लखनऊ : वो शहर जो लाहौर और दिल्ली के बीच में कहीं फँसा हुआ है
अभिषेक कुमार सिंह
21 अक्तूबर 2026
जब भी हम किसी नए शहर में क़दम रखते हैं, तो सबसे पहले उसे बाँहों में भरने की कोशिश करते हैं। फिर हथेलियों में समेटने का प्रयास करते हैं और आख़िर में अपने स्वादानुसार उस पूरे शहर को उँगलियों से छूकर लौट जाते हैं। जैसे उँगलियों की ज़द में सब कुछ तो होता है, लेकिन वे अकेले कुछ भी उठा नहीं सकतीं। ठीक वैसे ही चंद दिनों का पड़ाव आपको किसी शहर से मुख़ातिब तो ज़रूर करवा सकता है, लेकिन पूरी तरह मिलवा नहीं सकता।
यहाँ बात एक मशहूर शहर की है, जिसे लोग अनजाने में भी नवाबों से जोड़ते हैं और जहाँ आना मात्र ही मुस्कुराने का तकाक़ाज़ा है... ऐसा लोग मान चुके हैं। ज़िक्र लखनऊ का है और मेरा प्रयोजन नितांत सरकारी है।
ख़ैर, इसके पहले भी तमाम बार मेरा लखनऊ आना हुआ है, लेकिन किसी-न-किसी अकादमिक वजह से। इसी क्रम में 2017 में इस शहर के बारे में दो बातें बेहतर तरीक़े से महसूस हुई थीं, जो इस बार पूरी तरह सही साबित होती नज़र आईं।
पहली बात यह कि लखनऊ को धीरे-धीरे चंडीगढ़ बनाने का एक संगठित उपक्रम चल रहा है, जिसे यहाँ के लोग बड़ी सहूलत से क़ुबूल भी कर रहे हैं। हर जगह छोटे-बड़े कैफ़े, जिम, कुछ पब और तमाम ऐसे व्यावसायिक प्रतिष्ठान दिख रहे हैं जो शहर को मुंबई या दिल्ली जैसे महानगर की एक कमतर प्रतिकृति बनाने की हर संभव कोशिश करते हैं।
दूसरी बात शायद मेरे स्तर पर काफ़ी व्यक्तिगत हो सकती है। सत्ता का केंद्र होने के बावजूद, तमाम नेताओं की आरामगाह होने के बावजूद; यहाँ इलाहाबाद की तरह रोज़मर्रा के जीवन में राजनीति की वैसी हनक और दख़लंदाज़ी नहीं दिखती। पोस्टर दिखेंगे, क़ाफ़िले भी दिखेंगे, एसयूवी का दबाव भी दिखेगा; लेकिन यह सब कुछ अपेक्षाकृत कम परेशान करने वाला है।
लखनऊ के बारे में पहली सुकूनदेह बात है यहाँ प्रदूषण का तुलनात्मक रूप से कम होना। पुराने शहर का अपेक्षाकृत कम बंद और कम घुटन भरा होना, ट्रैफ़िक का बेहतर ढंग से नियंत्रित होना और शहर की पहचान बनाने वाली पुरानी संस्कृति का आज भी ज़िंदा रहना भी राहत देता है।
हम लोगों ने एक अनौपचारिक मुशायरे के लिए उर्दू अकादमी से तालिब साहब और उनके साथ अभिश्रेष्ठ जी को अपने प्रशिक्षण संस्थान में ही बुला लिया। ख़ूब क़िस्से चले। फिर उन्होंने बताया कि जो ख़ालिस पुराने लखनवी लोग हैं, उनका मिज़ाज ही अलग है। वे उर्दू अदब के श्रेष्ठ शाइर हो सकते हैं, लेकिन जीविकोपार्जन के लिए घड़ियाँ बनाते मिलेंगे... और उस पर भी मिज़ाज ऐसा कि शाइरी सुनाएँगे तो सिर्फ़ पुराने लखनऊ के मुशायरे में, कहीं और नहीं।
लखनऊ में चिकनकारी का भी बड़ा अजीब-सा बाज़ार है। पॉश इलाक़ों में तमाम चमचमाते शोरूम मिलेंगे, जहाँ कीमतें भी चमचमाती ही मिलेंगी, लेकिन विकल्प काफ़ी सीमित होंगे। दूसरी तरफ़ पुराने शहर के चौक वाले इलाक़े में बेइंतहा विकल्प हैं, दाम भी वाजिब हैं; लेकिन आप असली-नक़ली के फेर में फँस सकते हैं। वैसे पुराने शहर के लखनऊ चिकन एम्पोरियम में मलमल से लेकर कॉटन तक पर असली चिकनकारी की शिनाख़्त करना वे लोग ही बताते हैं। चिकनकारी की पूरी बाँह वाली शर्ट इलाहाबाद में आम तौर पर नहीं दिखती थी। यहाँ मेरे लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था।
ख़ैर, चिकनकारी को लेकर लखनऊ का मेरा अनुभव इतना-सा है कि आज के तमाम इंस्टाग्रामजनित, क्यूरेटेड गिफ़्ट्स की तुलना में चिकनकारी एक मुफ़ीद तोहफ़ा बन सकती है... और वह भी दोनों तरफ़ से।
जहाँ तक इत्र या अत्तर, जो भी ज़बान पर चढ़ जाए, का सवाल है; लखनऊ के पारंपरिक इत्र को नए खुले मॉल में परिष्कृत अंदाज़ में डियो के साथ बेचा जा रहा है। इससे बारीकी न जानने वाला ख़रीदार लखनवी इत्र खोजते हुए कोई अँग्रेज़ी डियो या सेंट ख़रीदकर भटक जाता है।
इस मामले में मेरा अवलोकन कमज़ोर ही रहा। प्रशिक्षण संस्थान की पाबंदियों के बीच पुराने शहर को दो-चार चक्करों में मापा तो जा सकता है, समझा नहीं जा सकता। इसलिए मुझे भी एक मॉल से ही फ़ारसी औद के नाम पर बेहद ख़ूबसूरत लकड़ी के संदूक़ में, एक पारदर्शी नक़्क़ाशीदार कटार में भरा हुआ इत्र ख़रीदना पड़ा। उसकी शुद्धता पर संशय तो है, लेकिन उसकी ख़ूबसूरती उस संशय पर भारी है।
चूँकि हम लोग प्रदेश सरकार के एक प्रशिक्षण संस्थान में सज्ज किए जा रहे हैं, इसलिए हर वक़्त इस दायरे से बाहर निकलने की तलब बनी रहती है। इसी क्रम में हम सबने अलग-अलग तरीक़ों से अलग-अलग लखनऊ देख लिया और अब एक-दूसरे को दिखा भी रहे हैं।
जो साथी अधिकारी पिछले एक या आधे दशक से लखनऊ में रह रहे हैं; उनका लखनऊ सिर्फ़ कैफ़े, मॉल और रेस्टोरेंट तक सिमटा हुआ है। कुछ साथी पहले यहाँ कॉलेज के दिनों में आए हैं। उनका सब कुछ देखने का तरीक़ा अलग है। ये लोग शहर को टटोलते हैं, अपना खोया हुआ समय खोजते हैं, अनसुनी जगहों पर जाते हैं और बाक़ी शहर में कम दिलचस्पी रखते हैं।
हमारा संस्थान गोमतीनगर में है, जो ख़ालिस कुलीन और नितांत पॉश इलाक़ा है। इसलिए यहाँ बहुत कुछ देखा जा सकता है, लेकिन सब कुछ नहीं। हमारे आस-पास तमाम मॉल और कैफ़े हैं। वे कमोबेश एक जैसे ही हैं, जहाँ आप किसी नई मजबूरी की वजह से ही बार-बार जाना चाहेंगे। हाँ, बिल्कुल बाहरी लोगों को यही सब किसी शहर के जीवन-स्तर की ऊँचाई भी लग सकता है।
किसान बाज़ार में, जहाँ क़तार में सिर्फ़ कैफ़े ही कैफ़े हैं, अपनी तफ़रीह पर भारी पड़ती है। इन कैफ़े में सिर झुकाकर काम करते तमाम कर्मचारियों की आँखों में गहराई तक मौजूद कशमकश और मजबूरी। पलासियो और लुलु मॉल में वैसे तो कुछ नया नहीं है; लेकिन यहाँ किसी को कम कपड़ों में देखने से पैदा होने वाली असहजता, अचरज और आनंद के बीच जो द्वंद्व है; वह किसी शहर की विकास-यात्रा के स्तर पर काफ़ी दिलचस्प लगता है।
पुराना शहर आज भी लखनऊ के माथे का परचम है। जो भी यहाँ कदम रखता है, वह एक ज़रूरी काम की तरह रूमी दरवाज़े पर हाज़िरी लगाने ज़रूर जाता है। वहाँ जाना भी चाहिए।
रूमी दरवाज़ा सामने से बेहद ख़ूबसूरत है। भीड़ के बावजूद दमघोंटू नहीं लगता। ताँगों का दर्शन होता रहता है, लेकिन सबसे निराशाजनक बात यह है कि यहाँ उसके शिल्प पर चर्चा करने का कोई ख़ास प्रयास नहीं दिखता। यहाँ सिर्फ़ फ़ोटोग्राफ़र मिलेंगे, मध्यकालीन इमारतों पर मिलने वाले गाइड नहीं। शायद कोई रूमी दरवाज़ा देखने भी नहीं आता, सब बस वहाँ दरवाज़े के साथ अपनी तस्वीर क़ैद करवाने जाते हैं।
सुबह और शाम में आपको दो अलग-अलग रूमी दरवाज़े मिलेंगे। शाम को सिर्फ़ रोशनी और फ़ोटोग्राफ़र मिलेंगे, जबकि सुबह कुछ ख़ालिस लखनवी नाश्ते वाले मिलेंगे। ताँगों की आवाजाही की वजह से आने वाली बदबू भी मिलेगी और मॉर्निंग वॉक करने वालों के लिए विशिष्ट जूस भी।
एक हाजी जी हैं, जो यूट्यूब पर काफ़ी वायरल हैं। उनका मट्ठा बिल्कुल लाहौरी लस्सी जैसा ही है। उनका अंदाज़ और हुलिया भी लखनऊ में लाहौर दिखा देता है, लेकिन उनका बन-मक्खन बिल्कुल कोलकाता या बॉम्बे वाला नहीं है। उसमें कोई विशिष्टता नहीं है।
आगे का पुराना शहर इलाहाबाद जैसा ही है। जैसे लोकनाथ की कचौड़ी चर्चित है, वैसे ही यहाँ दुर्गा खस्ता मशहूर है। प्रकाश की बहुचर्चित कुल्फ़ी बिना रबड़ी का एक फ़ालूदा ही है। शर्मा की चाय दिलचस्प है। पेपर कप में मात्र बीस रुपए में वह आपकी तलब और तुष्टिकरण, दोनों से ज़्यादा चाय दे देगा। लेकिन वहीं कटिंग चाय माँगने पर वह हॉर्लिक्स जैसा कुछ पेश करेगा, जो अतिशय मीठा भी हो सकता है।
‘सिटी ऑफ़ गैस्ट्रोनॉमी’ का ताज सँभालने के लिए फ़ूड वैली जैसी जगहें भी हैं। ये बेशक बेहतर हैं और नियंत्रित भी, लेकिन यहाँ कोई भी ज़ायका अपने मूल स्वरूप में नहीं मिलेगा। जापानी, कोरियाई और थाई के नाम पर मिला-जुलाकर कुछ भी परोसा जा रहा है। दूसरी तरफ़ राजस्थानी, पंजाबी और गुजराती व्यंजन आपस में घुलकर साउथ इंडियन व्यंजनों से वर्चस्व की लड़ाई करते दिखते हैं। यह जगह क्लाउड किचन की अर्थव्यवस्था का एक सम्मानजनक विस्तार है और इस स्तर पर सुकूनदेह भी। हाँ, मुग़लई व्यंजन, रामाश्रय का मलाई पान और कुछ हद तक मधुरिमा अपनी बादशाहत बनाए हुए हैं।
एक और बेहतर पहलू है : ऊपर जिन चमचमाते कैफ़े और मॉल का ज़िक्र किया, उनके इर्द-गिर्द विकसित होती ओपन माइक और थिएटर की संस्कृति। जहाँ हिंदी संस्थान, संस्कृत संस्थानम और उर्दू अकादमी होने के बावजूद सांस्कृतिक जीवन में एक ख़ास तरह की कमी महसूस होती है; वहाँ इन हस्तक्षेपों से कुछ हद तक उसकी भरपाई होती है।
दूसरा पहलू है व्यापक स्तर पर सिनेमाघरों और मल्टीप्लेक्सों का होना। सिनेमा देखने की संस्कृति और उसके विकल्प किसी शहर को हर स्तर पर समृद्ध करते हैं।
लखनऊ में नदी का मामला कुछ ऐसा है कि रिवर फ़्रंट तो है, लेकिन गोमती नदी को हर बार उचक-उचककर देखना पड़ता है। गणपति उत्सव और दुर्गा पूजा का भी पिछले एक दशक में काफ़ी विस्तार हुआ है। सबसे सूक्ष्म परिवर्तन लखनऊ विश्वविद्यालय के माहौल में आया है। अब इस विश्वविद्यालय में कहीं भी 2010 के पहले वाली छात्र राजनीति की धमक नहीं दिखती। छात्र संगठनों की उपस्थिति भी औपचारिक ही है। अब एक शहरी माहौल दिखता है; लेकिन सिर्फ़ विद्यार्थियों में, शिक्षकों में नहीं! कहीं-न-कहीं इसी माहौल को साधने के लिए कभी दिल्ली से कोई व्यापक पुस्तक प्रदर्शनी लखनऊ चली आती है, तो कभी मुंबई से कोई अपनी फ़िल्म का गाना लॉन्च करने विश्वविद्यालय पहुँच जाता है।
एक और बात ख़ास तौर पर ध्यान खींचती है। शायद इसी शहर में ऐसा देखने को मिलता है कि पुराने शहर और नए बसते-सजते शहर के बीच की दूरी पाटने बाज़ार आ गया है। पुराने शहर की पहचान बन चुके तत्त्व आपको नए मॉल में नुमाइशी, लेकिन नक़ली रूप में मिलेंगे। दूसरी तरफ़ पुराने शहर में चुपके से कैफ़े और मॉल भी घुसते दिखाई देते हैं।
मुझे तो लखनऊ बेहिचक बहुत अपना-सा लगता है। लेकिन जिनका लखनऊ अपना शहर है, अब तक उन्हें भी यह अपना लगता है या नहीं... यह तो वे ही बताएँगे।
इलाहाबाद में किसी से सुना था कि शाम-ए-अवध कहीं लाहौर की रात और दिल्ली की सुबह के बीच फँसी रहती है। उनका मानना था कि यहाँ न लाहौर जितनी गहराई है, न दिल्ली जितनी चमक। लेकिन इन दोनों शहरों के ज़रूरी तत्त्व यहाँ एक अलग अंदाज़ में मिलते हैं।
मेरा तो बस इतना मानना है कि जिसने भी लंदन देखा है, वह लखनऊ बिल्कुल न आए। लेकिन जिसने लंदन को बसते और बदलते नहीं देखा है, उसके लिए लखनऊ आना पलके झपकाने से ज़्यादा ज़रूरी है...
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