DJ वाले बाबू आजकल बिहार में जो बजा रहे हैं...
कुमार केशव
22 मई 2026
अगर किसी विदेशी शोधार्थी को बिहार का समकालीन समाज समझाना हो, तो मैं उसे एक क़स्बाई शादी में भेजना पसंद करूँगा। वहाँ उसे बिहार के बारे में लगभग सब कुछ मिल जाएगा। शहरों की शादियाँ मशीनी हो गई हैं। वहाँ सब कुछ कैमरे के लिए हो रहा है और स्टोरी और स्टेटस के लिए हो रहा है।
बैंक्वेट हॉल में घुसने से पहले गाड़ियों के बोनट पर बोतलें सजती हैं। जल्दबाज़ी में जाम गटकाए जाते हैं। शराब शिराओं में ठीक से घुल भी नहीं पाती कि खाना खुल जाता है। मज़ा तो क़स्बों और ग्रामीण अंचलों की शादियों में है, जहाँ आधुनिकता अपने नवीन अवयवों के साथ पहुँची तो है, लेकिन ग्राम्य-रस की फुहार भी बराबर उपलब्ध है।
गाँवों की शादियाँ सिर्फ़ इवेंट नहीं हैं, अपितु वे व्यक्तिगत कलाओं का सामूहिक प्रदर्शन हैं। मोहल्ले की शादी में पूरा समाज चरित्र अभिनेता बन जाता है। एक आदमी इधर से उधर सिर्फ़ इसलिए दौड़ रहा है, क्योंकि उसे लगता है कि अगर वह नहीं दौड़ा तो शादी रुक जाएगी। एक चाचा हैं जिन्हें अपनी शादी में HMT की घड़ी मिली थी। वह घड़ी आज भी सिर्फ़ शादी-ब्याह में ही बाहर निकलती है। वे हर पाँच मिनट पर घड़ी को घूरते हुए पूछ रहे हैं, “आईसक्रीम खुला कि नहीं?’’ तीन किशोरवय लड़के DJ वाली ट्रॉली के पास ऐसे जम गए हैं, जैसे उनके घरों में LPG सिलिंडर की आपूर्ति यहीं से होगी। दूल्हे के कुछ दोस्त नागिन डांस के लिए ऐसे कटिबद्ध हैं, जैसे संस्कृति मंत्रालय ने उन्हें निजी ज़िम्मेदारी देकर भेजा हो। कुल-मिलाकर शहरों में ये दृश्य कम ही देखने को मिलते हैं।
मुझे कोई चार साल बाद अपने सूबे (बिहार) की दो शादियों में शामिल होने का मौक़ा मिला। इस दौरान भीतर का पत्रकार लगातार यह टटोलता रहा कि क्या बदला है और अब क्या चल रहा है! इस प्रसंग में मुझे सबसे बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि DJ-कल्चर ने बैंड-बाजे को लगभग विस्थापित कर दिया है। बारात तो छोड़िए, पारंपरिक विधि-विधानों से ढोल-बाजे नदारद हैं। शायद ‘डिमांड-सप्लाई’ का असर है। इसका कारण यह है कि ढोल-बाजा हर कोई बजा नहीं सकता। छोटी सी छोटी बैंड-पार्टी में भी आठ-दस लोग तो होंगे ही। नए लड़के इस पेशे में उतरना नहीं चाहते। उनके पास इस हुनर को सीखने का न धैर्य है, न उन्हें इसमें भविष्य दिखता है। DJ-सिस्टम तो कोई भी ख़रीदकर भाड़े पर चला सकता है और लोगों को भी यह सस्ता पड़ता है।
ख़ैर, बात DJ पर निकली है तो DJ पर ही रहेगी; क्योंकि DJ पर गाने सिर्फ़ बजते नहीं, हमला करते हैं। उन्हें इग्नोर तो क़तई नहीं किया जा सकता। दीगर बात यह रही कि जिस प्लेलिस्ट पर ‘लॉलीपॉप लागेलू...’ या किसी अन्य चिर-परिचित भोजपुरी गाने का एकछत्र राज होता था, वहाँ इस बार कुछ नया था। इस बार DJ पर धकाधक मगही गाने बजते सुनाई दिए। मगही यानी मागधी (मगध की बोली) जो मुख्यतः बिहार के गया, नवादा, जहानाबाद, नालंदा और पटना के ग्रामीण हिस्सों में बोली जाती है।
मगही का यह उभार मन को छू गया। ऐसा नहीं है कि मगही कविताएँ हमने पहले नहीं सुनी या पढ़ी हैं। मगर भोजपुरी और मैथिली के बढ़ते बितान में मगही लंबे समय से सिर्फ ‘घर की बोली’ ही रही। सार्वजनिक मंचों पर उसका प्रतिनिधित्व न के बराबर रहा है। भोजपुरी की तरह न तो उसे बाज़ार मिला, न ही मैथिली की तरह प्रतिष्ठा; लेकिन दादी-नानी के लोक-क़िस्सों, नुक्कड़ों की बहसों और खेतों की मेंड़ों से निकलकर मगही अब DJ पर फ़ुल वॉल्यूम बज रही है। यह अपने आपमें एक अनूठी सांस्कृतिक घटना है। स्थानीय बोलियों को इस तरह मुख्यधारा में आते देखना और लगभग डेढ़-दो करोड़ की आबादी को बाज़ार द्वारा टैप करते देखना एक सुंदर भाषाई लोकतंत्र की अनुभूति देता है।
लेकिन लोक का यह पुनर्जागरण उतना सहज और ईमानदार भी नहीं है, जितना यह पहली नज़र में दिखता है। कर्णभेदी DJ पर लूप में बजते इन गानों को थोड़ा ध्यान से सुनने पर एक अजीब-सी बेचैनी भी महसूस हुई। इन आधुनिक लोकगीतों में प्रेम कम है, पावर अधिक; रोमांस कम है, रंगदारी अधिक। संवेदना नगण्य है, शोर भरपूर। यहीं आकर बात सिर्फ़ संगीत या मनोरंजन तक महदूद नहीं रह जाती, यह शुद्ध रूप से समाजशास्त्र हो जाता है। लोकगीत हमेशा से हमारे समाज का आईना रहे हैं। बिहार के पुराने लोकगीतों को याद कीजिए। उनमें प्रेम और बिछोह था, फागुन और सावन था, नदियाँ थीं, धान रोपती औरतें थीं, प्रवासी पति का इंतज़ार था। अब उसमें थाना है, कट्टा है, स्कॉर्पियो है और इस सबके ऊपर सवार है—जातीय वर्चस्व का एक फ़र्ज़ी आत्मविश्वास।
म्यूजिक-इंडस्ट्री के इस नए पैटर्न को देखें तो समझ आता है कि पंजाबी पॉप ने जिस तरह सालों पहले एक ‘जट्ट, गड्डी और गन’ का यूनिवर्स बनाया था; ठीक उसी तर्ज़ पर बिहार में एक ‘रंगदार सिनमैटिक यूनिवर्स’ रचा जा रहा है। तकनीकी रूप से देखें तो इन गानों की धुनें लगभग एक जैसी हैं। अस्ल आवाज़ चाहे जैसी हो, ‘ऑटो-ट्यून’ के बेजा इस्तेमाल से सारे गायक एक ही सॉफ़्टवेयर की औलाद लगते हैं। देखा जाए तो इन गानों की प्रोडक्शन कॉस्ट बहुत ज़्यादा नहीं है, लेकिन विजुअल्स में साउथ की फिल्मों का प्रभाव और पंजाबी गानों जैसे गन-कल्चर थोपने की पूरी कोशिश की गई है।
सबसे बड़ा संकट इन गानों के बोल और उनकी सामाजिक कल्पना का है। बारात में जिन गानों पर लोग-बाग़ आजकल थिरक रहे होते हैं; उनमें गोली चलाना कोई अपराध नहीं, बल्कि एक उपलब्धि की तरह प्रस्तुत होता है। पुलिस से भागना किसी क़ानून-व्यवस्था की धज्जी उड़ाना नहीं, एक रोमांचक एडवेंचर बताया जा रहा है। किसी जाति विशेष का होने भर से पूरे ज़िले को हिला देने का दावा किया जा रहा है। रंगदार होना, सरेआम तमंचा लहराना और क़ानून को ठेंगे पर रखना एक ऐसे ‘भौकाल’ की तरह पेश किया जा रहा है, मानो यह सबसे आदर्श बात हो।
दरअस्ल, यह बदलाव सिर्फ़ संगीत का सतही बदलाव नहीं है। यह बिहार के युवा-वर्ग की गहरी मानसिक बेचैनी है जो मॉडर्न भी हुआ चाहता है और पुराने सामंती प्रतीकों को भी त्यागना नहीं चाहता। उसकी सामाजिक कल्पना अभी भी जाति, बाहुबल और स्थानीय वर्चस्व की पुरानी बैटरी से ही चल रही है। यही कारण है कि जब वह आर्थिक या शैक्षणिक रूप से ख़ुद को आधुनिक रेस में पीछे पाता है, तो वह गानों में ‘रंगदार’ और ‘बाहुबली’ दिखने को ही अपनी अंतिम आकांक्षा बना लेता है।
यह कहना होगा कि स्थानीय बोलियों का DJ-प्लेलिस्ट तक पहुँचना और सामूहिक आयोजनों में गूँजना भाषाई रूप से तो अच्छा है, लेकिन जब लोक-संस्कृति की आत्मा में तमंचे की नाल घुसा दी जाए; तो वह कला नहीं, एक सांस्कृतिक प्रदूषण बन जाती है। जिस उम्र में युवाओं के हाथ में डिग्री, रोज़गार और बेहतर भविष्य के सपने होने चाहिए; उन्हें ‘जेल-यात्रा’ के शौक़िया और ख़तरनाक शग़्ल बेचे जा रहे हैं। बारात में ऐसे गानों पर झूमते लड़कों को देखकर लगा कि बारूद सिर्फ़ तमंचों में नहीं भरा जा रहा, उसका थोड़ा-थोड़ा हिस्सा DJ के स्पीकरों से भी समाज के भीतर उड़ेला जा रहा है।
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बेला पॉपुलर
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