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घर अन्हरिया के सुरूज

ghar anhariya ke suruj

मिथिलेश ‘गहमरी’

मिथिलेश ‘गहमरी’

घर अन्हरिया के सुरूज

मिथिलेश ‘गहमरी’

और अधिकमिथिलेश ‘गहमरी’

    घर अन्हरिया के सुरूज बिनु जगमगाई ना कबो

    जुगनुअन से, रात के करिखा पोछाई ना कबो

    मन के कहना बा, कि तू अपना करम पे ध्यान दऽ

    जग कहत बा, नीम के जाई तिताई ना कबो

    ताँत के, तागा के, चाहे होखे रेशम तार के

    जाल से, दरियाव के रस्ता बन्हाई ना कबो

    लोग, जग में केतनो समरथवान हो जाई, मगर

    रीन माई के, तऽ केहू से भराई ना कबो

    साँच के हाथे, हमेशा झूठ के हारे के बा,

    चान, सूखल झील में तऽ झिलमिलाइ ना कबो।

    रार अमरित पर भइल अइसन कि लागत बाटे अब

    साथे मिलजुल के समुन्दर फिर मथाई ना कबो

    मन के मठिया पर किचाइन ना रुकी 'मिथिलेश' तऽ

    केहू गोहरावत रहे, तोहके सुनाई ना कबो

    स्रोत :
    • पुस्तक : केकरा से माँगीं अँजोर (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : मिथिलेश ‘गहमरी’
    • प्रकाशन : सत्यांश उपक्रम (प्रा.) लिमिटेड, बलिया
    • संस्करण : 2019

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