Font by Mehr Nastaliq Web

प्रवासियों के संबंध में मेरे संस्मरण

prvasiyon ke sambandh mein mere sansmran

दीवान बहादुर पी. केशव पिल्ले

दीवान बहादुर पी. केशव पिल्ले

प्रवासियों के संबंध में मेरे संस्मरण

दीवान बहादुर पी. केशव पिल्ले

और अधिकदीवान बहादुर पी. केशव पिल्ले

    सन् 1876-77 के भीषण अकाल में—जब मैं केवल सोलह वर्ष का बालक था—मुझे पहले-पहल यह मालूम हुआ कि हमारे देशवासी अन्य देशों में बसने के लिए जाते या ले जाए जाते हैं। उसी समय मैंने आरकाटियों और एजेंटों को देखा, जो हृष्ट-पुष्ट मज़बूत मई-औरतों को भरती करके नेटाल और मारीशस भेजते थे। मुझे भी उन्होंने 50) रुपया मासिक की क्लर्की का लालच दिया था, परंतु मैं अपनी वृद्ध माता के विचार से उनके जाल में फँस सका। तभी से मैं प्रवासियों की बातों में दिलचस्पी रखता हूँ। मैं अकसर सुनता था कि भोलेभाले नवयुवक पुरुष-स्त्रियों को आरकाटी लोगों ने किस तरह बहकाकर लंका, मलाया, नेटाल और मारीशस आदि को चालान कर दिया है।

    भारतीय नेशनल कांग्रेस के सम्मुख प्रवासी भारतीयों का प्रश्न सबसे पहले मद्रास कांग्रेस में उठा था। उस समय मि. एल्फ्रेड वेब—कांग्रेस के सभापति—ने गूटी-पीपुल्स ऐसोसियेशन के, जिसका मैं मंत्री था, कहने पर, नेटाक्ष में भारतीयों के म्यूनिसिपल अधिकार छिन जाने पर प्रतिवाद किया था। तब से प्रवासियों के प्रश्न पर बराबर लोगों का ध्यान बढ़ता गया, और गांधाजी के दक्षिण अफ़्रीका के सत्याग्रह-संग्राम के समय से तो वह बड़ा महत्त्वपूर्ण हो गया है। जब से में मद्रास-कौंसिल में गया, तब से मैं अपनी क्षुद्र शक्ति के अनुसार बराबर प्रवासी भाइयों की सेवा करता रहा।

    औपनिवेशिक सरकारों ने कुलियों को बहकाकर इकट्टा रखने के लिए जो डिपो खोल रखे थे, उनमें भारतीय पुलिस तक को बिना इजाज़त जाने की मुमानियत थी। मैंने इसे दूर करने की कौंसिल में बढ़ी कोशिश की, परंतु वह बेकार हुई।

    भारत के गोरे प्लैन्टरों के फ़ायदे के लिए जो क़ानून बना था, उसमें काम छोड़कर चले आने वाले मज़दूरों के लिए सज़ा का विधान था। मैंने उसके विरुद्ध भी बहुत आंदोलन किया। इसी बीच में लंका की भारतीय कांफ़्रेंस का सभापति बनकर लंका गया। वहाँ मुझे भारतीय मज़दूरों की दुर्दशा प्रत्यक्ष देखने का अवसर मिला। वहाँ उनकी हालत देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैंने मद्रास-कौंसिल में उनके संबंध में बीसियों प्रश्न किए। देश में भी इस विषय पर ज़ोरदार आंदोलन हुआ, जिसका फल यह हुआ कि अब लंका, मलाया आदि में सरकार ने एजेंट और प्रवासियों के रक्षक (Protectors of Emigrants) नियत कर दिए हैं। फिर गांधीजी तथा स्वर्गीय गोखले और मि. ऐण्ड्रूज़ के ज़ोरदार आंदोलन से शर्तबंदी कुली-प्रथा उठा दी गई।

    कुली-प्रथाकी बंदी से ब्रिटिश-गायना और फिजी के प्लैंटरों का बहुत नुक़सान हुआ। प्रवासियों को बुलाने के लिए वहाँ से डेपूटेशन आए और उन्होंने प्रवासियों के लिए बड़ी अच्छी शर्तें पेश कीं। इस पर भारत-सरकार ने ब्रिटिश-गायना और फिजी को डेपूटेशन भेजने का विचार किया। ब्रिटिश-गायना के डेपूटेशन में जाने के लिए मद्रास-सरकार के ला-मेंबर ने मुझसे कहा। मैं जाने के लिए राज़ी हो गया। उस समय तक मेरे लिए ब्रिटिश-गायना, जमै का, ट्रिनीडाड आदि केवल भौगोलिक नाम थे। मुझे केवल यह ज्ञान था कि इन स्थानों में भारतीय कुली बनाकर भेजे गए थे। मैं 69 वर्ष का वृद्ध पुरुष था, इसलिए मैं अपने साथ अपने पुत्र श्री गोविंदाराज को भी ले गया था। मैं ही इस डेपुटेशन का सभापति नियुक्त हुआ था।

    डेपूटेरान यहाँ से रवाना होकर फ़्रांस होता हुआ इंग्लैंड पहुँचा। जाड़े के दिन थे। इंग्लैंड में बड़ी सर्दी पड़ती थी। वहाँ पहुँचकर मैं बीमार पड़ गया और तीन सप्ताह तक बीमार रहा। अच्छा होने पर मैंने तत्कालीन भारत मंत्री मि. मांटेग्यूस से भेंट की। उन्होंने कहा कि डेपुटेशन को निष्पक्ष होकर अपनी खरी-खरी रॉय देनी चाहिए। यहाँ मुझे श्रीयुत पोलक से भी बड़ी सहायता मिली।

    इंग्लैंड में डेयूटेशन के अन्य सदस्य श्री वेंकटेशनारायण तिवारी और मि. जी. एफ. कीटिंग मिले। उन्होंने कमज़ोर दशा देखकर भारत लौट जाने की सलाह दी, लेकिन मैं राज़ी नहीं हुआ और 19 जनवरी सन् 1922 को हम सब ब्रिटिश-गायना के लिए रवाना हुए।

    तूफ़ानी समुद्र होने के कारण जहाज़ पर हम सबको बड़ा कष्ट हुआ। अंत में 6 फ़रवरी को बारवेडोज़ द्वीप पहुँचने पर कुछ जान-में-जन आई। एक दिन यहाँ रहकर हम लोग आठवीं फ़रवरी को ग्रेनाडा पहुँचे। वहाँ से रात-भर समुद्र-यात्रा करके ट्रिनीडाड के बंदरगाह पहुँच गए। वहाँ रेवरेयड सी. डी. लाला, एम. एल. सी. ने हम लोगों का स्वागत किया। हम लोग जहाज़ पर चढ़े-चढ़े तंग गए थे, परंतु रेवरेयड सी. डी. लाला के मकान पर उनकी धर्म-पत्नी, लड़कियों और पिता ने हमारा जो स्वागत किया, उससे हमें बड़ी शक्ति मिली। लाला महाशय के पिता उस समय 104 वर्ष के थे। वे श्रीकृष्ण और भागवत पुराण पर हिंदी में ख़ूब बातें किया करते थे। यहाँ इम लोगों को हफ़्तों के बाद श्रीमती लाला ने बड़े प्रेम से भारतीय भोजन कराया। यहाँ से दूसरे दिन हम लोग फिर चले, और 12 फ़रवरी को ब्रिटिश गायना की राजधानी जार्जटाउन में पहुँच गए। यहाँ हमारे देश-वासियों ने बड़े उत्साह और प्रेम से हमारा स्वागत किया। एक दिन टाउन-हॉल में हम लोगों का सार्वजनिक स्वागत हुआ, जिसमें यहाँ के गवर्नर, उच्च अधिकारी और उपनिवेश-भर के भारतीयों के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

    गायना के तत्कालीन गवर्नर घर विश्वफ्रेड कालेट बड़े नम्र सज्जन थे, परंतु साथ ही ये पक्के बनिये भी थे। हम लोगों के गायना पहुँचने के दूसरे ही दिन उन्होंने हम लोगों को चाय पीने का निमंत्रण दिया। जब हम लोग गवर्मेंट-हाउस की सीढ़ियों पर पहुँचे, तो उन्होंने स्वयं आकर हमारा स्वागत किया तथा कमरे में ले जाकर हमें बिठलाया। उस समय उनका कोई शरीर-रक्षक भी उपस्थित नहीं था। उन्होंने स्वयं चाय उँडेलकर हम लोगों को दी और अपनी नम्रता से सबको बहुत प्रसन्न किया।

    कुछ दिन बाद हम लोग कौंसिल हॉल में एकत्रित हुए और हमारे डेपूटेशन के विषय पर वाद-विवाद प्रारंभ हुआ। इस अवसर पर गवर्नर महोदय सभापति थे। उन्होंने प्रवासियों के विषय की योजना उपस्थित की। मगर यह योजना उस योजना से एकदम भिन्न थी, जो आनरेबुल मि. लक्खू और नूनन के डेपुटेशन ने—जो भारत गया था—पेश की थी। पूछने पर गवर्नर ने कहा कि मि. लक्खू की योजना गायना-सरकार से स्वीकृत नहीं थी।

    तब हम लोगों ने अपनी जाँच आरंभ की। हम लोगों ने मज़दूरों के बास-स्थान देखे, भारतीयों के प्रतिनिधियों से बातचीत की, शकर की स्टेटों पर घूमे तथा सरकारी और ग़ैर-सरकारी लोगों की गवाहियाँ लीं। इन सब बातों में हमें यहाँ की सरकार से पूरी सहायता मिली।

    7 अप्रैल को हम लोग फिर जहाज़ पर चले और ट्रिनीडाड आए। यहाँ भी हमारे देशवासियों ने पोर्ट ऑफ़ स्पेन के कौंसिल-भवन में हमारा सार्वजनिक स्वागत किया। यहाँ के गवर्नर उसके सभापति थे। हम लोगों को अभिनंदन पत्र भी दिया गया, जिसका मैंने उत्तर दिया।

    अब हम लोगों ने जाँच शुरू की। मि. कीटिंग ने द्वीप के एक ओर जाँच आरंभ की और मैंने तथा श्री तिवारीजी ने द्वीप के दूसरी ओर, अपने देश-भाइयों और प्रोटेक्टर ऑफ़ इमीग्रांट की सहायता से जाँच-पड़ताल शुरू की। यहाँ से हम लोग 17 अप्रैल को रवाना हुए। मि. कीटिंग सीधे लंदन चले गए और हम लोग न्यूयार्क होकर लंदन गए।

    लंदन में हम लोग फिर एकट्ठे हुए और आपस में वाद-विवाद करके हम लोगों ने अपनी रिपोर्ट तैयार की। मि. कीटिंग के कुछ विचार हम लोगों के विचारों से एकदम भिन्न थे। अतः उन्होंने अपनी रिपोर्ट अलग दी, और मैंने और पंडित वेंकटेशनारायण तिवारी ने अपनी सम्मिलित रिपोर्ट अलग लिखी। इन दोनों रिपोर्टों को भाग्य-सरकार ने दो भागों में प्रकाशित किया है।

    ब्रिटिश-गायना में कई भारतीय जैसे मि. जे. ए. लक्खू, डॉक्टर ह्वारटव, मि. वीर स्वामी, और मि. श्रीराम आदि—बैरिस्टर, डॉक्टर और मैज़िस्ट्रेट आदि के उच्च पदों पर हैं। इन लोगों ने अनेकों कठिनाइयों को अतिक्रम करके समाज में उच्च स्थान प्राप्त किए हैं। बहुत से हिंदू, मुसलमान भी, जो यहाँ प्रवासी बनकर आए थे, आज अपनी मेहनत से धनी और संपत्तिशाली बन गए हैं। यहाँ 96,000 हिंदू, 18,000 मुसलमान, 11,000 भारतीय ईसाई और 244 पारसी हैं। यहाँ हिंदुओं के मंदिर और मुसलमानों की मस्जिदें हैं। यहाँ युक्तप्रांत-वासियों और मदरासियों में आपस में शादी-विवाह हो जाते हैं। यहाँ जात-पांत का विशेष बंधन नहीं है और खानपान ही का कोई विचार है।

    ट्रिनीडाड में हम लोग बड़े आनंद से रहे। रेवेरेराड लालाजी ने हमें घुमाया तथा हमें भारतीय मज़दूरों और किसानों से मिलने की सुविधा दी। हमने मि. सोब्रियन के घर की, जो एक सफल कोकोआ बनाने वाले भारतीय हैं, यात्रा भी की। मि. सिनानन ने, जो एक बड़े भारतीय व्यापारी हैं, हम लोगों को एक गार्डन-पार्टी दी, जिसमें हमें यहाँ के शिक्षित भारतीयों से मिलने का अवसर मिला। वहाँ के कॉलेज में यहाँ के मेयर की अध्यक्षता में भी एक सभा हुई, जिसमें श्रीयुत तिवारीजी ने भारतीय संस्कृति पर और मैंने अशोक और हरिश्चंद्र पर व्याख्यान दिए। यहाँ से चलते समय का दृश्य भी बड़ा करुणाजनक था और हमारे मित्र रैवरेंड लाला के तो आँसू झरने लगे थे।

    सन् 1927 में मि. सोब्रियन का एक पत्र मुझे मिला था, उसमें उन्होंने लिखा था—कल मैंने आपको पोर्ट ऑफ़ स्पेन गैज़ेट की एक कॉपी भेजी है। उसमें एक तार से मालूम होता है कि शायद कुँवर महाराज सिंह दक्षिण अफ़्रीका में भारत के एजेंट या कौंसिल नियत होंगे। आप नेता लोग इस बात की कोशिश क्यों नहीं करते कि प्रत्येक देश में जहाँ भारतीय बसे हों एक-एक कौंसिल नियत किया जाए?

    हम लोगों ने यही शिफ़ारिश की थी कि प्रत्येक उपनिवेश में भारत-सरकार का एक प्रतिनिधि रहना चाहिए। भारत से गए हुए प्रवासियों की संतानें अधिक साहसी और उदार होती है, अतः उनके संसर्ग और सहयोग से मातृभूमि का भी हित होगा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विशाल-भारत वर्ष-3, भाग-4 (पृष्ठ 14)
    • संपादक : बनारसीदास चतुर्वेदी, रामानंद चट्टोपध्याय
    • रचनाकार : दीवान बहादुर पी. केशव पिल्ले
    • प्रकाशन : विशाल-भारत कार्यालय
    • संस्करण : 1930

    संबंधित विषय

    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी

    ‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Lorem ipsum dolor sit amet, consectetur adipiscing elit. Morbi volutpat porttitor tortor, varius dignissim.

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY