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नेहरू के पहले अफ़सर : स्वतंत्र भारत की विदेश नीति के निर्माता राजनयिक

यदि सरदार पटेल को भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का संरक्षक माना जाए, तो राजनयिक दल के संदर्भ में वही उपाधि नेहरू पर भी लागू होती है। तथ्य यह है कि जहाँ IAS के पहले बैच की भर्ती स्वतंत्रता से पहले ही हो गई थी, वहीं IFS (भारतीय विदेश सेवा) में पहली औपचारिक भर्ती स्वतंत्रता के एक वर्ष बाद फ़ेडरल (अब यूनियन) पब्लिक सर्विस कमीशन द्वारा आयोजित कॉमन सिविल सर्विसेस एग्ज़ाम के माध्यम से हुई। विदेश और गृह मंत्रालय के अवर सचिवों के बीच हुए पत्राचार से इस बात का प्रमाण मिलता है कि भर्ती प्रक्रिया को लेकर दोनों के बीच मतभेद थे—गृह मंत्रालय दृढ़ था कि कुछ अपवादों को छोड़कर IFS में भी सामान्य भर्ती मानदंड का पालन करना आवश्यक है। हालाँकि उस युग के सिविल सेवकों के संस्मरणों से यह ज्ञात होता है कि भारत का विदेश में प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्तियों के उक्त उद्देश्य के लिए सामर्थ्य की जाँच करने हेतु नेहरू स्वयं सिविल सेवा परीक्षा के शीर्ष स्थान प्राप्तकर्ताओं का साक्षात्कार करते थे। कल्लोल भट्टाचार्य की उत्कृष्ट पुस्तक ‘Nehru’s First Recruits: The Diplomats who built Independent India’s Foreign Policy’ इन सब विषयों के साथ ही और भी बहुत कुछ उजागर करती है। इसे हार्पर कॉलिंस ने प्रकाशित किया है।

बेशक, IAS और IFS, दोनों की पूर्वगामी ICS थी। ICS के वरिष्ठतम सदस्य, सर गिरजा शंकर बाजपेयी को सेक्रेटरी जनरल के रूप में नियुक्त किया गया था। किंतु यह पुस्तक केवल उन लोगों के बारे में नहीं है जिन्होंने ICS और IFS के मार्ग से विदेश सेवा में प्रवेश किया, बल्कि इसमें उन देशभक्तों, राजकुमारों, पत्रकारों, कवियों, स्टेनोग्राफरों, INA के सदस्यों और रेडियो उद्घोषकों की कहानी भी दर्ज है, जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में उत्पन्न असाधारण परिस्थितियों को देखते हुए विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में नियुक्त किया गया। भट्टाचार्य ने इन कहानियों को मुख्य प्रवर्तकों, और कुछ मामलों में उनके परिवार के सदस्यों के साथ हुई बातचीत तथा उस समय की समकालीन राजनीतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों पर द्वितीयक शोध के आधार पर पुनर्निर्मित किया है। इन व्यक्तियों की कार्यवाहियाँ ही विभिन्न देशों के साथ भारत की भागीदारी का आधार बनीं।

उदाहरण स्वरूप, पी.आर.एस. मणि, एक निडर पत्रकार जिन्होंने भारतीय सेना के पीआर निदेशालय के साथ एक एम्बेडेड वार कॉरस्पॉन्डेंट के रूप में काम किया—को सुराबया के युद्ध में युद्ध बंधी बना लिया गया था। इस युद्ध में मित्र राष्ट्रों की सेना के हिस्से के रूप में भारतीय सैनिक, इंडोनेशियाई स्वतंत्रता सेनानियों को कुचलने और देश की मुक्ति के समर्थन के बीच संघर्ष में उलझे हुए थे। युद्ध के पश्चात् सेना छोड़कर मणि फ़्री प्रेस जर्नल में पुनः शामिल हुए और इंडोनेशिया लौट आए। यहाँ उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख चेहरों, विशेषकर अहमद सुकरनो के साथ मित्रता स्थापित की। बाली से संबंधित सुकरनो की हिंदू माता ने उन्हें ऐसे सांस्कृतिक परिवेश में पाला था, जहाँ महाभारत जैसी किताब उनके बचपन का अहम हिस्सा थी। मणि के सुझाव पर ही हाल ही में स्वतंत्र हुई दो एशियाई महाशक्तियों ने एक अनूठा विनिमय तंत्र आरंभ किया, जिसके अंतर्गत इंडोनेशिया ने भारत को चावल प्रदान किया, और बदले में वस्त्र एवं दवाइयाँ उपलब्ध कराई गई। हम सभी जानते हैं कि सुकरनो 26 जनवरी 1950 को भारत में पहले गणतंत्र दिवस के अवसर पर मुख्य अतिथि थे। इस वर्ष की शुरुआत में ही यह सम्मान राष्ट्रपति प्रबोवो सबियंतो को 76वें गणतंत्र दिवस समारोह में नई दिल्ली में पुनः प्रदान किया गया।

विदेश सेवा में शामिल अन्य मीडियाकर्मियों में रणबीर सिंह, अशरज राम सेठी, सैमुल वर्गीज़, फ़्रेडरिक कामथ, उमा शंकर बाजपेयी और पुरुषोत्तम लाल भंडारी शामिल थे। इस समय तक IFS में नियमित भर्ती और ICS से डिपार्टमेंटल सेकंडमेंट ने नवगठित सेवा का मूलाधार तैयार कर दिया था, जिसके न्यूनतम विवरण एक गोपनीय दस्तावेज़ ‘भारतीय विदेश सेवा (शाखा A एवं B) के अधिकारियों का इतिहास’ के रूप में 1958 में प्रकाशित हुए थे। विदेश नीति के क्षेत्र में प्रमुख ICS अधिकारी वाई.डी. गुंडेविया, सी.एस. झा, राजेश्वर दयाल, टी.एन. कौल और केवल सिंह—ये सभी IFS द्वारा साउथ ब्लॉक (MEA का मुख्यालय) सँभालने से पूर्व ही विदेश सचिव बन चुके थे। प्रत्यक्ष भर्ती से 1982 में सबसे पहले विदेश सचिव का पद सँभालने वाले अधिकारी 1952 बैच के एम.के. रसगोतरा थे। 
इसके पश्चात् भट्टाचार्य ने इन असाधारण अधिकारियों के अद्वितीय करियर का विवरण प्रस्तुत किया है। वे शुरुआत करते हैं—1951 बैच के ब्रजेश मिश्रा से, जो वाजपेयी के सबसे विश्वसनीय सहायक और भारत के अब तक के सबसे शक्तिशाली राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) बने, क्योंकि उन्होंने इसके साथ ही, एक ही समय में प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव का पद भी सँभाला। इन पहली पीढ़ी के राजनयिकों में जे.एन. दीक्षित—जो बाद में NSA भी बने, सी.बी. मुथम्मा (भर्ती होने वाली पहली महिला), साथ ही मीरा सिन्हा-भट्टाचार्य और मीरा इशरदास मलिक (चीन में नियुक्त होने वाली पहली महिला भर्ती), एरिक गोंसलवेस, जिन्होंने बर्मा (अब म्यांमार) से भारतीयों की पहली सफल निकासी का आयोजन किया, ए.पी. वेंकटेशवरन, कामेटकर, के. नटवर सिंह और रोमेश भंडारी शामिल हैं। इनमें से कई सक्रिय राजनीतिज्ञ के रूप में कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। महिला अधिकारियों द्वारा झेले गए भेदभाव और पक्षपात का विश्लेषण समाजशास्त्री पैट्रीसिया उबेरॉय ने विस्तृत रूप से किया है।

मैं इनमें से कुछ के बारे में विशेष रूप से कहना चाहूँगा—ख़ासकर 1952 बैच के टॉपर दलीप शंकरराव कामेटकर के बारे में, जो अपने बैच में एकमात्र बाहरी सदस्य थे, क्योंकि अन्य चारों—वेंकटेशवरन, के.एस. बाजपेयी, उमा शंकर और जगदीश चंद अजमानी—का ICS से संबंध था। अतः इस अध्याय का शीर्षक ही ‘दी आउट्साइडर बिकम्स एन इन्साइडर’ है। इनके सुपुत्र इंदीवर मेरे मित्र और JNU के मेरे बैचमेट रहे हैं। भट्टाचार्य ने इस पुस्तक के लिए इंदीवर से विस्तार में इंटरव्यू किया। उन्होनें केजी मार्ग स्थित IFS होस्टल में उनके साथ बड़े हुए IFS परिवारों की स्मृतियाँ साझा कीं, जिसमें 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान ब्लैकआउट और बंकर के अनुभव शामिल हैं, जिनसे बांग्लादेश का जन्म हुआ।

मधुशाला के लेखक और नेहरू के निर्वाचन क्षेत्र, इलाहाबाद के महान् हिंदी कवि हरिवंशराय बच्चन—जिन्हें अब अमिताभ बच्चन के पिता के रूप में जाना जाता है—को भी हिंदी के प्रचार हेतु मंत्रालय में सम्मिलित किया गया था। उन्होंने ही ‘विदेश मंत्रालय’ की संज्ञा दी थी। बच्चन और नेहरू के बीच हिंदी के विकास पर महत्त्वपूर्ण मतभेद था। नेहरू के अनुसार हिंदी और उर्दू दोनों ‘हिंदुस्तानी’ थीं, पर बच्चन इस बात से असहमत थे।

हरिवंशराय बच्चन के अनुसार उर्दू, अरबी और फ़ारसी शब्द हिंदी में समाहित किए जा सकते हैं, परंतु यह किसी मिश्रित भाषा (क्रियोल) का रूप नहीं ले सकता।

वह व्यक्ति, जिसका चित्र नेहरू के साथ कवर पृष्ठ पर छपा हुआ है, इतिहास के साथ एक रोचक संबंध रखता है, क्योंकि न केवल उसने प्रोटोकॉल के बारे में प्रोटोकॉल निर्धारित किया, बल्कि अपना सार्वजनिक जीवन मोहम्मद अली जिन्ना के सचिव के रूप में आरंभ किया, जो भारतीय विदेश नीति के सिद्धांतों के बिल्कुल विपरीत थे। 1955 में सोवियत नेता ख्रुश्चेव और बुल्गानिन के भारत के पहले दौरे के अवसर पर उनके स्वागत, खानपान की व्यवस्था और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की ज़िम्मेदारी निभाने वाले बेग और उनकी जीवनसंगीनी तारा थे। स्टालिन के विपरीत, ख्रुश्चेव भारत के प्रति अत्यंत सकारात्मक थे। उन्होंने पाकिस्तान की नाराज़गी के बावजूद श्रीनगर का दौरा कर यह घोषित किया कि जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इंग्लैंड में शिक्षा ग्रहण करने वाले  बेग ने 1916 में 16वीं लाइट कैवलरी के एक युवा लेफ़्टिनेंट के रूप में अपना पेशेवर करियर प्रारंभ किया। 1927 में झाँसी में अपनी इकाई का नेतृत्व करते समय वे नेहरू के पूरे परिवार से मिले, सिवाय जवाहरलाल के, जो उस समय क्रांति की दसवीं वर्षगाँठ के अवसर पर सोवियत संघ गए थे। बाद में उन्होंने टाटा समूह, जिन्ना के सचिव और फिर नेशनल वॉर फ़्रन्ट के निदेशक के रूप में कार्य किया—ताकि नाज़ी ख़तरे के ख़िलाफ़ राय संगठित की जा सके। स्वतंत्रता से पूर्व नेहरू ने उन्हें (तब के) पुर्तगाली उपनिवेश गोवा के पणजी में भारत के कौंसल जनरल के रूप में नियुक्त किया, जहाँ उन्हें अल्टिन्हो हिल पर स्थित विशाल उपनिवेशीय भवन में तिरंगा फहराने का विशिष्ट सम्मान प्राप्त हुआ।

पुस्तक का समापन महाभारत के संभाव्य पर्व से संबंधित द्रोणाचार्य की इस विचित्र व्याख्या के साथ होता है, जिसमें द्रोण द्वारा एकलव्य से गुरु दक्षिणा के रूप में अपना अँगूठा काटकर देने का ज़िक्र है। द्रोणाचार्य की क्रूरता उनके अद्वितीय, एकाग्र प्रतिशोध की चाह और रणनीतिक अंतर्दृष्टि का प्रतीक थी, जहाँ उनके उद्देश्य के लिए केवल विजय ही मायने रखती थी। उन्होंने ठान लिया था कि कुरु साम्राज्य को चुनौती मिलने पर कोई भी राजा, यहाँ तक कि द्रुपद भी उनके जितने सक्षम कमांडर को नियुक्त नहीं कर सकेगा। अपने विस्तारित पड़ोस में अपनी रणनीतिक पहुँच बढ़ाने की चाह रखने वालों के लिए यही राष्ट्र राज्य की नैतिकता और रियलपॉलिटिक है। यह उजागर नहीं किया गया कि नेहरू इस सिद्धांत से सहमत थे या नहीं, लेकिन उनके द्वारा भर्ती किए गए पहले राजनयिक निस्संदेह इसके समर्थक थे।

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