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मीडिया पर उद्धरण

मीडिया का सामान्य अर्थ

संचार-माध्यम है। समकालीन संवाद में यह मुख्यतः न्यूज़ मीडिया और सोशल मीडिया को सूचित करता है। मीडिया को लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में देखा जाता है। समय के साथ इसकी छवि सत्ता में अपनी हिस्सेदारी चाहते एक शक्ति-समूह के रूप में भी बनी है। इस चयन में मीडिया के सरोकारों से संबंधित विभिन्न विषयों पर संवाद करती कविताओं का संकलन किया गया है।

किसी भी प्रॉपगैंडा मॉडल में खुले बाज़ार की मान्यताओं में एक प्रारंभिक विश्वसनीयता होती है। ज़ाहिर तौर पर, प्राइवेट मीडिया, वे बड़े कोर्पोरेट हैं जो अन्य व्यापारों (विज्ञापनदाताओं) को एक प्रोडक्ट (पाठक और दर्शक) बेच रहे हैं। राष्ट्रीय मीडिया केवल अभिजात्य वर्ग के मुद्दों और धारणों पर ध्यान देती है। इससे जहाँ एक तरफ़, विज्ञापनों के चयन के लिए बढ़िया ‘प्रोफ़ाइल’ बनाने में मदद मिलती है, वहीं दूसरी तरफ़ ये निजी और सामाजिक क्षेत्रों में निर्णय-निर्धारण में भी ज़रूरी भूमिका निभाते हैं। अगर राष्ट्रीय मीडिया, दुनिया का एक संतोषजनक यथार्थवादी चित्रण नहीं करती तो वह अपने अभिजात्य दर्शकों की ज़रूरतों को पूरा करने में असमर्थ मानी जाएगी। यही मीडिया, दुनिया की जो व्याख्या करती है, उसमें इन अभिजात्य लोगों से भरे हुए सरकारी और निजी संस्थानों, ख़रीदारों, विक्रेताओं आदि की ज़रूरतों और चिंताओं का चित्रण भी उनका ‘सामाजिक उद्देश्य’ है।

नोम चोम्स्की

हिंदी पत्रकारिता बौद्धिक लिहाज़ से तो ऊँघती ही ऊँघती है; व्यावसायिक लिहाज़ से भी पुराने क़स्बों के आलसी, गप्पी, लद्दड़, दुकानदारों की तरह है, जिन्होंने बाजार बढ़ाने में नहीं, घटाने में एक भूमिका अदा की।

ललित कार्तिकेय

मीडिया का डर एक व्यर्थ का डर है।

केदारनाथ सिंह

उपभोक्ता समाज को टी.वी., रेडियो, कॉस्मेटिक्स और संचार के आधुनिक साधन चाहिए। कविता सबसे बाद में चाहिए, या फिर नहीं चाहिए। ऐसा एक समाज हमने बनाया है।

केदारनाथ सिंह

किसी ख़बर का पीछा कर उसे सबसे पहले पकड़ने के बदले उसके उत्स को खोजना ज़रूरी काम है।

सिद्धेश्वर सिंह

मेरा टेलीविज़न लगभग प्रलाप जैसी भाषा में जो लगातार बोलता रहता है, एक ख़ास तरह का प्रदूषण मेरी भाषा की दुनिया में—उसके ज़रिए भी फैलता है।

केदारनाथ सिंह

सूचनाएँ हमारे नरक की ख़बर देती हैं।

ज्ञानरंजन

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