विचारों का युग, सिनेमा, बौद्धिक संपदा और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस
ध्रुव हर्ष
24 मार्च 2026
गूगल के आने से दुनिया आसान हुई और तथ्यों की एक्सेसिबिलिटी बढ़ी। इस दौर में विजुअल नैरेटिव और पैडागॉजिकल टूल्स बहुत तेज़ी से बदल रहे हैं। दुनिया भर में कई सारी लाइब्रेरी और कॉलेजेस डिस्फ़ंक्शनल हो रहे हैं। ज़्यादातर लोग अपना ख़ासा वक़्त मोबाइल, इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक व अन्य सोशल साइट्स पर बिता रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में अब लोग महज़ फ़ॉर्मेलिटी के लिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराने जाते हैं। कम्युनिटी कल्चर सिकुड़ रहा है। लोगों के मैनरिज्म में बदलाव आए हैं। आज की पीढ़ी पिछले जनरेशन को आउटडेटेड मानती है। उनके बीच विरले ही संवाद देखने को मिलता है। आज सफल होने का मतलब है, अंधाधुंध पैसा कमाना। आप क्या पहनते हैं, कौन-सी गाड़ी से चलते हैं, आपका घर कैसा है, आपके पास बंगला है या डुप्लेक्स, आपके बच्चे किस स्कूल में पढ़ते हैं, उनका बोर्ड क्या है, क्या उनको फ़्रेंच और स्पेनिश आती है? ये सारे कैरेक्टेरिस्टिक्स तय करते हैं कि आप कितने सफल हैं। नतीजन हर इंसान ख़ुद को सफल बनाने की होड़ में लगा हुआ है। स्टेटस को मेंटेन करने के लिए लोग अपनी क्षमता से अधिक ख़र्च कर रहे हैं, और वो भी बस इसलिए क्योंकि उन्हें किसी और के जैसा दिखना है। आज लोगों में कैसे भी करके आगे बढ़ने की एक बेचैनी दिखाई देती है और ये बेचैनी ली हुई—ज़िद, कहीं से भी आपको सुकून नहीं देने वाली। ये क्षणिक आवेग हैं, जो आगे चलकर आपको निराश करेगी। कोविड के बाद लग रहा था, इंसान इस महामारी में अपनों को खोकर बहुत कुछ सीख लेगा; लेकिन ऐसा नहीं हुआ, मनुष्य और मैकेनिकल हो गया है। उसे लग रहा है कि फिर कहीं कुछ ऐसा हुआ तो हम भूखों मर जाएँगे। इस इनसिक्यूरिटी से लोग बहुत डरे हुए हैं, उसके स्वभाव में एक बड़ा बदलाव देखा जा सकता है। सेल्फ़ ऑब्सेशन बढ़ा है। अपने सर्वाइवल को लेकर मनुष्य पहले से ज़्यादा सजग हुआ है और अब वह किसी भी क़िस्म की फ़ैलेसी में जीता हुआ नहीं दिखाई देता है। जीवन में आपाधापी बढ़ी है। इंसान जीवन के दार्शनिक पहलू के बजाय पदार्थवादी चीज़ों के पीछे ज़्यादा आकर्षित दिखाई दे रहा है। कंज्यूमैरिज्म ने इस क़दर लोगों को अपनी गिरफ़्त में ले लिया है कि लोग अपने वजूद को इन कमोडिटीज़ के सापेक्ष देखने लगे हैं। ये अंधी रफ़्तार देखकर डर लगता है। हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अपने अस्तित्व के प्रकृति को समझते हैं। मिट्टी, पानी, हवा, और इस इकोलॉजी को जानने की कोशिश करते हैं। शहरों में रहने वाले न जाने ऐसे कितने लोग हैं, जिन्हें उगते हुए सूरज की रोशनी भी मयस्सर नहीं होती, कितनों ने सालों से सूनी सड़कें नहीं देखी होंगी, चिड़ियों का चहकना नहीं सुना होगा। शहरों के अपार्टमेंट्स घर नहीं—ब्रिक-जंगल हैं, जहाँ जस का तस लोग बस जी तो रहे हैं, लेकिन उनके चेहरे पर उदासी की एक लकीर खींची दिखाई देती है। इस बात को समझने के लिए ज़्यादा पीछे जाने की ज़रूरत नहीं है, अभी दो-तीन दशक पहले की बात कर रहा हूँ। आज के जो सो कॉल्ड ‘मिलेनियल्स’ हैं, वो अपने बचपन को अगर पलटकर देखें तो उन्हें अपने जीवन को लेकर बेफ़िक्री दिखेगी जिसके साथ वे बड़े हुए हैं। स्वच्छंदता के बिना जीवन को परिभाषित करना मुश्किल है, कभी-कभी बेतरतीब होना कितना ख़ूबसूरत होता है। जब मैं ख़ुद के जीवन को देखता हूँ तो पाता हूँ कि छोटी-छोटी चीज़ें कितनी ख़ुशी देती थीं। लोरियाँ, क़िस्सों और कहानियों को सुनकर ऐसा लगता था—जैसे हम किसी एक फ़ैटसी दुनिया के किरदार हों। आज अपने सामने आती नई ‘ज़ेन-जी’ पीढ़ी को देखता हूँ तो लगता है कि उनकी इन सब में कोई दिलचस्पी नहीं है, उनको ओरल स्टोरीज़ और फ़ोक कल्चर में कोई दिलचस्पी नहीं है बल्कि उन्हें कुछ और चाहिए। वे वेस्टर्न कॉमिक्स और वीडियो गेम्स देखकर बड़े हो रहे हैं। उनके हाथों में मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप है, और अपने चॉइसेस के मामले में वे काफ़ी स्पष्ट हैं।
आज टेक्निकल एडवांसमेंट ने लोगों को बहुत अकेला कर दिया है। अब आप किसी के पास बैठने में उकताते हो। ऐसे कितने नए बच्चे हैं जो अपने बाबा और दादी के साथ बैठते हैं? मैंने कई छोटे बच्चों को ये कहते हुए सुना है कि “पापा यार बोर मत करो!” आज की पीढ़ी अपने माँ-बाप से ज़्यादा अटेंशन बाहर के लोगों को देती है। इसका दोष किसी और पर नहीं बल्कि आज की पैरेंटिंग पर मढ़ा जा सकता है, और थोड़ा-सा समाज पर भी। हमारे यहाँ चिल्ड्रन लिटरेचर पढ़ने का कल्चर इथोस में नहीं है, दूसरी तरफ़ बच्चों पर फ़िल्में भी कम बनती हैं। मैं लेखन से जब फ़िल्मों में आया। शॉर्ट फ़िल्में और डाक्यूमेंट्री बनाते हुए, जब बात पहली फ़ीचर फ़िल्म बनाने की हुई तो मैंने बच्चों का विषय चुना। लिहाज़ा बच्चों के साथ काम करने का मौक़ा मिला। आप बच्चों से बहुत कुछ सीखते हो। शायद इसलिए अँग्रेज़ी के मशहूर रूमानी कवि वर्ड्सवर्थ कहते हैं, “द चाइल्ड इस फ़ादर ऑफ़ द मैन।” बच्चे सहजता से बड़ी से बड़ी बात आसानी से कह जाते हैं। मेरे फ़िल्म का विषय प्रेम और विश्वास था। फ़िल्म एक बच्चे और बकरे पर आधारित थी, जिसमें बच्चे का नाम फ़ैज़ान है और बकरे का नाम डोडू। फ़िल्म में फ़ैज़ान को डोडू से प्रेम हो जाता है और वह नहीं चाहता कि डोडू की बक़रीद पर क़ुर्बानी हो। मैं अपने फ़िल्म का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ ताकि मैं अपने समझ के अनुसार बच्चों के मनोविज्ञान पर एक दृष्टि डाल सकूँ। इस फ़िल्म के दौरान मैंने एक बच्चे के मनोविज्ञान और कहानी के प्रोग्रेशन के साथ-साथ उसके मेंटल एवोल्यूशन को बहुत क़रीब से देखा है। बच्चे की भावशून्यता और दृष्टि देखकर मुझे लगता था कि बच्चे ज़्यादा इनलाइटेंड होते हैं, एंड दिस इस कॉल्ड ‘प्यूरिटी’।
बदक़िस्मती से हमारे देश में बच्चों पर फ़िल्में कम बनती हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का एक पुराना वीडियो है, जिसमें वह बच्चों से संवाद करते हुए दिखाई देते हैं। वह कह रहे हैं, “हमारे देश में बच्चों पर फ़िल्में बननी चाहिए। यूरोपीय देशों ने इस पर बड़ा काम किया है।” इतालवी फ़िल्मकार और नव यथार्थवादी आंदोलन के अग्रणी विटोरियो डी सिका ने ‘बाइसिकल थीव्स (1948)’ जैसी बड़ी सुंदर फ़िल्म बनाई है। फ़्रेंच फ़िल्मकार व फ़्रांसीसी सिनेमा के नव तरंग के प्रवर्तकों फ़्राँस्वा रोनाल्द त्रुफ़ो ने ‘द 400 ब्लोज़ (1959)’ में एक बच्चे की मनोदशा पर बेहतरीन फ़िल्म बनाई है। ख़ैर इस क्षेत्र में ईरानी फ़िल्मकारों ने बड़ा काम किया है, जिसमें अब्बास किरोस्तामी, मजीद मजीदी और जफर पनाही बड़े उल्लेखनीय नामों में हैं, जिन्होंने बच्चों पर अच्छा काम किया है। जब भी चिल्ड्रन फ़िल्मों की बात होती है तो इन फ़िल्मकारों का नाम सबसे ऊपर रखा जाता है या कह लें इन्हीं का नाम ज़ेहन में आता है। इस क्षेत्र में BBC और HBO ने ब्रिटेन समेत दुनिया के तमाम क्लासिकल लिटरेचर पर फ़िल्में बनाई हैं। वहाँ के मेनस्ट्रीम अभिनेता और अभिनेत्रियों ने भी उन क्लासिक पर बनी फ़िल्मों में काम किया है। केट विंसलेट, ऍल पचिनो, मार्लन ब्रैंडो, मेरिल स्ट्रीप और बेन एफ्लेक ने ऐसी दर्जनों फ़िल्में की हैं जो शेक्सपियर, थॉमस हार्डी और लारेंस के उपन्यासों पर आधारित हैं। यूरोपीय देशों ने ख़ासकर, ब्रिटेन, अमेरिका, फ़्रांस, स्पेन, रसिया, पोलैंड व अन्य देशों ने फ़िल्मों में बड़ा काम किया है। उनके सॉफ़्ट पावर्स और लिटरेचर ने अमेरिकी और यूरोपीय देशों को ही नहीं बल्कि पूरी-पूरी दुनिया को सम्मोहित किया है।
अब जबकि सारी दुनिया डिजिटल हो रही है, ये समय विचारों का है—जब हमें अपने साहित्य, सिनेमा व अन्य कलात्मक विधाओं को डिजिटली संग्रहित करने की ज़रूरत है। हमारे लेखकों को अपने राइट्स (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) को लेकर ज़्यादा गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। आपको बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं है कि आपका एक छोटा-सा आइडिया कितने तरीक़े से, अलग-अलग माध्यमों में एक्सप्लॉइट किया जा सकता है। आपकी एक कहानी, कविता, उपन्यास का अनुवाद कितने अलग-अलग भाषाओं में किया जा सकता है, उनपर फ़िल्में बनाई जा सकती हैं। टी-सीरीज, सारेगामा, शीमारो जैसे बहुत सारे भारतीय यूट्यूब चैनल्स के पास न जाने कितने हज़ार और लाखों गानों की लिस्ट है, जिसके ऊपर इन चैनलों के अलावा कोई क्लेम नहीं कर सकता है। यहाँ तक कि ये चैनल्स गीतकारों को क्रेडिट तक भी नहीं देते। इसलिए कुछ भी लिखें तो सजग रहें। एक लेखक होने के नाते अपने अधिकार को समझना चाहिए। आजकल तमाम बाहरी कंपनियाँ, पब्लिकेशन हाउस लेखकों से उनके किताबों का अधिकार ख़रीदने के लिए लाखों-करोड़ों ख़र्च कर रही हैं, जिससे वो भविष्य में अरबों रुपये बनाएँगी। आजकल फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में आप सुनते होंगे कि किसी के कॉन्सेप्ट या स्टोरी पर किसी और ने फ़िल्म बना दी। जब आप क्लेम करते हैं तो आप ही से कहा जाता है कि आप प्रूव करिए कि ये आईडिया या स्टोरी आपकी है। यहाँ जिसके पास पैसा है, उसकी फ़िल्म और कहानी है भले ही वो कहानी या लेखन की ए बी सी डी भी न जानता हो। ऐसे कई प्रोडक्शन हाउस हैं, जिन्होंने तमाम लेखकों और स्क्रीन लेखकों की कहानियाँ हथिया लीं हैं। इसलिए हमें भविष्य में इन विषयों को लेकर ज़्यादा सजग रहने की ज़रूरत है।
दुनिया के डिजिटल होने से जहाँ एक तरफ़ चीज़ें आसान हुई हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इसके कंसीक्वेंसेस भी हैं या कह लें चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। आज लाखों-अरबों रुपये चंद सेकेंडों में इधर से उधर किए जा सकते हैं। आपने नेटफ़्लिक्स पर आई वेब सीरीज ‘जामताड़ा’ (2020) देखी होगी। स्कैम और क्राइम करने के तरीक़े बदले हैं। आपकी प्राइवेसी से छेड़छाड़ करके लोग आपको ब्लैकमेल करके किसी भी हद तक जाने के लिए उकसा सकते हैं। यक़ीन मानिए इस दौर में जिसके पास एंड्राइड है, वह इंसान नंगा है। हर किसी का फ़ुटप्रिंट उसके सोशल साइट, फ़ेसबुक, ईमेल, इंस्टाग्राम, ह्वाट्सऐप और ट्विटर (एक्स) पर मौजूद है, जिसे मिनटों में हैक किया जा सकता है। इस डिजिटल और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के दौर में कुछ भी डिकोड करना मुश्किल नहीं रहा। आज डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर बड़ी से बड़ी हत्याओं को अंजाम दिया जा सकता है, सीसीटीवी फ़ुटेज से छेड़छाड़ की जा सकती है।
सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है। टेक्नोलॉजी ने हमारे दिमाग़ को मैनीप्युलेट करना शुरू कर दिया है। अमेरिकी उद्योगपति और टेस्ला कंपनी के सीईओ एलन मस्क की कंपनी टेस्ला ने ऐसे रोबोट तैयार किए हैं, जिसके अंदर ए.आई. इनबिल्ट है। वे इंसानों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। यहाँ तक कि वे इंसानों की तरह अभिव्यक्ति भी दे सकते हैं। एक महिला रोबोट के साथ मस्क डेट पर भी गए, जिसका अनुभव उन्होंने बाद में दुनिया के साथ साझा किया। आय दिन नए-नए प्रोग्राम आ रहे हैं। डी फ़ेक, वॉइस मैनीपुलेशन, ए आइ इमेजेस जैसे तमाम टूल्स आ गए हैं, जिससे फ़ेस ऑफ़ किया जा सकता है। सूचना और तथ्यों को मैनीप्युलेट करके पूरे का पूरा नैरेटिव बदला जा सकते हैं। आजकल इन तकनीकों का इस्तेमाल पब्लिक का ओपिनियन बदलने के लिए भी बख़ूबी किया जा रहा है। हाल-फ़िलहाल आप देखते होंगे कि तमाम ऐतिहासिक तथ्य आपके सामने तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किए जा रहे हैं। जीवन अब पहले जैसा आसान नहीं रहा।
अगर थोड़ा ठहरकर देखें तो समझ में आएगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। जीवन तो है लेकिन उसका मूल तत्व इन बाहरी वैज्ञानिक अनुसंधानों की वजह से कहीं खो रहा है। जीवन दर्शन क्या है, ऐसे प्रश्नों से आज के इंसान का कोई साबका नहीं है। इस दौर में जहाँ इंसान तकनीकों का वशीभूत हो रहा है, वहीं दुनिया भर के तमाम लेखक इस पर चिंता जता रहे हैं। युवाल नोआ हरारी की नई किताब ‘नेक्सस’ दुनिया को आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस के बारे में आगाह कर रही है, वहीं दूसरी तरफ़ मशहूर अमेरिकी फ़िल्मकार जेम्स कैमरून ‘अवतार’ जैसी फ़िल्में बना रहे हैं। जिसमें इंसानों और नावियों (एक काल्पनिक इंडिजेनस कम्युनिटी) पर अपना सबसे फ़्यूचरिस्टिक काम कर रहे हैं। कैमरून की ये एलीमेंटल एंथोलॉजी एक बड़ा डिस्कोर्स पैदा करती है। उनकी दुनिया और उसका यथार्थ एक बार आपको बड़ा यूटोपियन लग सकता है, लेकिन आप इसके तह तक जाएँ तो आपको लगेगा कि इंडिजेनस होना यथार्थ के कितना क़रीब होना है और इंसान कैसे अमानवीय होता जा रहा है। जीवन में अब पहले जैसा रंगों का इंद्रधनुष नहीं दिखता और न ही रिश्तों में वैसी खनक नहीं दिखती है। संबंधों में वैसी बानगी अब एक आइडियल स्टेट है, या कह लें एक नॉस्टेलजिया, यही वजह है कि कोरोना काल में ‘गुल्लक’ और ‘पंचायत’ जैसे वेब शोज़ बड़े हिट हुए। कई दशकों बाद लोगों में तफ़सीली दिखी। लेकिन महामारी का असर जैसे ख़त्म हुआ, इंसान फिर से दौड़ने लगा। ये वो मनुष्य नहीं है जो कोरोना से पहले था बल्कि उसकी रफ़्तार और तेज़ हुई है। लोग पहले से ज़्यादा व्यक्तिनिष्ठ और महत्त्वाकांक्षी हुए हैं। सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है। समय का आकार छोटा हुआ है। बस ‘सिंगल क्लिक’ जैसे इडियम ने मनुष्य की मनोदशा को बदलकर रख दिया है। बातचीत और चिट-चैट करने के ढंग में परिवर्तन आया है। कविता, कहानी, उपन्यास लेखन की भाषा बदल रही है। सिनेमा में नए-नए प्रयोग हो रहे हैं। कहानी कहने के तरीक़े में तब्दीली आई है। कथानक में काफ़ी संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं। इस दौर की फ़िल्मों में एक अलग क़िस्म की रफ़्तार है। इस आपाधापी को, या कंटेंट की छोटी-छोटी क्लिपिंग को जो आप कुछ सेकंड्स या मिनटों में देख रहे हैं, ये हमारे समय को दीमक की तरह धीरे-धीरे टुकड़ों में चाट रहे हैं, और कहीं न कहीं हमें ये टेलीकॉम कंपनियाँ और डेटा कंज्यूम करने के लिए अपना आदी बना रही हैं। इसके फ़ायदे और नुक़सान दोनों हैं, इसलिए हमें इन बदलावों को मद्देनज़र रखते हुए समय के साथ थोड़ा साम्य स्थापित करने की ज़रूरत है। भाषाई (लिंग्विस्टिक) और अकादमिक संस्थानों को अपनी नई रूपरेखा तैयार करनी चाहिए। पहले लोग अनुभव को प्राथमिकता देते थे, लेकिन ये 21वीं सदी आइडिया पर चलने वाली है, जो तकनीकी बदलाव को बख़ूबी समझ रही है, आज के बच्चों को अपना अध्ययन (स्टडी) डिज़ाइन करना आता है और वे अपने लक्ष्य को लेकर ज़्यादा केंद्रित दिखते हैं। यहाँ तक कि कई मामलों में वे पिछले जेनेरेशन से ज़्यादा परिष्कृत हैं। बस हमें ज़रूरत है उनसे संवाद करने की, उनको समझने की, उनसे पूछने की। नई पीढ़ी के साथ संवाद करते हुए बतौर लेखक और फ़िल्मकार मैं इन बदलावों को महसूस कर पा रहा हूँ। चूँकि मैं ह्यूमैनिटीज़ का विद्यार्थी हूँ तो मेरे ज़्यादातर प्रश्न लिटरेचर और सिनेमा से होते हैं। मैंने देखा है कि आज के बच्चों का अपने विषय के अतिरिक्त अन्य विषयों में रुचि कम हुई है, लेकिन पॉप कल्चर में उनकी दिलचस्पी बढ़ी हैं। आज की पीढ़ी एक तरफ़ कैरी मिनाटी, भुवन बम और और ध्रुव राठी जैसे यूट्यूबर को सुनती है, तो दूसरी तरफ़ जस्टिन बीबर, लेडी गागा, कैटी पेरी और एड शेरेन के गाने भी सुनती है। जब से ओटीटी प्रकाश में आया है, लोगों का एक्सपोज़र बढ़ा है, सिनेमा के कंटेंट पर युवा पीढ़ी एक समझ के साथ बोलती है। इस दिशा में नेटफ़्लिक्स और अमेजन ने बड़ी पहल की है। आप कुछ भी देख सकते हैं, चाहे वो ब्रिटिश या स्कॉटिश ड्रामा हो या कोई पॉलिटिकल या साइकोलॉजिकल थ्रिलर। हम सबने कोविड के दौरान बहुत सारे शो और फ़िल्में बिंज वॉच की होंगी। अभी लोग चॉइस के मामले में पहले से ज़्यादा परिष्कृत हैं, आप उन्हें कुछ भी परोसकर मूर्ख नहीं बना सकते। आज लोग किसी भी फ़िल्म या किताब को उठाने से पहले उसका जिस्ट या रिव्यू देखते हैं। उनको माइथोलॉजी जाननी होती है तो वे मूल ग्रंथों का सहारा न लेकर कमेंट्री के लिए देवदत्त पटनायक को पढ़ते हैं। उनके हाथों में क्लासिक लिटरेचर की जगह अमीश त्रिपाठी, दुर्जोय दत्ता और चेतन भगत की किताबें दिखती हैं। धर्म के मामले में वे अपने स्वादानुसार ओशो और कृष्णमूर्ति को सुनते हैं। आज आध्यात्मिक और स्पिरिचुअल होना फ़ैशनेबल है। सभी मुक्ति की बात करते हैं, सुबह योग और ध्यान, दिन भर लाखों-करोड़ों बनाने के हज़ारों जतन और रस्साकसी, शाम को पब, कैफ़े और ख़ुद को ख़ुश रखने के अन्य व्यसन। आज का मानव मुक्त होकर जीना चाहता है। पहले से ज़्यादा स्वच्छंद, बिना किसी रोक टोक के। सही और ग़लत में फ़र्क़ के बिना। धर्म की अवधारणा थोड़ी धुंधली हुई है। अब लोग रियेक्ट करते हैं, कोई हिंदू इसलिए है क्योंकि यहाँ मुसलमान भी हैं, कोई मुसलमान इसलिए है क्योंकि वह जिन लोगों के साथ रहता है वो किसी और मज़हब से हैं। आपके अपराध को छुपाने के लिए मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च हैं। गंगा में पाप धुले जा सकते हैं, ये परिपाटी जब तक है तब तक इंसान पाप करता रहेगा और पुण्य के लिए रास्ते बनते रहेंगे, हालाँकि ये व्यवस्थाएँ अब पहले से जटिल हुई हैं। शायद पुण्य और प्रायश्चित जैसे शब्द न होते तो इंसान पाप न करता। आज धर्म के हिसाब से इंसानों को मैनिपुलेट करना आसान है, उन्हें मोबलाइज़ करना और भी। धर्म, राष्ट्र, जाति और सरहद आसान उपकरण हैं, जिसके नाम पर इंसानों को गुमराह किया जा सकता है। इस दौर में किसी समुदाय और धर्म को मैनीप्युलेट करने के लिए दुनिया भर में हज़ारों संस्थाएँ काम कर रही हैं। जैसा कि मैंने ऊपर कहा कि ये युग विचारों का युग है, तकनीकों का युग है, दृश्यों के रीक्रिएशन का युग है। यहाँ आपके विचार बदले जा सकते हैं, इमोशंस को डिकोड किया जा सकता है। दोस्त, दुश्मन बनाये जा सकते हैं। व्यक्ति को सोशली और मॉरली करप्ट किया जा सकता है। आपको हिप्नोटाइज़ करके आपके मस्तिष्क को पढ़ा जा सकता है। ए.आई. जैसे नए टूल आपके डेटा के आधार पर आपके व्यक्तित्व का साइकोएनालिसिस कर सकते हैं। आज इंसान अगर किसी वस्तु के साथ सबसे ज़्यादा इंटीमेट है तो वो है उसका मोबाइल फ़ोन। डी फ़ेक जैसे नए मेथड किसी लड़का या लड़की का पोर्नोग्राफ़िक रिप्रजेंटेशन कर सकते हैं। सच और झूठ में अंतर ख़त्म कर सकते हैं। क्राइम करके तथ्यों को मिटा सकते हैं। आज क्राइम करने का तरीक़ा बदला है। नई तकनीकों ने उन्हें और भी इक्विप्ड किया है, आज क्राइम और क्रिमिनल को आइडेंटिफ़ाई करना बहुत मुश्किल है। थ्रेट्स के तरीक़े बदले हैं।
दलाई लामा ने अपनी नई किताब ‘ऐन अपील टू द वर्ल्ड’ में कहा है कि “21वीं सदी संवाद की सदी है, हमें जाति-धर्म से निकलकर वैश्विक समस्याओं के बारे में सोचना चाहिए। प्रकृति के संतुलन और कार्बन इमिशन पर बात करनी चाहिए। दुनिया में भूख जैसी बड़ी महामारी से कैसे निजात पाया जाए, उस विषय पर बात करनी चाहिए।” लेकिन आज का इंसान ये सब कहाँ सुनने वाला। आज लाखों-करोड़ों किताबें लाइब्रेरियों के स्टैक्स में धूल फांक रही हैं। अब लोग ‘वेद’, ‘उपनिषद्’ और ‘गीता’, ‘कुरान’, ‘बाइबिल’, ‘तालमुद’ और ‘तोरा’ के बजाय इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक पर नए धर्मगुरुओं को इतनी तल्लीनता से सुनते हुए दिखाई देते हैं, जैसे वही इन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाएँगे।
शहरों का अकेलापन लोगों को एक अलग क़िस्म के अवसाद में ढकेल रहा है। लोगों की अपनों में दिलचस्पी कम हो रही है। वे अपने कुत्ते, बिल्लियों (पेट्स) के साथ ख़ुश हैं। अपने बूढ़े माता-पिता से ज़्यादा ख़याल लोग अपने बिल्ली और कुत्तों का कर रहे हैं, और इस बात को वे बख़ूबी जस्टिफ़ाई भी करते हैं। आजकल लोग दोस्त कम बनाते हैं। उनकी लाइफ़ स्टाइल ज़िमिंग और योगा तक सीमित है। बीमारियाँ बढ़ी है, जबकि लोग अपने फ़िटनेस को लेकर पहले से ज़्यादा सचेत दिखते हैं। स्प्रिचुअल टॉक्स में लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है, आजकल लोग लिबरल धर्म गुरु या प्रीचर्स को सुनना ज़्यादा पसंद करते हैं। गौर गोपाल दास, जग्गी वासुदेव जैसे बहुत सारे स्प्रिचुअल लीडर प्रकाश में आए हैं। इनका अनुकरण करने वाले पूरब और पश्चिमी दोनों देशों में हैं। इन्होंने ओशो और कृष्णमूर्ति से काफ़ी कुछ सीखा है। अपने स्टेटमेंट को लेकर रिजिड नहीं हैं, इनका सॉफ़्ट होना कोई मेगालोमानिया तो नहीं पैदा कर पा रहा है, लेकिन इससे इनका सर्वाइवल उतना जटिल नहीं है, ये भी कहीं न कहीं स्टेट और मेजोरिटी के साथ अलाइंड दिखते हैं। आज की पीढ़ी बहुत जल्दी रियेक्ट करती है, वैचारिक रूप से लोगों में मैंने काफ़ी रोष देखा है। इस बात को ये आध्यात्मिक गुरु (प्रीचर्स) बख़ूबी जानते हैं। इन्हें पता है कि पब्लिक को क्या चाहिए। ये शादी- ब्याह, प्रेम, सेक्स और एक्स्ट्रा मैरिटल संबंधों पर खुलकर बोलते हैं।
जो एक आइडियल सोसाइटी थी उसका स्ट्रक्चर टूट रहा है। सामाजिक अस्पष्टता (सोशल एम्बिगुइटी) बढ़ रही हैं। आजकल शहरों में लिव इन रिलेशनशिप, सिचुएशनशिप, फ़्रेंड्स फ़ॉर बेनिफ़िट जैसी चीज़ें बढ़ी हैं, एक्स्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर बढ़े हैं, डाइवोर्स की दर बढ़ी है। लोग कोम्प्रोमाइजिंग मोड में बिल्कुल भी नहीं हैं। थोड़ी-सी झड़प हुई कि मन-मुटाव कर लेते हैं और बात थोड़ी और बढ़ी तो अलगाव चुन लेते हैं। अब सेक्स उनके लिए एक्सक्लूसिव नहीं है। इमोशन शिफ़्ट हुआ है। लोग संवाद नहीं करते, न ही कुछ रिज़ॉल्व करने के मूड में हैं। बस सबको आगे बढ़ने की सनक है। आत्ममुग्धता लोगों को इस क़दर अपने ग्रिप में ले रहा है कि हर किसी को अटेंशन चाहिए, उसके लिए चाहे जो भी क़ीमत चुकानी पड़े। लोगों का रहन-सहन और पहनावा बदला है। न्यूज़ या रिव्यू के लिए लोग अब अख़बार और टीवी से ज़्यादा पॉडकास्ट, व्हाट्सएप, ट्विटर (एक्स) और फ़ेसबुक पर पोस्ट देखते हैं।
‘मैन एंड सुपरमैन’ में जॉर्ज बर्नाड शॉ मानव विकास की बात करते हैं, जो विज्ञान का ग़ुलाम है, और अपना दिमाग़ अनहद तक विकसित करना चाहता है। इंसान समय को अपने हिसाब से मोड़ना चाहता है। सुपरमैन फ़िल्म में नायक अपनी प्रेमिका को वापस ज़िंदा करने के लिए पृथ्वी को घुमा देता है। हमें ऐसा क्यों लग रहा है कि आज का मानव भी महामानव बनना चाहता है।
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बेला पॉपुलर
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