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गाँव के सँवरिया

gaanv ke sanvriya

रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

और अधिकरामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’

    सोना जइसन पीयर नाहीं, नाहीं चाहीं करिया।

    हमरा के बर चाहीं गाँव के सँवरिया॥

    खेत बारी नीक होखे, होखे खरिहनवां।

    भरल परिवार होखे, ऊँच खनदनवां॥

    अमवां महुअवा के होखे जहाँ बरिया,

    हमरा के बर चाही गाँव के सँवरिया॥...

    बैला के जोड़ी होखे, होखे धेनु गइया।

    लमहर दुआर होखे बड़ अगनइया॥

    गाँव के नगीच होखे तलवा-पोखरिया,

    हमरा के बर चाही गाँव के संवरिया॥...

    दुअरा पर चाहीं घन निमिया के गँछिया।

    संझवा बिहान बइठें सासु जहाँ मचिया॥

    देवरू खेलत होखे अन्हरिया अंजोरिया,

    हमरा के बर चाहीं गाँव के संवरिया॥...

    हमके दहेज लोभी लोगवा ना चाहीं।

    मन में हो कोढ़ अइसन रोगवा ना चाहीं॥

    परत ना होखे जवनी घर में फंसरिया,

    हमरा के बर चाहीं गाँव के संवरिया।...

    प्रेम के 'अधीर' होखें हमरो सजनवां।

    गबडू जवान होखे भले हों किसनवां॥

    घर में भरल होखे अन्न से बखरिया,

    हमरा के बर चाहीं गाँव के संवरिया॥...

    स्रोत :
    • पुस्तक : गँउवा के माटी अनमोल (पृष्ठ 11)
    • रचनाकार : रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
    • प्रकाशन : अखिल भारतीय भोजपुरी समाज, गोमतीनगर, लखनऊ
    • संस्करण : 2010

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