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सदी की आख़िरी माँएँ

मैं ख़ुद को ‘मिलेनियल’ या ‘जनरेशन वाई’ कहने का दंभ भर सकता हूँ। इस हिसाब से हम दो सदियों को जोड़ने वाली वे कड़ियाँ हैं—जिन्होंने पैसेंजर ट्रेन में सफ़र किया है, छत के ऐंटीने से फ़्रीक्वेंसी मिलाई है, स्नेक गेम में हाई स्कोर बनाया है, बरगदों पर लटके हैं, ख़ून निकलने पर मिट्टी को ऐंटीसेप्टिक की तरह इस्तेमाल किया है और तो और हमारी नंगी आँखों ने 3GP से 4K HD तक की विकास-यात्रा देखी है। इतनी भाग्यशाली आँखों ने कुछ ऐसा भी देखा है जो जेनेरेशन ज़ेड और उसके बाद वालों के लिए ‘वावनुमा’ हो सकता है।

हमने बदलती सदी की आख़िरी माँएँ देखी हैं।

अम्मा, सदैव घर में क़ैद रहने वाली वह महिला हैं जिन्होंने कभी आज़ादी के लिए कोई आंदोलन नहीं किया। समय से समझौता करना जैसे उनकी घुट्टी में शुरू से शामिल था। सहनशीलता, इस पीढ़ी की औरतों की सबसे बड़ी विरासत है। ये औरतें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आते-आते ख़ुद अपनी माँ जैसी हो जाती हैं। प्रेम-भरी आँखों से देखने पर इनके चेहरों की बनावट भी एक-सी नज़र आती है। मुझे मेरे मित्रों की माँओं ने भी उतना ही प्रेम किया है, जितना मेरी माँ ने मुझसे किया—क्योंकि संबंधों में नाप-तौल की पद्धति तो इस सदी के बाद आई है। इन्होंने रोटियाँ तक कभी गिनकर नहीं बनाईं। कोई अतिथि इनके घर से कभी भूखा नहीं गया।

आज की मेट्रो सिटी एक कुत्ता या बिल्ली पालकर ख़ुद को ‘डॉग/कैट पेरेंट’ कहने लगती है, लेकिन हमारी सदी की माँओं की आवाज़ घर में पली भैंसों से लेकर गाँव के दूसरे छोर पर दुम हिलाने वाली कुतिया तक पहचानती थी। गिलहरियों, चिड़ियों और बछियों से इनकी दोस्ती थी। इन्हें फ़ेसबुक या इंस्टाग्राम पर इनके माँ होने का प्रमाण-पत्र नहीं देना पड़ा और न ही कभी इन्हें इसकी ज़रुरत महसूस हुई।

मुझे याद आता है कि मेरे कुकुर ने अम्मा को दो बार काटा है, फिर भी मेरी अम्मा ने कभी उसे खाना देना बंद नहीं किया। अभी कुछ दिनों पहले अम्मा का दिल्ली आगमन हुआ। रोज़ पिताजी से ज़्यादा पोलू (कुकुर) का हाल-चाल लिया गया। अम्मा की धीमी होती आँखों ने सभ्यता का विकास बस टीवी पर देखा है। ‘साँस-बहू-संजोग’ जैसे सीरियलों ने अम्मा के पहनावे पर उतना असर नहीं डाला, जितना कि रोज़ मनीष मल्होत्रा हमारे समाज की नव-कुलीन महिलाओं पर डालता है। एक साड़ी जो शायद उनके ब्याह में उनके घर से आई थी, आज भी उनकी सबसे पसंदीदा साड़ियों में से एक है। बनारस अध्ययन के दिनों में उनके लिए मैं एक सस्ती बनारसी साड़ी ले आया था, ख़ास दिनों में अम्मा आज भी उसे पहनकर उसके रेशम की तारीफ़ करते नहीं थकतीं। जहाँ इस सदी की महिलाएँ ‘प्राइस टैग्स’ में बात करती हैं, वहीं हमारी सदी की माँएँ ‘प्राइस टैग्स’ से घबराती हैं। मैचिंग मिलाने में अपनी या अपने पति की आधी सैलरी (या सैलरी का बड़ा हिस्सा) फूँक देने का साहस अभी इनमें नहीं है। इनकी कुल जमा-पूँजी सिर्फ़ एक-आध झोले में सिमट सकती है। इनका घर इनके कंधों पर ठहर सकता है।

प्रगतिशील समाज ने स्त्रियों के मान-सम्मान के लिए न जाने कितने विमर्श खड़े किए लेकिन प्रगतिशीलता का वह स्तर अब तक नहीं छू पाए, जिसे हमारी अम्मा की अम्मा या उनकी सास ने वर्षों पहले ही जी लिया था। अगर आपको याद आए तो ज़रा याद करिए कि आपके घर के आस-पास कोई न कोई ऐसी स्त्री ज़रूर रही होगी जो एक साड़ी लपेटे पूरे गाँव में निर्भय भ्रमण करती थी। जिनके राह पर निकलते ही मुर्हट्ट से मुर्हट्ट आदमी ‘दाई’ को प्रणाम करता था। दाई ब्लाउज़ नहीं पहनती थीं। प्रगतिशील समाज जिस ‘कल्चर’ से अब तक अपनाइयत भी नहीं जोड़ पाया, उसे हमारी सदी की माँओं ने पुचकारा है।

वस्तु-हस्तांतरण भाई-बहनों के बीच हमेशा से होता रहा है। मैंने अपनी बड़ी बहन से मिली साइकिल कुछ दिनों तक चलाई है। वस्तु-हस्तांतरण, मध्यवर्गीय परिवारों की एक किफ़ायती युक्ति है। इस युक्ति से हमारी सदी की माँएँ भी अछूती नहीं रहीं। मेरी अम्मा आज भी मेरा चार-पाँच साल पुराना मोबाइल बड़े चाव से चलाती हैं। मैंने कई दफ़ा उन्हें नया दिलाने की कोशिश भी की, लेकिन नहीं उन्हें आज भी वह पुराना, नया ही लगता है। सोचता हूँ, इन्हीं माँओं को देखकर ही क्या वह वाक्य प्रचलित हुआ होगा, जिसमें कहा गया है कि ‘एक कामयाब आदमी के पीछे एक औरत का हाथ होता है’। मुझे उस सहारे में इन माँओं का छिपा त्याग नज़र आता है। परिवार को कम से कम में चलाने का हुनर इन्होंने ही भावी पिताओं को दिया था। इन्हीं माँओं ने अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर न जाने कितने बेटे-बेटियों को विदेश में नौकरी दिला दी और जब भी उनके महँगे उपहारों ने इनके जीवन का बोझ और बढ़ाने की कोशिश की तब-तब उन्होंने उन उपहारों को किसी फ़क़ीर के मानिंद बाँट दिया। इनके सीने से चिपके पर्स से निकली एक-एक पाई, देवी माई का आशीष है। ‘फ़ोन पे’ एक बार को भले ही किसी को पैसे देने में हाथ खींच ले, लेकिन हमारी सदी की माँएँ दानी कर्ण की भी गुरु हैं।

सुबह सूरज को उठाकर उठना और जुगनुओं को सुलाकर सोना यही इनकी दिनचर्या का आदि और अंत है। हमें जब-जब अपनी माँएँ याद आईं, वे किसी न किसी काम में लगी हुई ही याद आईं। माँओं को उनके काम से पृथक नहीं किया जा सकता। ज़िम्मेदारियों का भार ये अस्पताल के बिस्तर तक ले जाती हैं। हमारी सदी की माँओं को डिप्रेशन जैसी बीमारियाँ कभी छू भी नहीं पाईं। छुएँ भी कैसे—माँओं के पास इस सब के लिए समय ही कहाँ है?

दिल्ली में अम्मा के आने पर मेरा थोड़ा-बहुत ख़र्च हो गया, वह भी उतना नहीं जितना किट्टी-पार्टीज़ में होता है। अम्मा किसी पर बोझ नहीं बनना चाहतीं। चलते-चलते उन्होंने अपने सीने से चिपकी पर्स से कुछ पैसे निकालकर मुझे देने की कोशिश की। मैंने लेने से साफ़ इंकार किया तो रुंधे गले से कुछ कहने की कोशिश में रोने लगीं। बहुत देर तक मेरा हाथ पकड़े रहीं। ये हाथ संसार के सबसे सुरक्षित हाथ हैं। इन्हीं हाथों की उँगलियों ने कभी हमें सहारा दिया था, चलना सिखाया था। हमारी पीढ़ी को इस बात का भी दंभ है कि हमारी परवरिश किसी नैनी ने नहीं की। हम जब भी गिरे हमें अपना सब काम छोड़कर, उठाने के लिए हमारी माँओं ने हाथ बढ़ाया। हमने डायपर नहीं पहने। हमें कलेजे से लगाया गया और हमेशा सूखे में सुलाया गया। हमारी बीमारियों पर रात-दिन प्रार्थनाएँ की गईं। मुझे लगता है हम सब इसलिए भी मौत के मुँह से बार-बार निकल आते हैं क्योंकि हमारी माँओं ने हमारे लिए प्रार्थनाएँ की हैं। माँएँ अलग-अलग रूपों में बार-बार यमराज से टकराती हैं।

मैं अक्सर अम्मा को गंदा चश्मा लगाने पर टोंकने लगता हूँ। मैं पूछता भी हूँ कि “कैसे आपको इसमें दिखाई देता है।” उनका जवाब कुछ नहीं होता है। वह बस मुझे देखकर मुस्कुराती हैं। मैं जब किसी बात पर ज़्यादा नाराज़ हो जाता हूँ तो अम्मा की मुस्कुराहट शून्य का रस्ता ले लेती है। ऐसे में अम्मा सिर्फ़ मुझे निहारती रहती हैं। मुझे कभी माँ ने चप्पल आदि से नहीं पीटा। हमारी सदी की माँएँ चप्पल से नहीं पीटतीं। उनके लिए उनके बच्चे सदैव फूल से भी अधिक कोमल हैं। हिमालय-सा विशाल हृदय, धरती सदृश धैर्य, हवा सामान बहाव, प्रकृति जैसी स्नेहदात्री—सदी की आख़िरी माँओं के गुण हैं। अगर हमारी माँएँ बहस करतीं तो रिश्तों की नींव में दीमक लग जाते।

शताब्दी की संरक्षक हैं हमारी माँएँ।

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प्रणव मिश्र तेजस को और पढ़िए : झाड़ियों का शाप | 8/4 बैंक रोड, इलाहाबाद : फ़िराक़-परस्तों का तीर्थ

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