Font by Mehr Nastaliq Web

मन के बात

man ke baat

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    मन के बात बताई कइसे, कहँवाँ जाई

    लोग सुनी आ, सुन के आपन मुँह बिजुकाई

    एही से चुपचाप रहीं हम हरदम भाई

    अइसन कइले जग में होला बहुत हँसाई।

    दुख कहला से कम ना होला साँच परम बा

    बाकिर लोग भुला जाला सब अपना दुख में

    सब अपनहीं सहे के होला इहे धरम बा

    सह लेला पर समझेला सब बडुए सुख में।

    मानव मन चंचल बड़ होला, कहीं टिके ना

    छने अकासे खिले, छने भुइयाँ में होला

    अमन-चैन के छाँह मिलेला, कहीं बिके ना

    जे कइलस मनमानी कुइयाँ में होला

    आई जब संतोष मिली मेवा जन-जन के

    अमन-चैन लौटी तबहीं लोगिन के मन के।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 43)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY