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बँटवारा

bantvara

यी संग ह्वा

यी संग ह्वा

बँटवारा

यी संग ह्वा

और अधिकयी संग ह्वा

    क्या हमें होना चाहिए अलग, होना चाहिए हमें, तुम्हें और मुझे?

    हमने प्यार किया गांधर्व, बिना जाने कि कभी होंगे अलग।

    हो जाएँगे अलग बिना जाने किसी के।

    उत्तेजना में काँपते हैं मेरे ओंठ और मेरा दिल

    नहीं ले सकता साँस भी, बोल तो उस से भी कम पाता हूँ।

    मैं कैसे मूँद सकता हूँ आँखें तुम्हारे हृदय की वेदना से

    जबकि हो ही चली हों लगभग सपने-सी, ज़िंदगियाँ हमारी इसी रात।

    मेरे प्यार, घिरा आकाश देखो

    देखो यह पृथ्वी, होने ही को है जो ग़र्क़,

    देखो, क्या हूँ मैं जीवित आज भी कल जैसा ही, मेरे प्यार?

    क्या जीवित हो तुम भी, बैठी मेरे पास, सचमुच?

    क्या हो जाना चाहिए हमें अलग, हो जाना चाहिए हमें,

    तुम्हें और मुझे।

    आओ, हो जाएँ हम सितारे, देख तो सकें एक दूसरे को

    अच्छा ही होगा न, अलग-अलग रहने से, अलग-अलग सोचने से?

    क्या प्यार केवल हँसी है

    अस्थिर दिमाग़ पर मात्र एक कंपन?

    क्या मौसम में गर्वित होता है फूल

    और नष्ट हो जाता है फिर गिरकर मौसम के बाहर?

    क्या केवल इंतज़ार में पाया है तुमने विश्वास प्यार का?

    क्या घृणा में पाया है तुमने अकेलापन प्यार का?

    मैंने क्यों की घृणा होने के लिए दुःखी,

    क्यों उड़ाया मज़ाक ढूँढ़ते हुए ख़ुशी?

    मेरे प्यार, मंडराती है काली छाया हमारे दिमाग़ों पर

    वहाँ, जहाँ नहीं होती कोई भी सरहद

    जैसे नहीं होती जल और जल के मेल में,

    हमने प्यार किया चोरी छिपे, बिना जाने

    कि हो जाएँगे इम अलग, चोरी छिपे ही

    आओ बन जाएँ हम बुलबुले और रोएँ ख़ून के आँसू।

    आदमियों की तरह बँटकर रहने से तो अच्छा ही होगा न?

    आओ और जकड़ लो मुझे अपनी देह से पूरी तरह

    मैं चाहता हूँ एक हो जाएँ हमारे हृदय 'वेल्ड' होकर।

    आओ छोड़ दें हम ख़ुद को, होने को बेफ़िक्र

    मूँद कर आँखें, आपसी शर्म और विश्वास में।

    क्या ये लकीरें तुम्हारे चेहरे पर कारण हैं बँटवारे के दुःख की?

    जाओ मेरे पास दूर कर बँटवारा

    जाओ मेरी बाँहों में

    उत्सुक हैं जो बाँधने को

    तुम्हारी हाथी दाँतों-सी कमर को।

    मेरे प्यार अपना हाथ दो, मेरे हाथ में।

    दिखते हैं अँधेरे में तुम्हारे मोम रंगे हाथ

    मेरे प्यार मुझसे बोलो, मेरी आँखों से

    उपयुक्त होते हैं मौन शब्द, सन्नाटे के लिए।

    क्या होना चाहिए हमें अलग, होना चाहिए हमें, तुम्हें और मुझे?

    क्या हम डूब जाएँगे समुद्र में और हो जाएँगे नागराज

    और नागरानी? पागलपन में?

    हो जाने की बजाए अलग?

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव (पृष्ठ 202)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : यी संग ह्वा
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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