बेटी पर बेला
हिंदी कविता में बेटियों
का आगमन उनकी आशाओं-आकांक्षाओं और नम्र आक्रोश के साथ हुआ है, तो पिता बनकर उतरे कवियों ने उनसे संवाद की कोशिश भी की है। प्रस्तुत चयन में इस दुतरफ़ा संवाद को अवसर देती कविताओं का संकलन किया गया है।
C/O बंगाल : देवी से बेटी तक : आगमनी-विजया गीतों में मानवीय दुर्गा का जन्म
गिरि, इस बार मेरी उमा आए तो अब उमा को नहीं भेजूँगी, मुझे कहकर लोग चाहे बुरा कहें, किसी की बात नहीं सुनूँगी। यदि आकर भोला [शिव] उमा को ले जाने की बात कहे, इस बार माँ-बेटी मिलकर करूँगी झगड़ा,
तेरह दिन की एक आत्मकथा
रहना यहीं था—इसी समाज में, घर के भीतर, घर के बाहर। घर भीतर ढूँढ़ते हुए अब, सब इधर-उधर था। कोई याद अपनी जगह पर नहीं मिल रही है इस जगह। अभी तो रहना है, यह सोचकर यादों को तरतीब देने का मन बना लिया।