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जनता चुप बा

janta chup ba

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

जनता चुप बा

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    जनता चुप बा, अपना करनी के फल पाके

    बात समझ में आवत नइखे डर काहे के

    सुगबुगात नइखे केहू बस सोझा के

    समय गइल बा नेतन के घर ढाहे के।

    जे ना देखले बा गोठहुल जिनिगी में अपना

    देख-देख ढेरी भुंसहुल के बउराइल बा

    बइठल-बइठल दिनवो में देखत बा सपना

    मद के घोड़ा पर बइठल अति अगराइल बा।

    कइसन मूँग दरत बा बाबू बइठल-बइठल

    बे दरदी से छाती पर जनता के देखीं

    ताव मोंछ पर दे के घूमे अइँठल-अइँठल

    परल हुलासे पानी, ऐनक खूब निरेखीं

    लिहीं लुकारी हाथ, चलीं चल के जारीं जा

    सोना के लंका रावन के छार करीं जा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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