Font by Mehr Nastaliq Web

व्यर्थ बाँग देलक मुर्गा

vyarth baang delak murga

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

व्यर्थ बाँग देलक मुर्गा

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    व्यर्थ बाँग देलक मुर्गा,

    भिनसरो लगैए साँझ-सन,

    मोनक राधा मोर-मुकुट पहिरनहुँ लगइछ श्याम-सन!

    दिन छल चैतन्यक—

    जहिया गीत नचैत-गबैत छल

    चेतनताकेर महामंत्रकेँ—

    अवचेतनो बँचैत छल

    आब बादलो नहि गरजैए,

    बिजुरी नहि लरजैत अछि,

    आशा तथा निराशामे टक्कर चलैत अछि जाम-सन!

    आइ हमर विद्यापति—

    हमरेसँ रूसल रहि रहल छथि

    हमरे कालिदास दुष्यन्तक—

    विस्मृतिकेँ सहि रहल छथि

    शकुंतला नहि आब—

    हमर कण्वाश्रममे रहि पबै छथि,

    हमरे आँखि दृष्टिगत होइछ हमरे दुष्परिणाम-सन!

    जाउ कतय, सभ धाम वाम अछि

    शरदो ऋतु दऽ रहल घाम अछि

    मुँह नुकबैत रहैत सत्य अछि

    मिथ्याकेर ताम-झाम अछि

    व्यर्थ भेल लगइत अछि अरिपन,

    दाँते देखा रहले अछि दर्पण,

    नेह-विहीन देह अछि लगइत पाथर-ईंटक झाम-सन!

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 19)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY