पंजाबी कवि सुरजीत पातर को याद करते हुए

एक

जब तक पंजाबी साहित्य में रुचि बढ़ी, मैं पंजाब से बाहर आ चुका था। किसी भी दूसरे हिंदी-उर्दू वाले की तरह एक लंबे समय के लिए पंजाबी शाइरों से मेरा परिचय पंजाबी-कविता-त्रय (अमृता, शिव और पाश) तक सीमित रहा। जब सिलसिलेवार ढंग से पढ़ना शुरू किया तो चयनों और लेखों में सुरजीत पातर का नाम आता रहा और मुझे बार-बार यह ख़याल आता रहा कि यह नाम इतना चिर-परिचित क्यों मालूम होता है? पढ़ना फिर भी ठप रहा।

आख़िर जब उनकी कविताओं से सरसरी तौर पर गुज़रने का निर्णय किया, तब एक कविता पर मैं स्वयं रुक गया।

“लम्मे लम्मे रस्ते
भारी भारी बस्ते
थक गए ने गोडे
दुक्खण लग पए मोडे
ऐना भार चुकाया ऐ
असीं कोई खोते आं?”

मुझे अचानक से गर्मी की वे दुपहरियाँ याद आ गईं, जब मैं दूसरी-तीसरी का विद्यार्थी था और जगराओं में स्कूल से बस्ता लादे हुए, यह कविता गुनगुनाते हुए घर वापिस लौटा करता था। दादी भी कभी-कभार यह कविता सुनाया करती थीं।

“टीचर जी औणगे
आ के हुकम सुनौणगे
चलो किताबाँ खोलो
पिच्छे-पिच्छे बोलो
पिच्छे-पिच्छे बोलीए
असीं कोई तोते आं?”

मैं इस कविता के विषय में तक़रीबन भूल चुका था। इस कविता के नीचे सुरजीत पातर का नाम देखकर मुझे पहली बार पता चला कि यह उनकी रचना है। इसके बाद उनकी ऐसी कुछ और बाल कविताएँ मिलीं, जो मुझे अब तक याद तो थीं, लेकिन उनके सुरजीत पातर की रचनाएँ होने का ज्ञान मुझे पहली बार हुआ।

अब सोचता हूँ कि यह कहना ठीक नहीं कि सुरजीत पातर को मैंने बहुत बाद में जाना। अवचेतन रूप से ही सही, मुझे पंजाबी कविता के सौंदर्यबोध का पहला सबक़ सिखाने वाले सुरजीत पातर ही थे और यह सिर्फ़ मेरी बात नहीं है, न सिर्फ़ इस बाल-कविता की।

दो

सुरजीत पातर के पिता ज्ञानी हरभजन सिंह कुर्सियाँ बनाने का काम किया करते थे। कभी-कभार लिख भी लेते थे, लेकिन उनके शब्द हमेशा गुरुओं और गुरुपंथ को समर्पित रहे। उनके ताया-ज़ाद भाई सुरैण सिंह सोफ़ी भी कुर्सियाँ बनाते थे और इसी प्रकार की कविता करते थे। वह कीर्तन करते थे और संगीत की भी गहरी समझ थी, इसलिए मशहूर पंजाबी धुनों पर ‘धार्मिक’ बोल लिखा और गुनगुनाया करते थे। पातर की कविता का आरंभ भी ऐसे ही एक पंजाबी गीत की धुन पर बोल लिखने से हुआ। 

अपने लेख ‘साडा परिवार ते मेरी कविता’ (हमारा परिवार और मेरी कविता) में वह लिखते हैं, “…संगीत और कविता जैसी रहमत मुझ से पहले भी मेरे परिवार पर थी, जिसने मेरे कवि बनने में बड़ा योगदान दिया।”

“मेरी बीजी के ननिहाल का नाम हर कौर था और ससुराल का नाम गुरबख़्श कौर। मैंने उन्हें कभी कोई गाना गाते नहीं सुना था, लेकिन उनका चेहरा, उनकी उपस्थिति, उनकी उदासी, उनकी सहनशीलता मेरे लिए कविता थी।”

इसी लेख से यह भी पता चलता है कि कैसे उनकी सबसे व्यापक और लोकप्रिय कविताओं की प्रेरणाएँ अत्यंत निजी हैं। जब वह दूसरी कक्षा के विद्यार्थी थे तो उनके पिता ग़रीबी से नजात पाने की कोशिश में जंजीबार (अफ़्रीक़ा) चले गए थे। उन्होंने ऐसी कुल तीन यात्राएँ कीं, फिर उनका छोटा भाई दीदार भी पिता के साथ विदेश में ही रहने लगा।

“मैं पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला में एम.ए. प्रथम वर्ष का विद्यार्थी था। बीजी बहुत बीमार हो गईं। बहुत वर्षों पहले मेरे मामा के देहांत पर फ़ालिज का दौरा पड़ा था। वह काफ़ी ठीक हो गई थीं, मगर पूरी तरह नहीं। इस बार उनकी बीमारी आकर गई ही नहीं। वह प्यारी मृदुभाषी जान, पति की अनुपस्थिति में बेटे-बेटियों को पालने वाली, नीले रंग के लिफ़ाफ़ों के सहारे जीते-जीते, मेरी उदास माँ हमसे हमेशा के लिए बिछड़ गई। उसका परदेसी पति उस पल उससे सात समंदर दूर था। उसे यह ख़बर भी सात दिन बाद मिली जब उसने न जाने किस धुन में वह नीला लिफ़ाफ़ा खोला होगा।”

जो बदेसाँ चे रुळदे ने रोज़ी लई
ओह जदों अपणे देस परतणगे कदीं
कुझ तां सेकणगे माँ दे सिवे दी अगन
बाक़ी क़बराँ दे रुक्ख हेठ जा बैह्णगे

(जो विदेशों में भटकते हैं रोज़ी के लिए
वह जब अपने देश को पलटेंगे कभी
कुछ तो तापेंगे माँ के चूल्हे की आँच
बाक़ी क़ब्रों के पास लगे पेड़ के नीचे जा बैठेंगे।)

~~~

हर वारी अपणे ही अत्थरू अक्खियाँ विच नहीं औंदे
कदीं-कदीं साडे पित्तर रोंदे साडीआं अक्खियाँ थाणीं

(हर बार अपने ही आँसू आँखों में नहीं आते
कभी-कभी हमारे पितृ रोते हैं हमारी आँखों से)

सुरजीत पातर की समस्त रचनाओं के बारे में सोचते हुए मुझे उनकी कविता में दो मुख्य धाराएँ दिखाई पड़ती हैं। पहली धारा पंजाब के लोक-संगीत और क्लासिक सूफ़ी कविता की धारा है। दूसरी धारा बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में प्रसिद्धि पाने वाले अस्तित्त्ववादी चिंतकों और उनके प्रभाव में साहित्य में आने वाले आधुनिकतावाद अथवा ‘जदीदियत’ की है। साथ ही आश्चर्य की बात है कि शायद ही उनकी कोई ऐसी कविता हो जिसमें इन दोनों धाराओं को एक दूसरे में मिलते हुए नहीं देखा जा सकता।

“शब्दों का जादूगर
मेडलिन शहर में
कविता-उत्सव के दिन
उबेरेरू पार्क में
साइकिल पर एक बच्चा मेरे पास आया
मेरी पगड़ी और दाढ़ी देखकर उसने पूछा :
‘क्या तुम जादूगर हो?’
मैं हँसा
मैं न कहने ही वाला था, लेकिन अचानक बोला, ‘हाँ, मैं एक जादूगर हूँ।’
मैं अम्बर से तारे तोड़कर लड़कियों के लिए हार बना सकता हूँ
मैं घावों को फूलों में बदल सकता हूँ
पेड़ों को साज़ बना सकता हूँ
और हवा को साज़-नवाज़'
‘सच में!’, बच्चे ने कहा
‘तो फिर तुम मेरी साइकिल को घोड़ा बना दो’
‘नहीं! मैं बच्चों का जादूगर नहीं हूँ
मैं व्यस्कों का जादूगर हूँ’
‘तो फिर हमारे घर को महल बना दो’
‘नहीं! सच तो ये है
कि मैं चीज़ों का जादूगर नहीं हूँ
मैं शब्दों का जादूगर हूँ’
‘हूँ। अब समझा।’
बच्चा साइकिल चलाता मुस्कुराता हाथ हिलाता
पार्क से बाहर चला गया
और दाख़िल हो गया मेरी कविता में!”

तीन

भाषा के विषय में सुरजीत पातर जैसा सजग कवि पंजाबी में शायद ही कोई दूसरा हो। अनगिनत बार ऐसा हुआ कि मैंने उनकी किसी कविता का अनुवाद करना शुरू किया और बीच में छोड़ दिया, क्योंकि उन कविताओं का अनुवाद करने का अर्थ है कि एक-एक पंक्ति में कई-कई शब्दों के फ़ुटनोट  सहित इन कविताओं का अनुवाद करना। उन्होंने भाषा संबंधी अपनी कई कविताओं में धीरे-धीरे लुप्त हो रहे पंजाबी शब्दों को संगृहीत कर दिया है। उदाहरण के रूप में उनकी कविता : ‘मर रही है मेरी भाषा...’ यह कविता तीन भागों में विभाजित है और इसकी संरचना दो लोगों के बीच एक बातचीत जैसी है।

पहला व्यक्ति कहता है :

“मर रही है मेरी भाषा शब्द-शब्द
मर रही मेरी भाषा वाक्य-वाक्य
अमृत-बेला
नूर-पहर का तड़का

...

सरघी-बेला
घड़ी, पहर, बिंद, पल, क्षण, निमिष
बेचारे मारे गए
अकेले टाइम के हाथों
ये सारे शब्द
क्योंकि टाइम के पास टाइम-पीस था

...

ददेरे, फुफेरे और ममेरे (रिश्तों) की तो बात ही छोड़ो
कितने रिश्तों का सिर्फ़ आंटी-अंकल ने हाल-बेहाल कर दिया
और कल कह रहा था
पंजाब के आँगन में एक छोटा बच्चा
पापा अपने ट्री के सारे लीव्ज़ कर रहे हैं फ़ॉल
हाँ बेटा, अपने ट्री के सारे लीव्ज़ कर रहे हैं फ़ॉल
मर रही है अपनी भाषा
अब तो ईश्वर ही रक्षक है
मेरी भाषा का
ईश्वर?
ईश्वर तो स्वयं मरणासन्न पड़ा है
दौड़ी जा रही है उसको छोड़कर
उस की भूखी संतान
गॉड की पनाह में
मर रही है मेरी भाषा
मर रही है बाई-गॉड!”

दूसरा व्यक्ति कहता है :

“मर रही है मेरी भाषा
क्योंकि जीवित रहना चाहते हैं 
मेरी भाषा के लोग 
जीवित रहना चाहते हैं 
मेरी भाषा के लोग 
इस शर्त पर भी 
कि भाषा मरती है तो मर जाए 
क्या आदमी का जीवित रहना 
अधिक आवश्यक है 
या भाषा का? 
हाँ जानता हूँ 
आप कहेंगे 
इस शर्त पर जो आदमी जीवित रहेगा 
वो जीवित तो होगा 
मगर क्या वो आदमी होगा? 
आप मुझे भावुक करने की कोशिश न करो 
आप ख़ुद बताओ 
अब-जब 
दाने-दाने के ऊपर 
खाने वाले का नाम भी 
आप का ईश्वर अँग्रेज़ी में ही लिखता है 
तो कौन से निर्दयी अभिभावक चाहेंगे 
कि उन का बच्चा 
एक डूब रही भाषा की नाव पर बैठा रहे 
जीता रहे मेरा बच्चा 
मरती है तो मर जाए 
आप की बूढ़ी भाषा!”

इस पर पहले आदमी के उत्तर के साथ यह कविता समाप्त होती है :

“नहीं इस तरह नहीं मरेगी मेरी भाषा
इस तरह नहीं मरती भाषाएँ
कुछ शब्दों की मृत्यु से भाषा की मृत्यु नहीं होती
और शब्द कभी मरते भी नहीं
मर भी जाएँ तो
आते जाते रहते हैं लोक-परलोक में
आदमी के परलोक से भिन्न होता है
शब्दों का परलोक
हम भी जा सकते हैं
जीते-जागते
शब्दों के परलोक में
वहाँ उनके परिवार बसे होते हैं
मेले लगे हुए होते हैं वहाँ शब्दों के
मर चुके लेखकों की ज़िंदा किताबों में
ईश्वर नहीं तो न सही
सतगुरु इस के सही होंगे
इस को बचाएँगे
सूफ़ी, संत, फ़क़ीर
शाइर
बाग़ी
प्रेमी
योद्धा
मेरे लोग
हम
सबके मरने के बाद ही मरेगी
हमारी भाषा
ये भी हो सकता है
कि इस मरणासन्न माहौल में
मारनहारों से टकराने के लिए
और भी जीने-योग्य
और भी जीवंत हो उठे मेरी भाषा।”

उनकी कविता ‘शब्दकोश के दरवाज़े पर’ में भी उन्होंने अँग्रेज़ी शब्दों के बेतुके प्रयोग पर प्रश्न उठाए हैं।

“कमज़ोर-सा कवि
टाँग अड़ाकर बैठ गया
शब्दकोश के दरवाज़े पर
यहाँ मैं नहीं आने दूँगा
इतने अँग्रेज़ी शब्द
पंजाबी शब्दकोश में…
आने दे ओ कवि! आने दे
अंदर से भाषा वैज्ञानिक बोला
न आने देना अपनी कविता में
डिक्शनरी में तो आने दे
पहले नहीं आई लालटेन,
रेल, टाइमपीस, रेडियो, क्लॉक
एक्स-रे, टीवी, वीडियो, टेस्ट-ट्यूब,
ये तो तेरी कविता में भी आ गए
हुज़ूर ये कोई शब्द थोड़े हैं
ये तो चीज़ें हैं
चीज़ों को मैं कहाँ रोकता हूँ
भर-भर आएँ इनक्यूबेटर, इनहेलर, अक्वेरियम,
इनवरटर, डिश, टीवी,
सीडी
वीसीडी
डीवीडी
भर-भर आएँ
अपने पिताओं
माताओं
निर्माताओं के रखे नामों समेत
मैं कब रोकता हूँ?
और मैं उनमें से नहीं
जो
बीयर को यविरा,
रम को फणिरा
और वाइन को दक्शिरा कहने की सलाह देते हैं।
लेकिन जब आप
सूचना के होते इनफ़र्मेशन से
इक़रार-नामे के होते एग्रीमेंट से
असर और प्रभाव के होते इफ़ेक्ट से
सतह के होते सर्फ़ेस से
नैन-मटक्का करते हो
तो मुझे अजीब लगता है
कुँवारों के लिए ले आओ मैमें
चाहे कुदेशी महिलाएँ
लेकिन विवाहित वरों के घरों में
सौतनें क्यों घुसा रहे हो?...”

इस सिलसिले में उनकी एक और कविता याद आती है :

पिच्छे-पिच्छे रिज़्क दे
आया नंद किशोर
चल के दूर बिहार तों
गड्डी बैठ सियालदा
नाळ बथेरे होर

(पीछे पीछे रिज़्क के
आया नंद किशोर
चल के दूर बिहार से
गाड़ी पकड़ सियालदा
साथ कई थे और)

राम कली वी नाळ सी
सुगड़ लुगाई ओस दी
लुधियाणे दे कोल ही
इक पिंड बाड़ेवाल विच
जड़ लग्गी ते पुंगरी

(रामकली भी साथ थी
सुघड़ लुगाई उसकी
लुधियाना के पास ही
एक गाँव बाड़ेवाल में
जड़ लगी और अंकुरित हुई)

रामकली दी कुक्ख चों
जनमी बेटी ओस दी
नाँ धरेया सी माधुरी
कल मैं वेखी माधुरी
ओसे पिंड सकूल विच

(रामकली की कोख से
जन्मी बेटी उसकी
नाम रखा था माधुरी
कल मैंने देखा माधुरी को
उसी गाँव के स्कूल में)

गुत्ताँ बन्न के रिबनाँ विच
सोहणी पट्टी पोच के
ऊड़ा ऐड़ा लिख रही
ऊड़ा ऐड़ा लिख रही
बेटी नंद किशोर दी
किन्ना गूड़ा साक है
अक्खराँ दा ते रिज़्क दा

(रिबन बाँध कर चोटियों में
सुंदर तख़्ती पोंछकर
ऊड़ा-ऐड़ा लिख रही
ऊड़ा-ऐड़ा लिख रही
बेटी नंद किशोर की
कितना गहरा नाता है
अक्षर और रिज़्क़ में)

ऐसे पिंड दे लाडले
पोते अच्छर सिंह दे
आपणे प्यो दी कार विच
बह लुधियाणे आवंदे
कौनवेंट विच पढ़ रहे
किन्ना गूड़ा साक है
अक्खर अते अकांखिआ
पिच्छे-पिच्छे रिज़्क दे
आया नंद किशोर

(इसी गाँव के लाडले
पोते अच्छर सिंह के
अपने बाप की कार में
बैठ के आते हैं लुधियाना
कॉनवेंट में पढ़ रहे
कितना गहरा नाता है
अक्षर और आकांक्षा
पीछे-पीछे रिज़्क दे
आया नंद किशोर)

चार

सुरजीत पातर नहीं रहे!

पूरा साहित्य-जगत उनकी बातें कर रहा है। उनकी कविता के साथ-साथ उनके अध्यापन, सरकारी पदों पर दी गई सेवाओं, अनुवादों और स्क्रिप्ट-लेखन आदि पर भी बात हो रही है। उनके जैसी रचनात्मक प्रतिभा के आलोकन-अवलोकन की शृंखला अभी शुरू ही हुई है। अगर साहित्यिक दुनिया ठीक से उनका हक़ नहीं भी अदा करती, सुरजीत पातर हर भाषा-प्रेमी के सामने इस बात के जीवित उदाहरण के रूप में रहेंगे कि भाषा को जीवन किस प्रकार दिया जाता है। 

संताप को गीत बना लेना
मेरी मुक्ति का एक रास्ता तो है
और अगर नहीं है द्वार कोई
ये लफ़्ज़ों की दरगाह तो है

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