तीजनबाई : इकतारे पर महाभारत
सुशांत कुमार शर्मा
06 जुलाई 2026
अवसर था दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज के वार्षिकोत्सव पल्लव की सांस्कृतिक संध्या का। वहाँ उपस्थित थीं कलाकार पद्मभूषण—तीजनबाई। दर्शकों की संख्या लगभग इतनी ही थी कि उँगली पर गिनी जा सके। मंच के आस-पास कुछ वालंटियर्स गद्दे वाली कुर्सियाँ लगा रहे थे और कुछ झाड़ू लगा रहे थे, लेकिन बार-बार उस मुक्ताकाशी मंच के आस-पास खड़े पेड़ हवा के एक हल्के झोंके से पत्तियाँ और फूल बिखेर देते। ऑपरेटर माइक टेस्टिंग, हैलो चेक में लगा हुआ था। समय हो चुका था, पर वातावरण की शांति जो रह-रहकर टूटी इमारत की छत से मलबे को नीचे गिराए जाने की वजह से भंग हो रही थी, एक अजब-सी बेचैनी पैदा कर रही थी। मैं और मेरे साथी हालाँकि पोस्टर पर उक्त कार्यक्रम को लिखा देखकर और एक वालंटियर से पूछकर आश्वस्त बैठे थे—लेकिन विश्वास होना, न जाने क्यों मुश्किल हो रहा था कि यहाँ विश्व-विश्रुत कलाकार पंडवानी साम्राज्ञी तीजनबाई आने वाली हैं।
अचानक मंच से थोड़ी दूर पर एक कार आकर रुकी और फ़ौरन सबकी निगाहें उससे जा लगीं। शीशे को आधा खोले; एक भारी-भरकम चेहरे पर चश्मा चढ़ाए और साँवले चेहरे पर गुलाबी पाउडर लगाए तीजनबाई का गंभीर, परंतु सौम्य चेहरा हमारे सामने था। दरवाज़ा आधा खुला और एक छात्रा ने फ़ुर्ती से जाकर उन्हें कार्यक्रम में तनिक विलंब होने की सूचना दी और कार को मोड़कर महाविद्यालय के प्राचार्य के चेंबर की ओर ले गई। यह दृश्य मेरे लिए बड़ा सुखद था, अब मैं और पूरी तरह आश्वस्त होकर दुगुनी ख़ुशी से भर गया।
उस कार के पीछे लगी दो कारों से साज़िंदे उतरे और सीधे मंच की ओर अग्रसर हुए। बड़ी त्वरित गति से मंच, माइक और कुर्सियाँ सब यथास्थान एवं तैयार हो गए। साज़िंदे मंच सँभालकर बैठ गए और हारमोनियम, तबला, ढोलक, मजीरा, खँजड़ी और बैंजो सारे साज़ मिलाए जाने लगे। इसी बीच एक साज़िंदे के हाथ में इकतारा दिखा और मैं ख़ुशी से झूम उठा। उस ‘इकतारे’ को ख़ूब पहचानता हूँ, जहाँ-जहाँ तीजनबाई की तस्वीरें देखी हैं, वह इकतारा भी दिखा है, जहाँ तीजनबाई का नाम सुना है, वहाँ उस इकतारे की भी चर्चा सुनी है मैंने। यूँ तीजनबाई से अलग देखकर भी मैंने जब उसे पहचान लिया तो लगा कि इस इकतारे ने भी विश्व में अपनी एक अलग पहचान अवश्य क़ायम की है। मोर के पंख और सूत के बने रंग-बिरंगे फूलों से सजा वह छरहरी काया वाला इकतारा तीजनबाई का सहकर्मी तो है ही, सहधर्मी भी है।
आश्वस्ति और अनाश्वस्ति के भाव ह्रदय को अलग-अलग स्थिति में तो डालते ही हैं, बुद्धि को भी नियंत्रित एवं नियमित करने लगते हैं। अब तक जो मेरे मन की चिंता थी (प्रोग्राम होगा भी या नहीं) वह न जाने कहाँ विलीन हो गई थी और मन नए तरह की चिंताओं में या कहें कि उत्सुकताओं में उभचुभ हो रहा था। क्या प्रस्तुत करेंगी तीजनबाई? द्रौपदी स्वयंवर, द्रौपदी चीरहरण, रुक्मिणी-विवाह या कीचक-वध? क्या ऐसा भी हो सकता है कि बाई सिर्फ़ आकर बैठी रहें और प्रस्तुति ये साज़िंदे ही दें? नहीं, नहीं! ऐसा नहीं है, पंडवानी एकल अभिनय है, ठीक वैसे ही क्या जैसा लल्लू बाजपेई ने आल्हा का किया है? इन्ही चिंताओं से गुज़रता हुआ मैं साज़िंदों की ओर देखने लगा। तबले पर हथौड़ी की चोट हो रही है। उधर ढोलक की बद्धी कसी जा रही है। हारमोनियम मास्टर रेला-पलटा लगा रहे हैं। सबने एक जैसे भूरे रंग के कुर्ते पहन रखे हैं। कलाकारों ने कुछ बजाना शुरू किया। यहाँ मध्य सप्तक का बड़ा रेयर प्रयोग हो रहा है, मंद्र की तो कोई कुछ सुनता ही नहीं। एकमात्र तारसप्तक और उसमें भी पंचम के बाद की पटरियाँ ही चल रही हैं। बैंजो का शोर इतना ज़्यादा है कि साउंड बॉक्स की दिशा में पड़ने वाला कान अपने स्वास्थ्य को लेकर सचेत हो रहा है और कुल मिलाकर प्रोग्राम एक घंटे लेट हो चुका है। साढ़े पाँच बज गए। दर्शक भी प्राय: आ चुके हैं। सबकी निगाहों पर बस एक सवाल, कहाँ हैं तीजनबाई? कब आएँगी तीजनबाई? माइक पर घोषणा हुई ‘हमारे बीच आज पद्मभूषण तीजनबाई जी आ चुकी हैं, कृपया ज़ोरदार तालियों से स्वागत करें।’ सारी निगाहें दीर्घा के बीचोबीच बने पथ पर लग गईं। गाढ़े गुलाबी रंग की साड़ी और काले झूले (ब्लाउज़) को छत्तीसगढ़ की शैली में पहने, लाल सिंदूर से दमकती माँग, पेशानी पर लाल बिंदी, गाढ़ा लाल लिपस्टिक—जो पान से मिलकर कत्थई हो चला था, लगाए, साँवले मुख पर गुलाबी रोज़ पाउडर, गले में कंठा और मटरमाला, हाथ में भारी-भरकम चाँदी के कंगन और लाख की चूड़ियाँ, चाँदी के चौड़े-चौड़े बाजूबंद, कुकुरमुत्ते के आकार की बड़ी-बड़ी अंगूठियाँ, कमर में चाँदी का डँरकस (कमरबंद), पाँव में छर और गोडाई पहने, एक बढ़िया चमड़े की चप्पल में पाँव डाले, विशाल गरिमामय काया की स्वामिनी तीजनबाई, प्रोफ़ेसर महोदया के साथ मंथर गति से मंच की ओर चलीं। दर्शकों ने खड़े होकर तालियों से स्वागत किया। मंच के निकट चले जाने पर पृष्ठत: वह काया अपनी लंबी चुटीलेदार चोटी से मुझे पूर्ण-सी लगी। बाई को मंच के निकट सोफ़े पर बैठा दिया गया और परिचय का दौर शुरू हुआ। प्रोफ़ेसर साहिबा ने ऊँचे स्वरों में माइक में बोलना शुरू किया। बचपन से लेकर उस समय तक की यात्रा को मुख़्तसर कह पाना शायद संभव नहीं था क्योंकि जितने पुरस्कारों और देशों के नाम लिए गए अगर वे सब याद करना भी चाहूँ तो पूरा एक पृष्ठ भर जाएगा। इसी बीच मौक़ा देखकर मैं उठा, जाकर पैर छुए और बाई ने आशीष में सिर पर हाथ फेरा। “बचपन से ही आपके बारे में बहुत सुना था, दर्शनों की बड़ी इच्छा थी, संयोग से आज आपके दर्शन हुए, आशीर्वाद दीजिए माई।” इतना ही कह सका, चश्मे के पीछे से मुस्कुराती आँखें मेरी ओर देखने लगीं। बाई ने मेरी ठुड्डी पकड़ी और बड़े प्यार से कहा, “हम तो बहुत ही छोटे से कलाकार हैं, आप लोगों ने ही महान् बनाया है।” और मैंने फिर हाथ जोड़ लिए।
कुछ ही क्षणों में बाई मंच पर थीं। एक सहयोगी ने हाथ पकड़कर मंच पर चढ़ाया, उस समय एक पल के लिए लगा कि उम्र का असर हो चला है, जो मेरे अनुमान से तक़रीबन पचास-पचपन रही होगी। शायद बाई ने यह भाव अन्य दर्शकों में भी भाँप लिया हो। बाई माइक के सामने खड़ी हो गईं और साथी कलाकार ने वही चिर-परिचित इकतारा बाई के हाथों में थमा दिया। एक सूजानुमा कुछ हाथ में ली हुई बाई ने लाल रूमाल माइक के स्टैंड पर टिकाकर रख दिया। हैलो-हैलो की आवाज़ कर माइक चेक किया और ऑपरेटर को कुछ ज़रूरी निर्देश देकर दर्शकों से मुख़ातिब हुईं। दोनों हाथ जोड़कर बाई ने दर्शकों का अभिवादन किया और जवाब में तालियाँ बज उठीं।
अपने पारंपरिक और विशेष लहजे में “बैठी हुई माताओं, बहनों, भाईयों, बेटे, बेटियों” का संबोधन कर बाई ने बोलना शुरू किया। “तो भईया हमार उमिर हुई गै सत्तर साल।” सारे दर्शक सन्न रह गए, सब अपने बग़ल वाले का मुँह देखने लगे। “हम तो छत्तीसगढ़ के एक छोटे से गाँव के आदिवासी जाति के लोग हैं। आप लोग बड़े शहर के पढ़े-लिखे लोग हो। हम कभी स्कूल नहीं गए। उस ज़माने में लड़कियों का स्कूल जाना अच्छा नहीं मानते थे, सोचते थे ऐसी भी खाना बना ही रही है, वैसे ही तो खाना ही बनाएगी, कभी नहीं भेजा गया हमें पढ़ने। सो भईया हम ठहरे निरच्छर, अँगूठा छाप, आप पढ़े-लिखे लोग हो। अगर कोई भूल-चूक हो जाए, कथा इधर-उधर हो जाए तो माफ़ करना। हम तो भगवान से जो पाए हैं, उसी से उसका नाम लेते हैं, कथा कहते हैं महाभारत की। वृंदावन बिहारीलाल की कृपा है। हम तो बहुत छोटे कलाकार हैं, आप लोग महान् बना देते हैं। हममें भी हर कमी है। चोरी भी किया है बचपन में, खाने के लिए करती थी। दरवाज़े को खींचकर ऊपर की ओर उठा देना और घुसकर चौके में खा लेना, फिर उसी तरह बंद कर अपने भाई-बहनों के बीच भूखे बने बैठे रहना, यही हमारी चोरी थी। एक और बात कहूँ आपसे कि हम ठहरे निरच्छर, हिंदी बहुत टूटी है हमारी, छत्तीसगढ़ी बोलती हूँ। तो भईया कौनो ग़लती होए तो माफ़ करना...”
अब तक स्वर सामान्य थे, एक आम बोलचाल से थोड़ा अलग पर मंच की अदाकारी-सा कुछ नहीं, अचानक बाई ने कहा, “तो भईया चलें कुरूच्छेत्र जहाँ कौरव-पांडव सेना आमने-सामने हैं। भईया कुरूक्षेत्र, दिल्ली के निकट है और छत्तीसगढ़ से दूर पर कथा पहले छत्तीसगढ़ पहुँची और हम दिल्ली में आपको सुना रहे हैं।” अचानक बाई ने तारसप्तक के धैवत से उठाया, “राजा योधन के दरबार में करनदानी और राजा योधन...” विषय प्रवेश की सूचना में मात्र इतना कहा था कि आज हम लोग दुशासन वध की कथा सुनेंगे लेकिन इतने से पूर्व कथन के बाद सीधे कुरुक्षेत्र में न जाने कितनी सदियाँ लाँघकर जाते हुए बाई को एक सेकंड भर का समय लगा। कथा के प्रारंभ होते ही बाई का अभिनय और गायन ऐसा उतरा की भरत से लेकर आज तक की सारी शास्त्रीय रंग मान्यताएँ अपनी अर्थवत्ता ले भागीं। एक सत्तर वर्ष की वृद्धा की आवाज़ की शक्ति और शरीर की फ़ुर्ती ने जैसे समय के सत्य को अँगूठा दिखाना शुरू किया। बाई बुज़ुर्ग हैं, लेकिन बूढ़ी नहीं; समय तो जैसे हक्का-बक्का होकर प्रतीक्षा ही कर रहा है कि इन्हें कभी थकाऊँ, पर उसके पाँव उखड़ जाते होंगे जब बाई मंच पर आती हैं।
जिस बैंजो की आवाज़ ने हमारे कान को थका दिया था वो बाई की आवाज़ से दबकर वैसे ही व्यवहार में आ गया जैसे सितार के मुख्य तारों की आवाज़ से महीन तार स्वतः बजते हैं और मुख्य तार का अनुसरण कर उसके सुर को मधुर करते हैं। इसके पहले मैंने पंडवानी का नाम भर सुना था, इतना जानता था कि वह एकल अभिनय है परंतु उसे प्रस्तुत देखना और अपने स्वत: अनुभूत सत्य को स्वयं में समेट पाना मुश्किल हो रहा था। कभी ध्यान का एक छोटा हिस्सा भरत के नियति और मृत्यु नामक द्वारों की परिकल्पना पर जा रहा था तो कभी बादल सरकार की सेट रहित मंच की अवधारणा पर। कभी-कभी सेट और आधुनिकता की श्रीवृद्धि कर अभिनय से अकिंचन बनते हुए वर्तमान नाटकों की याद आई। लेकिन ध्यान का बड़ा हिस्सा यही कह रहा था कि भरत की चारों वृत्तियों ने समेकित होकर अवतार ले लिया है। सौंदर्य के सामंती रीतिकालीन प्रतिमानों एवं अत्याधुनिक ज़ीरो फ़िगर के ढाँचे में तीजनबाई नहीं अंटतीं, अतः इनके आधार पर तीजनबाई सुंदर नहीं हैं। परंतु उतना ही बड़ा सत्य यह भी है कि तीजनबाई सर्वांग आकर्षण से भरी हुई हैं। उनका आकर्षण ही उनका सौंदर्य है। वह सौंदर्य जो उनकी साधना में विपर्यस्त है। यह वही सौंदर्य है जो बूढ़े हो चले खल्वाट केलुचरण महापात्र में बालकृष्ण का-सा बचपन और बिरजू महाराज जैसे मर्दाना चेहरे में युवती राधा का लावण्य भर देता है। यह वही सौंदर्य है जो नब्बे वर्ष की सितारा देवी को सोलह वर्ष की युवती बनाता रहा है। यूँ कहें तो साधना ने उन्हें उस चरम पर पहुँचा दिया है, जहाँ सौंदर्य की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। वहाँ नाम ने रूप को अपने अधीन किया है, कला ने सौंदर्य को दासी बना रखा है। आयताकार बड़ा सा भारी-भरकम चेहरा, अपेक्षाकृत मझोला नाक और उनींदी सी छोटी-छोटी आँखें, पतले सुतवाँ होंठ और पान में सने लाल-लाल बराबर दाँत, आँखों के साम्राज्य को कपाल की सीमा में प्रवेश कराती और चौड़े कपाल के अधिकाधिक क्षेत्र को क़ब्ज़े में करती चौड़ी भौंहें, गालों के ऊपर और आँखों के नीचे उठे से दो गोलक जो नाक से विद्रोह कर अपनी ऊँचाई का लोहा मनवाना चाहते हों और असफल से होकर बैठ गए हैं... तीजनबाई की मुखाकृति की यही स्थिति है। बहुत-सा ख़ाली जगह चेहरे पर मानो यूँ लगता है विधाता ने बाईसाहब के चेहरे को चेहरा नहीं बल्कि एक ऐसा साँचा बनाया हो, जिसमें भावों के अनुकूल चेहरे भरे और निर्मित किए जा सकें। अगर यह कहा जाए कि ‘महाभारत’ की जटिल कथा एवं पात्राधिक्य का निष्कर्ष तीजनबाई का चेहरा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
नाट्य एक मिश्रित कला है। ठीक वैसे ही तीजनबाई एक मिश्रित कलाकार हैं। वह स्वयं नायक भी हैं, नायिका भी, गायिका भी हैं, निर्देशिका भी और अभिनेता भी, संवादों की लेखिका (मौखिक) भी हैं और उनके अनुकूल बनी पात्र भी। मुझे लगता है कि बादल सरकार की सेटरहित मंच की अवधारणा की उपयुक्त उदाहरण ही नहीं, उस अवधारणा की प्रेरणा भी तीजन स्वयं हैं। मैं महसूस कर रहा था, और सच कहूँ तो मुझे बड़ा संशय था कि कथा महाभारत युद्ध की हो और मंच की कोई सज्जा नहीं, कोई सेट नहीं, ये कैसे संभव हो सकता है। बचपन में ही बीआर चोपड़ा निर्मित ‘महाभारत’ देखकर मन में जो ‘महाभारत’ की छवि बैठी है, उसे उतारना ख़ाली सेट रहित मंच पर संभव हो सकेगा, मैं ऐसी कल्पना भी नहीं कर सकता था।
कथा प्रस्तुत करते समय तीजनबाई को देखकर मैंने यह महसूस किया कि उनकी स्वयं की बनावाट और उनका भव्य शृंगार उस पूरी महाभारतकालीन भव्यता को मंच पर उतार देने में सक्षम है। उनकी आत्मविकसित प्रतिभा ने उनके अभिनय को ऐसा माँज दिया है कि जहाँ उन्हें भव्यता की आवश्यकता होती है, अपनी भंगिमा को विस्तार देकर और स्वर को तारसप्तक के निषाद तक ले जाकर उसे प्राप्त कर लेती हैं और जहाँ सादेपन या सूनेपन की आवश्यकता होती है, स्वयं को समेट अपनी सारी भव्यता को समेटकर मंच की उदासी स्वयं पर ओढ़ लेती हैं। ऐसा करते समय उनका स्वर मध्य सप्तक के षड्ज या ऋषभ पर होता है। देखनेवालों ने प्राय: ध्यान दिया होगा स्वर जैसे ही तेज़ होते हैं इकतारे को एक हाथ में पकड़कर आकाश की ओर उठा देती हैं और दूसरा हाथ दर्शकों की ओर लहरा उठता है, लेकिन करुण दृश्य के निर्माण में इकतारे को प्राय: कमर से टिकाकर शिशुवत रख लेती हैं और दोनों हाथ जुड़ जाते हैं। यह स्वयं के संकुचन-विमोचन की कला, भव्यता एवं सौम्यता के अनुरूप स्वयं को ढालने की कला तीजनबाई ने किसी नाट्यविद्यालय से नहीं सीखा, वरन् यह कई पीढ़ियों के संचित तप और स्वयं की साधना का परिणाम है। मुझे नहीं लगता कि इस पूरी प्रक्रिया को तीजनबाई से व्याख्यायित करने को कहा जाए तो वह कर सकेंगी क्योंकि उनके लिए ये सूक्ष्म अभिनय तत्त्व इतनी सामान्य बात है कि उस पर उनका ध्यान ही नहीं जाता है। अंगों का संचालन, भावों के अनुरूप स्वयमेव हो जाता है।
सुप्रसिद्ध नृत्यांगना डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम ने भरत के नाट्यशास्त्र पर विचार किया है तथा उनका मानना है कि भरत के द्वारा बताई गई चार वृत्तियों (आरभटी, भारती, कैशिकी और सात्वती) से जिन चार प्रकार के अभिनयों का निर्माण (आहार्य, वाचिक, कैशिक एवं सात्विक) होते हैं, ऐसा लगता है भरत ने इन्हें विकल्प के तौर पर रखा है। यदि आंगिक अभिनय भर से काम ना चले तो वाचिक, पुन: कैशिक इत्यादि के समाहार से नाट्य द्वारा रसनिष्पत्ति की जा सकती है। तीजनबाई का अभिनय इन चारों का समाहार है। प्राय: लोककलाओं में यह विभाजन स्पष्ट नहीं रहते और गायन, नर्तन और स्वरूप सज्जा आदि सब समेकित होते हैं। तीजनबाई का महत्त्व इन वृत्तियों के अनजाने बर्ताव से है।
आंगिक अभिनय के नाम पर वह नृत्य नहीं प्रस्तुत करतीं, लेकिन जिस किसी पात्र का नाम लेती हैं, संवाद बोलती हैं, उनका हाव-भाव ठीक उसके अनुरूप हो जाता है। बोलते समय अलग-अलग पात्रों के लिए अलग-अलग पिच का उपयोग वे सहज ही कर जाती हैं। उनके गहने आधुनिक और फैंसी न होकर प्राचीन जड़ाऊ से होते हैं। इनसे जिन कैशिकी वृत्ति का निर्माण वे करती हैं, वह आश्चर्य में डाल देता है। गायन की पारंपरिक शैली में अलग-अलग भाव भरना भारतीय शक्ति का परिचय देता है।
तीजनबाई के मंच पर विंग्स भी नहीं थे। अलग-अलग भूमिकाओं के लिए अलग-अलग पात्र तो क्या बार-बार विंग में जाकर नई-नई भंगिमाओं के साथ आने की आवश्यकता उन्हें नहीं होती। वह संपूर्ण कथा एवं संपूर्ण पात्रों के साथ स्वयमेव अकेली मंच पर आती हैं और पूरी कथा का अभिनय कर जाती हैं। वहाँ मंच पर दो माइक लगे थे जिनके बीच के दो क़दम भर के अंतराल में चहलक़दमी करती बाईसाहब क्षण-क्षण परिवर्तन को पूरी कथा चलने तक हमारे मनोमस्तिष्क पर अंकित कर देती हैं। क्षण भर का किरदार लेकर आने वाले भाव सदा के लिए हृदय में पैठ जाते हैं।
तीजनबाई के इस अभिनय में सहायकों की भी अपनी भूमिका है। जो किसी भी तरह कम नहीं आँकी जा सकती। सबसे पहला सहायक है वह इकतारा। मैं इकतारे को एक अद्भुत साज़ मानता हूँ। एक तो वह सदा संतों के हाथ में दिखता है, दूसरे यह कि उसमें तार दो हैं और नाम इकतारा। अगर अपनी अल्पबुद्धि के अनुसार उसको एक बिंब बनाऊँ तो ऐसा लगता है कि आत्मा और परमात्मा रूपों—दो तारों को एकतार करने की प्रेरणा देता है यह इकतारा। संतों के हाथ में वह साज़ नहीं प्रतीक है स्वयं को ईश्वर से एकतार कर देने का।
तीजनबाई का इकतारा विशेष है। मोर के पंखों से सजा वह इकतारा मंच पर द्वापर युग का प्रतिनिधि (कृष्ण) है। उसका लाल रंग ‘महाभारत’ की रक्ताभा और महीन तार उस युग से आज तक के जीवन के शाश्वत स्पंदन का बोध कराते हैं। तीजनबाई को वह इकतारा तीजनबाई तक सीमित नहीं रहने देता, कभी भीम तो कभी अर्जुन, कभी कर्ण तो कभी पितामह भीष्म बनाता रहता है और ठीक इसके एवज में तीजनबाई उसे कभी भीम का गदा और कभी अर्जुन का गांडीव बनाती रहती हैं। वह ऊपर की ओर उठकर भीम का गदा बनता है, तो नीचे झुककर दु:शासन का हाथ, जिसे भीम-रूपी तीजनबाई दोनों हाथों से पकड़कर ऐंठती और उखाड़ फेंकती हैं। वह इकतारा साज़ तो कम ही रहता है, बार-बार पात्र बन जाता है। वह मृत्यु से तो निर्मित ही हुआ है और नियति से एक साज़ बना है लेकिन इन दोनों द्वारों को पारकर वह निर्जीव इकतारा एक सजीव पात्र बनकर बाई के हाथ में आता है। साथी कलाकारों में कोरस गाने वाले साजिंदे अपनी एक विशेष स्थिति रखते हैं। युद्ध की गर्जना और तुमुल कोलाहल की वाचिक अभिव्यक्ति की सजीवता में वे बाई के बहुत बड़े पूरक बन जाते हैं। उनमें विशेष हैं हारमोनियम मास्टर, गाने के साथ-साथ मंच पर विदूषक की भूमिका में उनका स्वर होता है। बाई यूँ तो वैदुष्य कला में भी माहिर हैं, लेकिन हारमोनियम मास्टर की दख़ल लाजवाब है। बाई जब किसी पात्र को संबोधित करती हैं तो उनका “काए!” कहना हँसाए बिना नहीं छोड़ता।
भीम दु:शासन को ललकारते हुए बोलता है, “आज गदा युद्ध नहीं करोगे दु:शासन तो कैसे लड़ोगे?” हारमोनियम मास्टर तपाक से बोल पड़े, “कराटे से।” बाई ने कथा में ही कह डाला, “कराटे क्या तुम्हारे बाप जाकर सिखाएँगे द्वापर में।” गदाधारी भीम दु:शासन का वध कर रहे हैं, प्रण पूरा करने के लिए नकुल द्रौपदी को दिलाने जाते हैं। द्रौपदी कुछ और ही समझकर कहती है, “आ गए रोटी खाने। अरे भूख ही लग जाती है लड़ते-लड़ते तो मुझे कह देते, मैं रोटी का गट्ठर लेकर आ जाती।” हारमोनियम मास्टर समय देखकर बोल उठते हैं, “मोबाइल ही कर दिए होते!” बाई ने समझाया, “अरे द्वापर में कहाँ मोबाइल था? ये तो कलयुग में अभी-अभी शुरू हुआ है।” ठीक इसी प्रकार बोतल का दूध पिलाने वाली माताओं को चेतावनी देती हुई, उनके बच्चों के भविष्य में बोतल पीने लग जाने की आशंका को समाप्त करने और भीम जैसे प्रतापी पराक्रमी संतान के लिए माँ के स्तन्य पिलाने के सुख को एक बिंबात्मक परिहासात्मक लहजे में कहती हुई बाई ने महिला दिवस की सार्थकता को रेखांकित कर दिया। स्वयं का उदाहरण देती हुई बोलीं, “जो माताएँ कहती हैं कि बच्चों को दूध पिलाने से झुर्रियाँ पड़ जाएँगी। वो बताएँ मुझे देखकर ऐसा लगता है कि मुझमें कमज़ोरी आई है? सत्तर साल की हूँ और आज भी मंच पर घंटों खड़ी अभिनय करती हूँ, जबकि अपने तीनों बच्चों को अपना ही दूध पिलाया है।”
सीधे तौर पर इस हास-परिहास का कथा से कोई संबंध नहीं बैठता, लेकिन देखें तो इसका महत्त्व बहुत है। बाई मंच पर हमारे अतीत और गौरव की प्रतिनिधि होती हैं, जबकि अन्य कलाकार कराटे और मोबाइल के प्रतीकों से आज के उपभोक्तावादी एवं फ़ैशनवादी समाज की प्रवृत्ति के परिचायक। बाई की भव्यता जब इन्हें नकारती है तो ऐसा लगता है कि हमारे अतीत का शौर्य एवं पराक्रम, आधुनिकता के इस मशीनीकरण और फ़ैशनधर्मिता को नकार रहे हैं। लगता है कि यदि हमारे पास गौरव के लायक़ कोई वस्तु है तो वह है हमारे शौर्य एवं सामर्थ्य की परंपरा, हमारा इतिहास, हमारे मिथक। ये कराटे और मोबाइल भीम के बल और महाभारत के ऐश्वर्य के आगे कहीं नहीं ठहरते। हमारे लिए गर्व का विषय वह सौंदर्य है जो अपने मातृत्व का पालन कर सत्य एवं धर्म की रक्षा के लिए भीम जैसा पुत्र उत्पन्न करता है, वह नहीं जो बचपन से ही संतान को ‘बोतल’ पकड़ा दे। हमने आधुनिकता के अर्जन में जो परंपरा की विभूति गँवाई है, वही असल में हमारे गर्वोन्नत भाल का दर्प है। यह परिहास एक युक्ति है, वह युक्ति जो हमारे अतीत पर गर्व करने का मौक़ा देती है, वह युक्ति जो दिखाती है कि हमारी मूल्य रहित तरक्की हमारे मूल्यवान अतीत के समक्ष कितनी बौनी है। यह वह युक्ति है जो प्रत्येक से यह सवाल करती है, “बताओ तुम आगे बढ़े हो या तुम्हारा अध:पतन हुआ है?”
शनै:-शनै: समय आगे बढ़ रहा था, पर कथा में मशग़ूल हमें रात के होने का आभास तब हुआ जब मंच पर बत्तियाँ जल उठीं। लाल, पीली, रंग-बिरंगी रोशनी से कथा में थोड़ा-सा व्यवधान पड़ा और बाई ने आँखों को हाथों के पीछे छिपाते हुए कहा, “भईया इतना सब नहीं, एक सिंपल वाली जला दो, वो क्या है कि हम सीधे-सिंपल लोग हैं न!” सादी बत्ती में सचमुच बाई का अभिनय और खिल उठा। तीजनबाई की यह सिंपलसिटी दरअस्ल उनका सामर्थ्य है। उनका मतलब यह भी हो सकता था कि मेरी कला की बत्ती दिखाने की न तो मुझे ज़रूरत है न तुम्हारी हैसियत। उनका यह सादापन, उनकी अभिनयशक्ति का अनुक्रमानुपाती भी है और पूरक भी। उनका सादापन उनके कॉन्फ़िडेंस का परिचायक है।
मुझे यह ज्ञात नहीं कि पंडवानी के वे पद जो बाई और कलाकार गा रहे थे, वे पारंपरिक हैं या बाई के बनाए हुए। यह भी नहीं पता वह गायन शैली पारंपरिक है या बाई की स्वनिर्मित। लेकिन कथा का जो समायोजन मैंने वहाँ देखा, वह अद्भुत था। यदि हम चाहें तो बाई की प्रस्तुति को तीन अंकों के नाटक के रूप में लिख सकते, देख सकते हैं। आधुनिक असंगत नाटक की तीनअंकीय विधि को अनजाने में ही बाई ने वहाँ प्रस्तुत किया। पहले अंक के प्रथम दृश्य में दुर्योधन के दरबार में कर्ण और दुर्योधन की बातचीत का ज़िक्र हुआ। अब तक जो योद्धा युद्ध में मारे जा चुके उनकी चर्चा, कर्ण का सेनापतित्व स्वीकार करना तथा युद्ध के लिए तैयार होना, इस पहले दृश्य में रहे। दूसरे दृश्य में शल्य को अपना सारथी बनाकर युद्ध के लिए कूच करना दिखाया गया है। दूसरे अंक में यदि देखें तो कुरुक्षेत्र में कर्ण और शल्य की बातचीत, कर्ण की अर्जुन से लड़ने के लिए व्यग्रता और अर्जुन का युद्धभूमि में प्रवेश तथा कर्णार्जुन संग्राम का प्रारंभ। दूसरे अंक के दूसरे दृश्य में भीम का युद्ध करना वर्णित हुआ। भीम की भयावहता का वर्णन करती हुई बाई ने कर्ण-अर्जुन संग्राम के दृश्य एवं भीम के रौद्रता के दृश्यों को एक कॉन्ट्रास्ट में प्रस्तुत किया। तीसरे अंक में दु:शासन और भीम का आमना-सामना, जोश में आकर भीम का कौरव-पांडव दोनों दलों को ललकारना, कर्ण-अर्जुन संग्राम का थम जाना, भीम और दु:शासन का मल्लयुद्ध, द्रौपदी को रणभूमि में बुलाना तथा दु:शासन की बाँह का भीम द्वारा उखाड़ा जाना और उसके रक्त में द्रौपदी के अपने केश धोने के कई छोटे-छोटे दृश्य थे।
मंच पर बाई के द्वारा किसी भी माध्यम या प्रतीक से इन अंकों की पूर्वसूचना नहीं दी गई थी, लेकिन बिना किसी पट परिवर्तन और विष्कम्भक या चूलिका के सारे दृश्य और अंक स्पष्ट थे। पंडवानी की प्रस्तुति में उसके गीतों एवं संवादों की महत्त्वपूर्ण योजना है। प्राय: हम देखते हैं कि जब भी पुराणकालीन कथा का कार्यक्रम होता है, तब उस परिवेश को निर्मित करने के लिए संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का सहारा लिया जाता है। माताश्री, तातश्री जैसे संबोधन और संस्कृत क्रियापदों की योजना से काल का परिवेश निर्मित होता है। लेकिन यह मानना पड़ेगा कि बघेली, छत्तीसगढ़ी आदि भाषाएँ अपने किसी विशेष गुण के कारण अपने सामान्य रूप में ही उस परिवेश का निर्माण कर देती हैं। चाहे वो आल्हाखंड हो या पंडवानी, इनकी भाषा वीर रस के बहुत क़रीब है। प्राय: भोजपुरी को वीर और करुण, ब्रज और अवधी को माधुर्य, राजस्थानी, छत्तीसगढ़ी तथा बघेली को वीर रसों के अनुकूल पाया जाता है। भाषा के साथ-साथ उनकी छंद योजना भी क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। जैसा कि हमें ज्ञात है कि आल्हा छंद में इकतीस मात्राएँ हैं। यह चौपाई से एक मात्रा कम लेता है, लेकिन सोलह-सोलह के बजाए सोलह-पंद्रह का क्रम चौपाई के लालित्य एवं शांत रस को शौर्य एवं वीरता से भर देता है। पंडवानी की छंद शैली भी कुछ ऐसी ही है। चौदह-चौदह मात्राओं के दो चरण और बीच में बहर-ए-तवील जैसी लंबी पंक्तियाँ एक विशेष योजना का निर्माण कर रही थीं। लेकिन पंडवानी की प्रस्तुति न तो पूर्णत: छंदबद्ध थी, न पूर्णत: कथा वरन् यह गद्य-पद्य मिश्रित चंपू शैली की नाट्य प्रस्तुति थी, जिसमें गद्य को पूरी नाटकीयता और पद्य को पूरी गीतिमयता से बरता जा रहा था। अभिनय करते समय बाई की देहयष्टि तरल हो जाती है। अर्थात् विभिन्न रूपाकार ग्रहण कर लेने वाली लहराती हुई काया। भीम बनकर इकतारे को गदा बनाया और ज़रा-सा झुककर उसे आगे की ओर यूँ बढ़ाया जैसे सच में भीम ने रथ के चक्के में गदा अड़ाकर रथ को रोक लिया हो। ठीक वैसे ही इकतारे को कमर पर टिकाकर रखा और हाथ जोड़कर पलभर में अर्जुन बन गईं। त्रिभंगी मुद्रा में खड़ी होकर जरा हौले से मुस्कुरा क्या दिया, साक्षात् कृष्ण हो गईं। यह तरह देहयष्टि अभिनय के दौरान अपना स्वरूप बदलती रहती है और कहीं किसी खास क्षण में ठोस होकर जम जाती है। आधुनिक रंगमंच की भाषा में ‘फ़्रीज’ हो जाती है। ऐसे अनेक अवसर आए जब बाई ने स्वयं को ‘फ़्रीज’ किया, लेकिन उन सबमें यादगार वह अंतिम दृश्य था जिसे देखना किसी स्वर्गिक अनुभव से कम न था। नाट्य को ब्रह्मानंद सहोदर कहने का अधिकार-सा देता हुआ, वह दृश्य ठीक वैसे ही आँखों में स्थित हो गया।
दृश्य था कि भीम और दु:शासन का युद्ध अंत की ओर है। भीम ने दु:शासन को भूशायी कर उसकी बाँह को पकड़ लिया है और प्रणपूर्ण करने के लिए द्रौपदी को बुला लिया है। भीम की तरह खड़ी बाई ने पैर से ऐसी मुद्रा का निर्माण किया कि जैसे किसी अदृश्य दु:शासन की छाती पर पाँव रखा हो। फिर इकतारे की डंडी को पकड़कर उसे हल्के घुमाने लगीं और ऐसा लगा कि जैसे दु:शासन की बाँह को भीम ऐंठ रहे हों। पीछे की गायन मंडली अपने ऊँचे स्वर में गा रही थी और कुछ ऐसा दृश्य निर्मित हुआ जैसे कि युद्ध की तुमुल गर्जना और दु:शासन का आर्तनाद और भीम का अट्टाहास सब एक साथ नुमाया हो रहे थे। इसी बीच स्वर कुछ और ऊँचा उठा और बाई ने इकतारे को एक झटके से ऊपर की तरफ़ लहरा दिया। यूँ लगा कि सच में एक बाँह उखड़ गई हो। इकतारे का गोलक एक मांस का लोथड़ा लग रहा था और ऊपर की ओर काँपता हुआ मयूर पंख उखड़े हुए हाथ की तड़पती हुई उँगलियों-सा मालूम हुआ। इसके बाद जो ग़ज़ब का दृश्य बना उसने अंतरात्मा तक पर अपनी मुहर लगा दी। इकतारे को ऊपर उठाये उसके नीचे खड़ी बाई ने अपनी सज्जा में बस इतना परिवर्तन किया कि अपनी लंबी लाल चुटीले से सजी चोटी को दाएँ कंधे से आगे खींचकर सिर पर चढ़ाकर बाईं ओर उतार कर लटका दिया। अब दृश्य का निर्माण कुछ ऐसा हुआ कि जैसे इकतारे रूपी हाथ से गिरता हुआ रक्त द्रौपदी के बाल धो रहा हो। लाल दमकती सिंदूरी माँग और बड़ी-सी बिंदी ऐसे लग रहे थे कि रक्त कि कुछ बूंदें सिर पर और कुछ पेशानी पर जमकर बैठ गई हों और लाल साड़ी की रक्ताभा का तो कहना ही क्या? ठीक ऐसा लग रहा था कि महाभारत काल की द्रौपदी को अपने सामने रक्त में बाल धोती हुई देख रहा हूँ। ख़ून से सनी हुई स्त्री जिसने अपने प्रण को पूरा किया हो और अपने शौर्य में अपनी करुणा खो चुकी हो, ऐसी बाई हमारे सामने थीं। तेज़-तेज़ चल रही साँसें यह इशारा दे रही थीं कि स्त्रीत्व की अग्नि यदि भड़क उठे तो अन्याय और दमन के समस्त पराक्रम का रक्त भी उसे बुझा सकने में असमर्थ है। पीछे का गायन-वादन चरम पर था। बाईं आँख बंद किए निर्विकार खड़ी थीं। प्रकाश, सज्जा और दृश्य का सामंजस्य इतना सुंदर बना था कि कह पाना संभव नहीं। नीचे तालियाँ बज रही थीं, दर्शक चित्रलिखित से।
साज़िंदों ने तिहाई लगाकर स्वर को विराम दिया। बाई ने अपनी भंगिमा समेट ली और प्रकृतस्थ होती हुई बोलीं, “आज के कथा समाप्त भै भईया! आप सब हमें यहाँ बुलाए बड़ी ख़ुशी भई। जब भी बुलाओगे, दौड़ कर चली आऊँगी।” अभिवादन स्वीकार करती हुई बाई मंच पर कुछ क्षण खड़ी रहीं। इस समय उनके चेहरे का भाव जितना मैं पढ़ पाया, वह उनके द्वारा प्रारंभ में कही बातों का भेद खोल रहा था। बाईं की आँखे कह रही थीं, “शहर के पढ़े-लिखे लोगों क्या तुममें अब इतनी शक्ति और साहस है कि मेरी कला में कोई कमी भी हो तो उसे माफ़ी देने भर का सामर्थ्य जुटा सको। बड़े शहर और सभ्य जाति का दंभ भरने वाले ज्ञानगर्वितों सुन लो, कला तुम्हारी क्रीतदासी नहीं, ज्ञान तुम्हारा वसीयत नहीं है और अभ्यास की सीमा तुम तय नहीं कर सकते। तुम स्वयं को चाहे जितना सभ्य, सुशिक्षित मान लो लेकिन इतना तो कहो मेरा अशिक्षित और असभ्य समाज तुमसे किस मामले में कम है। तुम शास्त्र रच सकते हो, क्योंकि तुम ज्ञान का आतंक जमाना चाहते हो, हम उस शास्त्र को नकारते हैं क्योंकि कला का उद्देश्य अधिकार और आतंक नहीं हो सकता। शिक्षा और ज्ञान सिर्फ़ तुम्हारी लिखी किताबों और तुम्हारे बनाए ऊँचे महलों में ही नहीं एक आदिवासी समाज की संचित परंपरा और खुले प्राकृतिक सानिध्य में भी है। तुम ‘कागद की लेखी’ वाले बताओ हमारे ‘आँखिन देखी’ का जवाब है तुम्हारे पास?
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