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सरसरी : जाना था जापान, पहुँच गए चीन... उर्फ़ प्रतिनिधित्व का प्रश्न

दिल्ली साहित्यिक घटनाओं का एक सतही समुच्चय है। हालाँकि दिल्ली के बाहर भी ऐसी तमाम घटनाएँ होती ही रहती हैं; जिनसे साहित्य से सर्वथा जुदा लोग भी, जुदा न होने के भ्रम में जुड़े रहते हैं। हिंदी साहित्य में जिधर नज़र घुमाइए उधर कोई न कोई घटना घटती हुई मिलेगी, जिन्हें ‘तक-विशेषज्ञ’ कांड कहते हैं। 

इस नज़र घुमाने में ‘फ़ेसबुक’ पर सरसरी स्क्रॉल करते हुए मुझे ‘इंटरनेशल पोएट्री एंड लिट्रेचर फ़ेस्टिवल’ की ख़बर नज़र आई। चालीस देशों के कवि-लेखक-अनुवादक और लिट्ररेरी क्रिएटर्स, दो दिन एक शहर में फिर चार दिन क्रूज़ पर और उसी से अलग-अलग शहरों में। साहित्यिक चर्चा, कविता-पाठ और वर्कशॉप का टाइट शेड्यूल!  

उफ़्! व्हाट अ हेक्टिक शेड्यूल...! 

इसी हेक्टिक शेड्यूल में एक एंकर के रूप में ठीक से पहचाने गए अंजुम शर्मा की स्टोरी भी दिखी। वह छतरी में सोह रहे थे। मैंने सोचा कि दिल्ली में बारिश हुई होगी! ज़रा ग़ौर मारा तो मालूम हुआ कि वह चीन पहुँच गए हैं। बारिश के भारतीय दिनों में चीनी छतरियाँ बेहद राहत देती हैं। मैंने सोचा कि कैसा अन्योन्याश्रित संबंध निकल आया ज़रा-सी देर में। मैंने थोड़ा और जानने की कोशिश की तो कशिश हुई कि चीन में शर्मा हिंदी कविता-साहित्य के प्रतिनिधि स्वर बनकर गए हैं। मैंने सोचा हिंदी-चीनी भाई-भाई के चक्कर में चीनियों ने भाँग-वाँग भी पी ली क्या!

अब देखिए उत्तर में हिमालय के पार हमारा पड़ोसी मुल्क चीन, जहाँ गए वक़्तों में जाना कितना दुर्धर्ष था। फिर भी वह समय मनीषियों और उनकी प्रज्ञा के प्रतिनिधित्व का समय था। वह अपनी अप्रतिम जिज्ञासा और अदम्य जूझ से जो कुछ भी अलक्षित-अनुपलब्ध था, उसका अभिज्ञान करते और भारतीय वाङ्‌मय एवं संस्कृति को समृद्ध करते। 

सन् 67 ई. में बौद्ध संन्यासी मातंग और धर्मरक्ष ने चीन की यात्राएँ की थीं। वहाँ का राजदरबार और सामान्य जन उनसे बौद्ध-धर्म के प्रति आकर्षित-शिक्षित हुआ। पाँचवीं शताब्दी में भी कुछ भारतीय मनीषीयों ने चीन-यात्रा की थी, जिनमें प्रमुख रूप से कुमारजीव और परमार्थ का नाम आता है। चौथी शताब्दी में कूचा में जन्मे कुमारजीव बौद्ध-दर्शन के अध्येता, आचार्य और संस्कृत-ग्रंथों के अप्रतिम चीनी अनुवादक थे। असाधारण प्रतिभा के कुमारजीव ने 106 भारतीय धर्मग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया और परमार्थ ने 70 ग्रंथों का।

इतिहास-सम्मत उक्त सूचनाएँ देना यहाँ मेरी उपस्थिति का उत्स नहीं है। यहाँ कहने का आशय यह है कि हमारी संस्कृति के वाहक कभी इस प्रकार के मनीषी भी हुआ करते थे, जिनसे भारतीय मनीषा का औदात्य बहुत ढंग से मुल्क और उससे बाहर प्रचारित-प्रसारित-प्रचलित और व्याख्यायित होता था।

‘इंटरनेशल पोएट्री एंड लिट्रेचर फ़ेस्टिवल’ के ताज़ा कांड पर मेरे एक चीनी मित्र गु वेंग ने मुझसे पूछा कि यह क्या है! गु वेंग रसिक-चित्त हैं, पर कवियों के बारे में प्लेटो से सहमत हैं। हालाँकि वह सुकवियों को सम्मान से देखते हैं। वह अकवियों को कैसे देखेंगे, यह उनसे मैंने जानना चाहा...

मैंने कहा कि एक ‘एंकर’ इंटरनेशल पोएट्री एंड लिट्रेचर फ़ेस्टिवल में बतौर कवि हिंदी-कविता का प्रतिनिधित्व करने चीन चला गया; जबकि ख़ुद के मुल्क में उसने आज तक न कभी किसी ढंग की जगह पर अपना कविता-पाठ और न ही दूसरों ने उसका कविता-पाठ किया।  

गु वेंग ने कहा, “这有什么好惊讶的?[इसमें इतने आश्चर्य की क्या बात है!] हमारे ऑफ़िस में डु मिन भी ऐसा ही है। एकदम अयोग्य होने के बाद वह वहीं है, जहाँ उसे नहीं होना चाहिए।”

मैंने फिर एक सरसरी से चीन लिखकर सर्वत्र सर्च किया तो एक और लज्जन दीख गए। उन्होंने पहले प्रगतिशील होने के लिए अपने नाम से अपनी जाति हटा ली थी, अब ठीक-ठाक प्रगतिशील होने के बाद उन्होंने अपनी जाति को फिर से री-स्टोर कर लिया है। उनके फ़ेसबुक की शुक्ल-टाइमलाइन पर तीन साल पहले की चीन-यात्रा की डेढ़ बीघे लंबी पोस्ट है; जिसमें धन्यवाद था और धन्यवाद था और बग़ैर कुछ श्रेष्ठ रचे, मुल्क से बाहर हिंदी का प्रतिनिधि स्वर बनने का रास्ता था और फिर धन्यवाद था...

ख़ैर, कभी-कभी आदमी वहाँ भी पहुँच जाता है; जहाँ उसके होने की कोई ज़रूरत नहीं होती। इस ‘कभी-कभी’ में आकस्मिकता का निर्दोष भाव नहीं रह गया है, यह वक़्त की प्रबलता है कि आकस्मिकताएँ भी सुनियोजित उपक्रम में तब्दील हो रही हैं। वह अब सायास निर्मिति की तरह पसर रहीं हैं, दीख रही हैं। इस रूढ़ हो सके समय में जहाँ मौलिकता की ख़राब अनुकृति ही हर ओर दृष्ट है, निम्नताएँ ही अब आविष्ट करने लगी हैं।

कुछ कवि होते हैं जिन्हें आचार्य सारस्वत कवि कहते हैं, पर कुछ अपनी हरकतों से कवि होना चाहते हैं जिन्हें आचार्य लंगरावत कवि कहते हैं। वे जो कविता में कमतर हैं, गठजोड़ से हिंदी के इलाक़ों के नंबरदार हैं; वे अपनी हरकतों से ही कवि बने रहते हैं। ये हरकतबाज़ अब मुल्क के बाहर मुल्क की हिंदी कविता के प्रतिनिधि स्वर हैं, भले उनके पास उनका ही कोई प्रतिनिधि टेक्स्ट मौजूद न हो। 

लेकिन जिसकी फ़ेसबुक हरकतें ही इतनी किशोरालू हों, वहाँ यह सोचने पर मजबूर हुआ जा सकता है कि जो हरकतों में ही किशोरवयमय है, वह कविता और साहित्य में किस स्तर पर होगा? जब कोई अच्छी लोकप्रियता; दुर्भाग्य से किसी ग़लत व्यक्ति का वरण कर लेती है, तो वह एक संपूर्ण चूतियाप के लय में दीखती रहती है। हिंदी की दुनिया में ज़बरदस्ती ख़ुद को हिंदी का बताने वाले आजकल इसी याप में लयबद्ध हैं।

यह हिंदी का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि अब यह प्रस्तोताओं से पटी हुई भू है, पहचान इसमें कहाँ तू है!

इसमें जो अपने फ़ेसबुकिया हरकत्व से सारी कमतरताओं का नायक बना-हुआ रहता है; जिसकी ह्यूमरलेस, अबौद्धिक और नवही उकबकाहट से ‘मैं भी, मैं भी...’ करती हुई उसकी हर पोस्ट पर उसके जैसी ही सारी निम्नताएँ लहलहाती रहती हैं; उसके ह्यूमरहीन, मनगढ़ंत अनर्गल प्रलाप पर हँसती, बिहँसती रहती हैं... बंधु! अब वह ‘इंटरनेशल पोएट्री एंड लिट्रेचर फ़ेस्टिवल’ में कविता, साहित्य, परंपरा और दर्शन के नुमाइंदे की हैसियत से शिरकत कर रहा है।

गु वेंग ने कहा, “इस प्रसंग में मुझे हिंदी की समकालीन कविता का परिदृश्य अब भोजपुरी संगीत की आवाज़ की दुनिया के बहुत-बहुत नियर लगने लगा है। भोजपुरी संगीत की दुनिया में जो कुछ बेहतर है, जो कुछ लोकरस से संपृक्त है, जो कुछ अर्थगौरवपूर्ण है; उसके लिए दृश्य तक दूभर है... लेकिन ग़ैर-भोजपुरीभाषी दुनिया में भोजपुरी-गीतों के मानक-स्वर वे ही हैं, जिनके पास न आवाज़ है, न मूसीक़ी से कोई रब्त। हिंदी की समकालीन कविता की भू भी ऐसे-ऐसे कवितातुरों से भरी पड़ी है; जो कवि तो हो गए हैं, पर कविता उनके पास अब तक आई नहीं है।” 

यह सुनकर मैंने गु वेंग को पोलिश कवि तदेऊश रूज़ेविच की एक कविता सुनाकर विदा दी। ग़ौरतलब है कि वर्ष 1958 में चीनी राइटर्स एसोसिएशन के बुलावे पर तदेऊश रूज़ेविच भी चीन गए थे। इस कविता का शीर्षक है ‘प्रूफ़’ और अनुवादक हैं असद ज़ैदी... पढ़िए :

मौत दुरुस्त नहीं करेगी
कविता की एक भी पंक्ति
वह कोई प्रूफ़रीडर नहीं है 
वह कोई करुणामयी  
महिला संपादक नहीं है

एक ख़राब रूपक अमर होता है

एक रद्दी कवि जो गुज़र गया
गुज़रा हुआ रद्दी कवि रहता है

एक चाट मर कर भी चाटता है
एक अहमक़ जारी रखता है 
अपनी अहमक़ाना बकबक
क़ब्र के पार से भी

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