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गोदार के बारे में दो-एक बातें

यह लेख सत्यजीत रे द्वारा सिनेमा पर लिखे गए लेखों के—संदीप रे द्वारा संपादित—संग्रह ‘डीप फ़ोकस : रिफ़्लेक्शंस ऑन सिनेमा’ से लिया गया है। इस लेख में वह फ़्रांसीसी फ़िल्म निर्देशक ज्याँ-लुक गोदार (Jean-Luc Godard) की फ़िल्मों के अनगढ़पने के बारे में लिखते हैं। साठ के दशक में फ़्रांसीसी सिनेमा में जो नई धारा (फ़्रेंच न्यू वेव) चली, गोदार ने उसका नेतृत्व किया।

गोदार मानते थे कि अमेरिकी फ़िल्में पूरी दुनिया की फ़िल्मों को प्रभावित कर रही हैं। उन्होंने अपनी फ़िल्मों में उन प्रभावों को छोड़ कर आगे बढ़ने की कोशिश की। उनकी फ़िल्मों को एक तरह के काउंटर सिनेमा की श्रेणी में रखा जा सकता है, जिसमें हॉलीवुड के अमेरिकी सिनेमा से छूटने की कोशिश तो है ही, उस समय के फ़्रांसीसी सिनेमा से भी आगे जाने की कोशिश है।

गोदार के बाद आने वाले निर्देशकों में एक लंबी फ़ेहरिस्त ऐसे निर्देशकों की है, जो उनसे प्रभावित रहे हैं। लेकिन उनके समकालिनों की राय उनके बारे में मिली-जुली है। उनकी आलोचना का एक बिंदु हमें स्वीडिश निर्देशक इंगमार बर'मन (Ingmar Bergman) में दीखता है—जब वह कहते हैं कि गोदार की फ़िल्में अथाह उबाऊ और बौद्धिक होने का स्वाँग करती-सी हैं। 

एक समय तक गोदार के बहुत अच्छे दोस्त और फ़्रेंच न्यू वेव में उनके साथी रहे फ़्रांसीसी निर्देशक फ़्रांक्वा ट्रूफ़ो (François Truffaut) कहते हैं कि गोदार की प्रतिभा एक ध्वंस की ओर जाती है, वह (पिकासो की तरह) जो करता है उसे ध्वंस करता है।

गोदार की फ़िल्म-निर्माण शैली और उनके समकालीनों द्वारा उनकी जो आलोचनाएँ हम देखते हैं, (अप्रत्यक्ष रूप से) उन्हीं सवालों को संबोधित करते हुए सत्यजीत रे ने यह लेख लिखा है।

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फ़िल्म महोत्सवों में अक्सर यह सुनने में आता है कि मुझे गोदार पसंद नहीं हैं।

यों तो, मुझे भी गोदार पसंद नहीं हैं, लेकिन फिर वास्तविक अर्थों में आधुनिक कलाकारों के लिए मैं ‘पसंद’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर नहीं करता। क्या हम पाब्लो पिकासो (Pablo Picasso), या क्लॉड-मिशेल शॉनबर्ग (Claude-Michel Schönberg), या यूजेन इयनेस्को (Eugène Ionesco), या एलें रॉब ग्रीये (Alain Robbe-Grillet) को सच में पसंद करते हैं? 

ये सभी हमारी संवेदना को, अलग-अलग तरीक़ों से प्रदीप्त और उत्तेजित करते हैं। उनके प्रति हमारा प्रशंसा-भाव पूरी तरह से बौद्धिक स्तर पर है। पसंद किया जाना इंद्रियों की भागीदारी की क्रिया का सरलीकृत भाव जैसा होता है, एक अनायास और तीव्र—बिना मेहनत हो जाने वाली प्रक्रिया; और मुझे नहीं लगता कि आधुनिक कलाकार अपने लोगों द्वारा इस तरह पसंद किए जाने की उम्मीद भी करते होंगे।

गोदार फ़ौरी तौर पर ख़ारिज भी किए जा चुके हैं और अतिश्योक्तियों में सराहे भी जा चुके हैं। उनकी कोई एक ही फ़िल्म बिल्कुल विपरीत प्रतिक्रियाओं का बा'इस भी बनी है। जब कोई निर्देशक अरसे से चली आ रही—एक तरह से—पवित्र शैली, परंपरा को लगातार तोड़ता है और उसी समय उसकी फ़िल्में ऐसे तत्त्वों से भी भरपूर हों, जो प्रत्यक्ष रूप से चोट करती हैं, तो यह लगभग अनिवार्य भी है।

फ़िल्म की कहानी के विकास में पूरी तरह से अलग तरीक़ा अपनाना ही गोदार की अपारंपरिकता का मुख्य घटक है। कुछ लोग यही दावा एंटोनियोनी (Michelangelo Antonioni) के लिए भी करते हैं, लेकिन वह ग़लत है। 

एक ज़ाहिर अनगढ़पने की सतह के नीचे—एंटोनियोनी की फ़िल्में, यदि पूरी तरह से नहीं भी तो, ‘लगभग’ एक पारंपरिक और औपचारिक ढर्रे को ही अपने भीतर छिपाए चलती हैं। गोदार के संग ऐसी कोई ओट नहीं है।

कभी-कभी उनमें एक नियत विषयवस्तु होती है। ‘अ मैरिड वुमन’ (Une Femme Mariée) के बारे में कहा जा सकता है कि यह एक स्त्री के बारे में है, जो अपने पति और अपने प्रेमी के बीच मझधार में होती है। लेकिन जब आप यह कह चुके होते हैं, तब क्या आप फ़िल्म के बारे में सब कुछ कह चुके होते हैं—या शायद तब भी सब कुछ कहना बचा रह जाता है। यह विषय सिर्फ़ एक माध्यम है, जिसके माध्यम से कई प्रकरण अपनी जगह लेते हैं। कुछ इस विषय से जुड़े और कुछ विषय से इतनी दूर जिसके बारे में सोचना भी मुनासिब नहीं जान पड़ता है।

अब तक ऐसा समझा जाता था कि कोई निर्देशक किसी विषय के साथ कैसा व्यवहार करता है, या फ़लाँ विषय को लेकर फ़लाँ निर्देशक का निजी दृष्टिकोण क्या है? इसी में निर्देशक अपनी छाप छोड़ते हैं। कोई व्यक्ति, कलाकार की रचनात्मकता के वे विशेष हिस्से खोजा करता था, जिन पर अमुक कलाकार का ठप्पा लगा हो। 

यदि गोदार का ऐसा कोई दस्तख़त (स्टाइल) है भी जो उन्हें दूसरों से अलग कर सके, तो यह लगातार दूसरे निर्देशकों, दूसरी फ़िल्मों (अच्छी और ख़राब), कला के दूसरे माध्यमों और चलती ज़िंदगी की असंख्य घटनाओं के संदर्भ देने में है। संदर्भों का यह बारंबार दोहराव गोदार की किसी एक स्पष्ट मनोवृत्ति का निर्माण नहीं करता है, बल्कि गोदार के अपने, निजी परिवेश को लेकर उनकी सजगता और उनकी अभिरुचियों के वैविध्य से हमारा परिचय कराता है।

इसका नतीजा यह है कि गोदार की फ़िल्में मेरे लिए एक कोलाज का रूप धारण कर लेती हैं, और मैं इस बात से पूरी तरह इत्तिफ़ाक़ रखता हूँ कि उनके काम को उसी दृष्टिकोण से आँका जाना चाहिए। इसी ज़मीन पर उनके काम के सौंदर्य को पहचाना जा सकेगा।

हम जानते हैं कि चित्रकला में—कोलाज, एक तरह की विधा है, जिसमें ऐसे तत्त्वों को साथ लाया जाता है—जिनमें आपस में कोई संबंध नहीं जान पड़ता है, ताकि वे अपनी असंबद्धता से एक विषमता स्थापित कर सकें। 

इनमें से कुछ तत्त्वों—जैसे कि ब्राक़ (Braque) या पिकासो के एक कोलाज में एक गिटार या एक वाइन की बोतल के ‘मायने’ होते हैं। लेकिन क्योंकि गिटार और वाइन की बोतल को उनके स्वाभाविक परिवेश से उठा कर कदाचित् ऐसे तत्त्वों के पास रख दिया गया है जो कि संगीत या शराब पीने की क्रिया से किसी भी भाँति जुड़ी नहीं हैं। 

वे एक तरह से अमूर्तता प्राप्त कर लेते हैं। उनकी जो भी प्रतीकात्मकता उनसे अभी भी जुड़ी हुई है—वह कोलाज को उसकी शैली और उससे निकले भावों में मानवीयता के स्पर्श की एक बारीक सतह प्रदान करती है।

इसी तरह गोदार की फ़िल्मों में ऐसे दृश्य हैं जिन्हें देख लगता है कि इन दृश्यों के आगे चलने पर कोई व्यक्ति इनका सहचर होगा, लेकिन वह अनिवार्यतः छोटे कर दिए गए हैं या ‘सायास अतार्किकता’ से उनका विकास किया गया लगता है; क्योंकि ऐसा ना होने की स्थिति में वे ‘परंपरागत’ होंगे और इस वजह से शेष दृश्यों संग बेमेल लगेंगे। 

गोदार की एकाधिक फ़िल्मों के अंतिम दृश्यों में, मुख्य किरदारों की हत्या बंदूक़धारियों द्वारा कर दी जाती है। किरदारों के इस तरह के उन्मूलन के प्रति कोई भी तार्किक कारण खोजे नज़र नहीं आती है।

वे लोग जो कहानी व किरदारों के खुलने और आगे बढ़ने के पारंपरिक तौर-तरीक़ों के साथ सामंजस्य में हैं और उसकी समझ रखते हैं, उन्हें ऐसी चीज़ें निश्चित ही असहज या निराश करेंगी। लेकिन ऐसी उम्मीदों को धता बताने के लिए कोई भी, गोदार पर लांछन नहीं लगा सकता। अपनी फ़िल्मों के पहले दृश्य से ही गोदार बड़ी सावधानी से अपनी शैली बुनते चले जाते हैं। 

‘अ वुमन इज़ अ वुमन’ (Une Femme Est Une Femme) की शुरुआत ही में एक हिस्सा है, जिसमें फ़िल्म की शैली से जुड़े कुछ मुख्य स्रोत बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे गए हैं। ‘इट्स माई लाइफ़’ (Vivre Sa Vie) आख़िर में साफ़तौर से कहती है कि यह ‘बारह दृश्यों में एक शोध’ है और ‘मैस्कुलिन फ़ेमिनिन’ (Masculin Feminin) ख़ुद को ‘चौदह खंडों की एक फ़िल्म’ बताती है।

समस्या वास्तव में गोदार के साथ नहीं, बल्कि उनके समीक्षकों के संग है—या, कम-से-कम उनमें से बहुतों के साथ—जो लगातार एक चौकोर गुटके को गोल खाँचे में लगाने की कोशिश में लगे हैं। कला के किसी भी अन्य माध्यम संग, मैं विश्वास से कह सकता कि आख़िर में जीत गोदार ही की होगी; लेकिन व्यावसायिक सिनेमा की जिस क्रूर और गांभीर्य रहित दुनिया में उन्हें काम करना है, उसमें भी वह ही विजयी होंगे, इसमें मुझे शुबहा होता है।

सत्यजीत रे

अनुवाद और प्रस्तुति : अनमोल

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