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कहीं बिसराई कइसे

kahin bisrai kaise

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

कहीं बिसराई कइसे

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    आजी के माई का आँखिन के ममता

    प्रेम कहीं बिसराई कइसे अपना मन से

    कवनो धन ना कर पाई जेह धन के समता

    सब वंचित हो गइल आज बा ओही धन से।

    आपन रहे, करेजा ऊहे काट रहल बा

    गंगा जी के देखीं उल्टा धार बहत बा

    देख-देख सब आज करेजा फाट रहल बा

    अपना छाती पर अपनन के मार सहत बा।

    लोग सहत चुपचाप समय के फेरा बाटे

    आगे कइसन दिन आई मन काँप रहल बा

    अगल-बगल कइसन दुख के घेरा बाटे

    आपन बनल रहल जे हरदम चाँप रहल बा

    अकसरूआ में याद बहुत सबकर आवेला

    मन अँचरा के छाँह बइठ के सुख पावेला।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 38)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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