30-40 साल की साझा स्मृति अपने जबड़े की बनावट में संजोए हुए है। इंस्टाग्राम ने उसे सूखी धरती की तरह पिया था। धुरंधर की वो धूम बनावटी नहीं थी। उस क़िस्म की धूम कभी बनावटी नहीं होती। वो पहचान थी, जो ज़्यादा गहरी चीज़ है। उस पहचान ने एक गिरजाघर खड़ा किया। अब उस गिरजाघर में रहना था। यह वही गिरजाघर है, जो अँग्रेज़ दोनों देशों को देकर गए थे। जीसस वाला नहीं। मनु वाला। दोनों देशों को अँग्रेज़ों ने अपना आख़िरी मनु दिया।

दो

दूसरी फ़िल्म उस आदमी की कहानी है—जिसे वो सब मिल गया, जिसके लिए उसने लड़ाई लड़ी और फिर मिली वो खोज, जो बहुत देर मेहनत करने के बाद, सब मिल जाने के बाद आती है और सब कुछ लेकर जाती है। फिर पता चलता है कि लड़ाई ही असली चीज़ थी। तख़्त नहीं। तख़्त कभी नहीं।

हमज़ा दुश्मनों को मारता है। हमज़ा मि. सान्याल का ख़्वाब पूरा करता है। हमज़ा को खुली छूट मिलती है, खुला रास्ता, अनगिनत गोलियाँ, अनगिनत सिगरेट और पूरा अधिकार। फिर वो अपनी तबाही पर निकलता है, और यहाँ फ़िल्म एक साथ अपनी सबसे बड़ी ग़लती और अपना सबसे बड़ा सच—दोनों उजागर करती है।

ग़लती यह—तबाही में एक भी किरदार को साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं मिलती। हमज़ा के अलावा सारे किरदार फ़र्नीचर हैं। निशाने हैं। हमज़ा की चीख़ों के बीच की ख़ामोशी है। ‘धुरंधर’ [2025] का संगीत धड़कता है और ‘धुरंधर द रिवेंज’ [2026] का संगीत तड़पता है, लेकिन कुछ नहीं पाता। एक्शन की कोरियोग्राफी होती है, ख़ून अमृत-मंथन की तरह निकलता है, लेकिन कुछ नहीं मिलता। सिनेमैटोग्राफी ख़ूबसूरत रोशनी में दर्द को फ़्रेम करती है और कुछ नहीं पाती। सब अपनी-अपनी अलगाई में उम्दा हैं—जैसे अलग-अलग हॉल में अलग-अलग कॉन्सर्ट बज रहे हों। अलग-अलग पट्टीदार एक ही घर में अलग-अलग दीवारें खड़ी कर रहे हों। आवाज़ फिर कानों में शोर बनकर पहुँचती है। परदे पर सारे किरदार सिगरेट का धुआँ ठाते हुए, ख़ून बिखेर रहे हैं और नीचे लिखा हुआ है—स्मोकिंग किल्स।

सबसे बड़ा सच यह—हमज़ा के दुख ने उसकी दुनिया के साथ क्या किया है। उसने अपने आस-पास सबको दुख का सामान बना दिया। प्यार को लेन-देन बना दिया, वफ़ादारी को पीपीएफ़ बना दिया, रहम को ऐसी कमज़ोरी जो उसे पाल नहीं सकता। ‘धुरंधर द रिवेंज’ का अकेलापन—जिस तरह हर किरदार सपाट हो जाता है—सिर्फ़ लेखनी की विफलता नहीं है। अपनी बेहतरीन व्याख्या में यह हमज़ा के दिमाग़ का बाहरी नक़्शा है। उसके दिमाग़ में एक ही इंसान है। हमेशा से एक ही था। और वो इंसान इतने लंबे अर्से से मर चुका है, या ग़ायब है, या एक साया है कि हमज़ा भूल गया है कि किसी और का चेहरा देखना कैसा लगता था।

तीन

और फिर आख़िरी सीन। आख़िरी सीन की बात वैसे करते हैं, जैसी उसकी हिकायत है—उस ख़ामोशी के साथ जो किसी मर्सिये के आख़िरी सुर के बाद आती है।

एक बड़ा आदमी। एक फ़ातेह। एक नाम जिसे ल्यारी फुसफुसाती है और कराची डरती है। और उस आख़िरी सीन में—फ़ातेह घुल जाता है। जो बचता है, वो गैंगस्टर नहीं है। जो बचता है, वो एक लड़का है—जिसका हर वो खिलौना छिन गया जो उसने चाहा था। और वो नहीं समझता, नहीं समझ सकता, कि वे खिलौने गए कहाँ—क्योंकि उसने इतनी लड़ाई लड़ी, उसने अपने भीतर का हर नरम कोना जला दिया, हर वो रास्ता राख कर दिया जो किसी गर्माहट तक जाता था, सब उन खिलौनों के लिए। दुख मुकम्मल है। वो अब ज़ख़्म नहीं रहा। वो अब आदमी है।

उस आदमी को जीवन में क्या मिला? अपने ख़ालीपन की ठीक-ठीक शक़्ल मिली, एक बादशाहत के आकार में। वो बादशाहत जो मुट्ठी में आई, कंठ ना लगी। उसे हासिल होने की उस घड़ी में वो दरयाफ़्त करता है कि जो चाहा वो कभी, वो चीज़ ही नहीं थी—वो सिर्फ़ चाह थी।

दोस्तोयवस्की इस आदमी को जानता था। उसने रस्कोलनिकोव के बारे में लिखा—‘Crime and Punishment’—जिसने हत्या पैसे के लिए नहीं की, बल्कि अपने बारे में गढ़ी एक थ्योरी के लिए की। उसने रोगोझिन के बारे में लिखा, ‘The Idiot’—जिसने उस औरत को तबाह किया, जिसे वो प्यार करता था क्योंकि उसके बिगड़े हुए बचपन ने कहीं प्यार और तबाही को एक ही हरकत बना दिया था। रूसी रूह और कराची की रूह इतनी दूर नहीं। दोनों को हिंसा ने यही तालीम दी कि कोमलता सिर्फ़ कमज़ोरों की विलासिता है। दोनों ने ज़िंदा रहने को जीत समझ लिया। दोनों अपनी कहानी के आख़िर में उन सारी चीज़ों के मलबे पर खड़े हैं, जो उन्होंने ख़ुद बनाया था और अपने लहूलुहान हाथों में वो ठीक-ठीक चीज़ थाम रहे हैं जो वो चाहते थे और कुछ महसूस नहीं हो रहा।

चार

एक आदमी है जिसे पुनीत सुपरस्टार कहते हैं—जो अपनी रील्स में, उस ईमानदारी के साथ जो सिर्फ़ जानबूझकर एक मूर्ख ही अफ़ोर्ड कर सकता है, पूछता है : इसमें मेरा क्या फ़ायदा? यह एक हास्यास्पद सवाल है। यह एकमात्र ईमानदार सवाल भी है। हमज़ा अली मज़ारी ने दो फ़िल्मों में इसका जवाब ढूँढ़ा। उसने ख़ून में, वफ़ादारी में, कराची में, महबूब की आँखों में, हर दुश्मन की टूटी हुई कमर में, सान्याल की आवाज़ में—जवाब इकट्ठा किया और जवाब जब आख़िरकार आया, वो उस आख़िरी सीन में हाथ जोड़कर उसके सामने बैठा, जो यह था : कुछ नहीं।

फ़ायदा कुछ नहीं था। सौदा हमेशा से जाली था इसलिए नहीं कि दुनिया ने हमज़ा को धोखा दिया—हालाँकि दिया। इसलिए नहीं कि सान्याल ने उसे इस्तेमाल किया—हालाँकि किया। बल्कि इसलिए कि दुख ख़र्च नहीं होता। वो सिर्फ़ बदलता है बार-बार, अपने नए रूपों में। और जो आदमी अपने दुख को अपना इंजन समझ लेता है, जो उस पर चलता है, जो कहता है यही ज़ख़्म मेरी ताक़त है, मेरा हक़ है, मेरा सबब है—उस आदमी के रास्ते एक दिन ख़त्म हो जाते हैं। उसे पता चलता है कि इंजन उसे नहीं चला रहा था—उसे खा रहा था।

‘धुरंधर’ और ‘धुरंधर द रिवेंज’ मिलाकर देखें तो एक ऐसे आदमी का चित्र हैं, जो अंदर से खाया जाता रहा और इसे जीना कहता रहा। चित्र असमान है। ‘धुरंधर द रिवेंज’ का कैनवास एक साथ बहुत भरा और बहुत ख़ाली है—घटनाओं से भरा, रूह से ख़ाली, सिवाय उस जगह के जहाँ हमज़ा खड़ा है। मगर हमज़ा का चित्र ख़ुद उन लम्हों में, जब फ़िल्म को याद आता है कि वो असल में किस बारे में है—तबाह कर देता है।

इसलिए नहीं कि वो बुरा है। इसलिए कि वो समझ में आता है। क्योंकि उसके सफ़र में—उस लड़के में जो जिन्न बन गया—हर उस आदमी की एक झलक है, जिसे कभी प्यार की जगह दुख मिला, और जो नहीं जानता था, नहीं जान सकता था, कि उस विरासत का क्या करें। हमज़ा का चेहरा सिर्फ़ एक सीन में सच दिखाता है—ड्रग्स से भरी पीड़ा की आँखें जो देखती हैं, वही हमज़ा है। दुख का चेहरा वही होता है।

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