मिथ्या के विरुद्ध दिन
mithya ke viruddh din
झुकते धरातलों संग लुढ़कते
निशाने नहीं चाहते
नहीं चाहते ऐसी आवाज़
जो हवा के
मेहराब और खुरदुरे को चुरा लें
नहीं जीना चाहते अनगिनत साँसों के लिए
आसमान के साथ ओछे धर्मयुद्ध
मौजूद पत्तियों पर बिना मोम चढ़ाए
अपनी पंक्तियों को बदलना नहीं चाहते
चुंबकों पर रोक नहीं चाहते
अंत में आकर जूतों के रेशें खुलने लग जाते हैं
कपोल कल्पनाओं को छूना भी नहीं चाहते
अपने सुनहरे बलूत बालों के
आख़िरी रेशे तक पहुँचने के लिए
खुले पटों को जीतना नहीं चाहते
अपने पत्ते स्थान पर लगाते हुए पेड़
नहीं चाहते आकर्षित करना बिना कोलाहल के
वे अस्थावर शब्द।
- पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
- संपादक : अविनाश मिश्र
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक रिया रागिनी, प्रत्यूष पुष्कर
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