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आउ, हम वसन्तकेँ बजाबी

aau, hum vasantken bajabi

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

आउ, हम वसन्तकेँ बजाबी

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    आउ, हम वसन्तकेँ बजाबी!

    फागुनमय एक गीत गाबी!!

    मलयानिल कहबैए जे हवा

    तकरे किरिया, अहाँ नाचू!

    पेटक उपरागकेँ बिसरि

    हृदयक अनुराग-राग बाँचू!

    आउ, समय-सालकेँ नचाबी!

    फागुनमय एक गीत गाबी!!

    उजरा गहुमक रोटी-जकाँ

    नभ चन्द्रमा चमकैए

    वातावरणक कण-क्षण, आह!

    माँसु-भात बनि गमकैए

    आउ, दुःख-वेदना पचाबी!

    फागुनमय एक गीत गाबी!!

    कतबा दिन धरि भूखल देह

    नेहकेँ भम्होरत-काटत?

    रित्ती-रित्ती धोतीपर—

    के सभ दिन चिप्पी साटत?

    आउ, नवीनता जगाबी!

    फागुनमय एक गीत गाबी!!

    कुर्सी-तुर्सीक मोह त्यागी

    पटियाकेँ सेज कहब हम

    आकुलता अभावसँ

    सरिपहुँ परहेज करब हम

    आउ, असंतोष भगाबी!

    फागुनमय एक गीत गाबी!!

    सुविधा सीमा-विहीन अछि

    इच्छा-पाँखिएँ उड़ैए

    गगनक आगुओ तँ गगन

    अन्तरिक्ष बनि नमरैए

    आउ, शान्ति-सागर लहराबी!

    फागुनमय एक गीत गाबी!!

    आमक मज्जर कहैए

    मौसिम मधुमासक अछि

    मनमे ऋतुराज जँ अँटय

    द्वेष-क्लेश-नाशक अछि

    आउ, सुधा रस छलकाबी!

    फागुनमय एक गीत गाबी!!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 63)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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