फ़ीफ़ा, मैकडॉनल्ड्स और बीस साल पहले का इलाहाबाद
अभिषेक कुमार सिंह
22 मई 2026
इस दफ़ा फ़ुटबॉल विश्वकप की मेज़बानी अमेरिका, कनाडा और मेक्सिको संयुक्त रूप से कर रहे हैं और दबी-दबी-सी चर्चा है कि भारत में कोई भी ब्रॉडकास्टर इसके प्रसारण अधिकार ख़रीदने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है। डिज़्नी हॉटस्टार ने इतनी नाकाफ़ी दर पर बोली यह कहकर लगाई है कि भारत में फ़ुटबॉल देखने की आदत और तलब बहुत सीमित है, जो सिर्फ़ नफ़ीस दिखने के लिए फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप देखते हैं वो इतने भी यूरोपियन नहीं हैं कि अमेरिका के समयानुसार भारत में रतजगा करें; फिर सिर्फ़ पश्चिम बंगाल और केरलम के लिए प्रसारण अधिकार ख़रीदने पर चीज़ों का कुछ ख़ास कॉरपोरेटाइज़ेशन हो भी नहीं सकता।
इस दलील, इस मौक़े और ठीक इस मौसम में मुझे साल 2006 का फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप और बीस साल पहले का इलाहाबाद टूटकर याद आने लगा है...
पीछे मुड़कर देखने पर आज यह लगता है कि 2005 और 2006 में अनचाहे तौर पर कई ऐसे संयोग बने जिससे फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप हमेशा बहुत क़रीब और बहुत अज़ीज़-सा लगता है। 2006 में आज जैसा कुछ भी नहीं था, कुछ भी नहीं मतलब कुछ भी नहीं, न फ़ीफ़ा के सोशल मीडिया पेज थे, न इन्फ़्लुएंसर्स; लेकिन तब भी आज ही की तरह फ़ुटबॉल देखना ख़ालिस इलीट शौक़ था। पर इन सबके ख़िलाफ़ आज से बीस साल पहले इलाहाबाद में फ़ुटबॉल और फ़ीफ़ा उतनी ही तेज़ी से दाख़िल हुए जितनी तेज़ी से पश्चिम बंगाल में बीजेपी। हुआ कुछ यूँ कि हिंदुस्तान मीडिया समूह के द्वारा प्रकाशित, तब की सबसे इंटेलेक्चुअल मानी जाने वाली बाल पत्रिका ‘नंदन’ ने एक फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप विशेषांक निकाल दिया, तब ‘नंदन’ ने बाल साहित्य और बाल साहित्य पत्रकारिता में इतना बेहतर काम किया था कि अँग्रेज़ी में कहे तो फ़ीफ़ा के बारे में फ़्रेम पोल टू पोस्ट सबकुछ उन पन्नों में क़ैद कर दिया गया था। अब शायद ही कोई यह माने कि तीसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे को मेराडोना, पेले, बेकहम, फ़ीफ़ा का इतिहास, भारत के फ़ुटबॉल जगत से निष्कासन सब के बारे में बस एक पत्रिका से पता चल गया। मुझे उरुग्वे जैसा कोई देश है—यह ज्योग्राफ़ी की किताब में नहीं ‘नंदन’ से पहली बार पता चला था। जुलिए रीमे के बारे में मैंने किसी जीके की किताब में नहीं, बल्कि ‘नंदन’ में ही पढ़ा था। आज़ाद भारत को स्पाइक्स से परहेज़ था, इसलिए फ़ुटबॉल जगत को भारत से परहेज़ हो गया। ये सब बातें मुझे ‘नंदन’ से ही मालूम चली थीं और आज यह कहना अतिशयोक्ति ही है लेकिन यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि पहली बार उस ‘नंदन’ से ही पता चला कि दक्षिण अमेरिकी समाज कैसा और क्यों है, वहाँ फ़ुटबॉल और कम्युनिज़्म की जड़े इतनी गहरी क्यों हैं...
वैसे आज पाँच साल हो गए ‘नंदन’ को बंद हुए और उससे भी ज़्यादा दिन हो गए ‘नंदन’ की संपादक मृणाल पांडे को ट्विटर पर बदनाम हुए; यह शायद शोध का विषय है कि एक बाल साहित्य पत्रिका की संपादक की भाषा काग़ज़ से मोबाइल पर आते ही इतनी विवादास्पद कैसे हो सकती है? पता नहीं क्यों जिस लेखनी से बच्चे इतना मुतासिर रहते थे, उसकी बड़े इतनी मुख़ालफ़त क्यों करने लगे?
ख़ैर ‘नंदन’ तो अपनी जगह है ही, बीस साल पहले इलाहाबाद में एक और बहुत ही ग़ैर-इलाहाबादी हस्तक्षेप हुआ था, कॉफ़ी हाउस वाले इलाहाबाद में अमेरिका वाला मैकडॉनल्ड्स खुल गया था। था तो ये इलाहाबादी मिज़ाज के ख़िलाफ़ लेकिन उस समय जितनी हवा, जितनी चर्चा मैकडॉनल्ड्स की हुई थी उतनी दिलचस्पी इलाहाबादियों ने आज हज़ार इन्फ़्लुएंसर्स के बाद भी स्टारबक्स में नहीं ली। मैकडॉनल्ड्स के आउटलेट को देश के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सिविल लाइंस वाली कारोबारी संपत्ति में जगह मिली थी। पुराने इलाहाबादी बड़े शौक़ से बताते हैं कि नेहरू के इलाहाबाद में राजीव की सरकार गिराने वाले वीपी सिंह के लिए ‘राजा नहीं फ़कीर है, भारत की तकदीर है’, नारा लगता था। मंडल से पूरा देश जल उठा था, लेकिन प्रतियोगी छात्रों की राजधानी इलाहाबाद में आज भी राजा मांडा के लिए माक़ूल सम्मान और मुकम्मल सहानुभूति मौजूद है। प्रतापगढ़ के राजनीतिक विश्लेषक और मठाधीश डॉट कॉम के संपादक सौरभ सोमवंशी कहते हैं, “राजा मांडा नेहरू से कम नहीं थे, उनकी कविताएँ और नज़्में सावरकर को टक्कर देती थीं, अफ़सोस है लोगों को आम्बेडकर याद रह जाते हैं और विश्वनाथ प्रताप सिंह भुला दिए जाते हैं”; जो भी हो समाजवाद के झंडाबरदार राजा साहब के कंधे पर ही पूँजीवाद इलाहाबाद में दाख़िल हुआ था...
ख़ैर वापस आते हैं—मैकडॉनल्ड्स का ऐसा क्रेज़ था कि लोग शांति कुल्फ़ी के बाहर खड़े होकर, उसे आँखभर देखने वहाँ जाया करते थे। गंगापार और यमुनापार के इलाहाबादी तो बस एक बार उस चलने वाली सीढ़ी का अनुभव लेने और मैकडॉनल्ड्स को घूरने वहाँ तक घूम आते थे। 2006 में खुलते ही मैकडॉनल्ड्स ने कुछ महीनों तक सब कुछ फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की थीम पर ही रखा था। बर्गर से लेकर फ़्रेंच फ़्राई तक वर्ल्ड कप थीम्ड रैपिंग में पेश किए जाते थे। मुख्य आकर्षण था फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप फ़ैमिली पैक जो उस समय शायद ढाई सौ या तीन सौ रुपए का था। स्कूल से लेकर कॉलोनी के बच्चों सबमें मैकडॉनल्ड्स की तिलस्मी कहानियाँ दिन-रात तैरा करती थीं; और हाँ एक वर्ग जिसमें मेरे स्कूल की टीचर्स और उनके बच्चे थे, वो मैकडॉनल्ड्स को McD कहा करते थे। ये ज़्यादा इलीट और ख़ालिस अँग्रेज़ीदाँ था, तो हम लोग भी इस संबोधन की नक़ल करने का भरपूर प्रयास करते थे। McD वाले संबोधन के पीछे इलाहाबाद का एक अपना कंटेंपरेरी इतिहास उभर कर आ रहा था; आज ऐसा नहीं है लेकिन पंद्रह-बीस साल पहले तक पूरे शहर की स्कूली व्यवस्था का एपिसेंटर सिर्फ़ चार स्कूल हुआ करते थे। बाक़ी सारे स्कूल चाहे जो उनसे अच्छा रिजल्ट दें, उनसे महँगे हो, यहाँ तक कि एक-दो ऐसे स्कूल थे जिनमें तब के तत्कालीन राष्ट्रपति कलाम साहब भी आकर गए थे, वो भी ख़ुद को उन चार क्रिश्चियन मिशनरी स्कूलों से कमतर ही मानते थे। इन चार स्कूलों की वजह से ही पूरे इलाहाबाद में कुलीनता और मध्यमवर्गीय कुंठा के द्वंद्व को मज़बूती मिली।
सारे शहर की स्टेशनरी की दुकानें और अँग्रेज़ी नॉवेल और खेल-पत्रिकाओं का कारोबार भी इन्हीं चार क्रिश्चियन मिशनरी के स्कूलों से ही निर्देशित होता था। फ़ुटबॉल, McD और हैरी पॉटर का क्रेज़ सब इन्हीं लोगों की देन था। एक और बात जो शायद आज कोई ही माने, उस समय जब जे.के. रोलिंग ने ‘हैरी पॉटर’-शृंखला की छठी किताब लिखी थी, हॉफ़ ब्लड प्रिंस वाली। उसकी प्रिंट कॉपियाँ इलाहाबाद में ब्लैक में ख़रीदी-बेची जा रही थी; वह किताब शायद आठ-नौ सौ रुपए की थी और सिविल लाइंस के बहुप्रतिष्ठित किताबघर ढाई-तीन सौ में पाइरेटेड मुंबई या दिल्ली से मँगाकर बेच रहे थे। यह किसी शहर के अँग्रेज़ियत के प्रति पागलपन को ही दिखाता है कि जब एमेजॉन और फ़्लिपकार्ट नहीं थे, तब भी ब्रिटिश स्लैंग्स में लिखी गई काफ़ी मोटी किताब पीछे के दरवाज़े से निकाली जा रही हो। मैंने भी एक बार उस हॉफ़ ब्लड प्रिंस वाली किताब को सिविल लाइंस के यूनिवर्सल पुस्तक भवन में उठाया था, लेकिन तीसरी कक्षा के हिसाब से उसकी अँग्रेज़ी अपठनीय ही थी।
कहीं न कहीं उसी दौर का प्रभाव है कि आज भी हैरी पॉटर से जुड़ा कुछ भी नज़रों के सामने से गुज़रने पर कुछ अजीब-सा अपनापन लगता है। अभी मैकडॉनल्ड्स को खुले कुछ ही महीने हुए थे, लेकिन रोज़-रोज़ की बातों और अख़बार की वज़ह से ना-काबिल-ए-बर्दाश्त क़िस्म का फ़ोमो होने लगा, और हारकर मम्मी को हम लोगों को भी McD लेकर आना ही पड़ा। वर्ल्ड कप के मैस्कॉट या शुभंकर के कुछ कट-आउट्स वग़ैरह बाहर से ही दिख रहे थे, वहीं मैकडॉनल्ड्स के ठीक सामने शांति कुल्फ़ी के पीछे मेरे मामाजी का सिक्योरिटी एजेंसी का ऑफ़िस भी था। पहले हम लोग वहीं बैठ गए और हनी मेरी बहन एक छोटे पोर्टेबल लाल रंग के जनरेटर को देखकर विज्ञान की विजय पर भरोसा ही नहीं कर पा रही थी और साथ ही साथ शांति कुल्फ़ी में बाहर से दिख रहे चॉको केक्स को देखकर निहाल हुए जा रही थी। मामाजी ने वह फ़ीफ़ा स्पेशल फ़ैमिली पैक वहीं ऑफ़िस में मँगवाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन हम लोग McD जाने के लिए अड़ गए।
फ़िर दाख़िल हुए उस स्वर्ग में और सही में वहाँ मोटे तौर पर कुछ भी ज़रूरत से ज़्यादा ख़ास नहीं था। ख़ास थी तो सिर्फ़ वहाँ बैठे लोगों की आत्मानुभूति, लोग शायद ख़ुद को ख़ास मान बैठे थे, उस आम-सी जगह में। हम लोग फ़ीफ़ा के मैस्कॉट की छवियाँ जो यहाँ-वहाँ लगी थी, उनको निहारे जा रहे थे और फिर सही में कुछ बेहद ख़ास हुआ...
उस फ़ीफ़ा स्पेशल फ़ैमिली पैक ट्रे में बाक़ी चीज़ें तो बहुत सामान्य थी, लेकिन दिलचस्प था तो वह छोटा-सा गिफ़्ट पैक जिसने मैस्कॉट का मिनिएचर, एक फ़ुटबॉल और कुछ और एक्सेसरीज़ थीं। मतलब वो फ़ुटबॉल प्लेयर की ड्रेस में शेर और कुत्ते के मिलते-जुलते रूप का खिलौना था, जिसे एक स्ट्राइकर में फ़िक्स करके फ़ुटबॉल किक करवाना था; ये सब कुछ बहुत ही ठोस और काफ़ी खूबसूरत भी थे। अब खाने से क्या ही राब्ता, जब जो नहीं सोचा था वो ही मिल गया हो। उस एक खिलौने और ‘नंदन’ ने अनचाहे तौर पर पूरा विश्वकप फ़ॉलो करने की वज़ह दी और मजबूर भी किया। शायद इन्हीं सब वजहों से मेसी और रोनाल्डो की दीवानगी के दौर में भी मुझे बेकहम और रोनाल्डिन्हो याद आते हैं, पेले और माराडोना की कहानी बहुत ज़रूरी लगती है; वो ‘माराडोना का हैंड ऑफ़ गॉड’ वाला चमत्कार शायद आज बहुतों को पता भी न हो, लेकिन मुझे सिर्फ़ ‘नंदन’ की बदौलत ही पता है।
जब जिनेदिन जिदान ने फ़ाइनल में हेड अटैक किया और फ़्रांस को फ़ुटबॉल के इतिहास में उतना ही पीछे ले गए जितना शायद कभी नेपोलियन ले गया था और इटली जीत गया, यह सब भी याद रह गया। इटली की जीत और फ़्रांस की हार पर भारत में तत्कालीन कांग्रेस की सरकार के इर्द-गिर्द काफ़ी कटाक्षों का दौर भी चला, चुटकुले बने, अख़बारों में कार्टून आए—ये सब भी याद रह गया। उस वक़्त फ़ीफ़ा इतना क़रीब शायद इसलिए भी लगा था क्योंकि कॉलोनी के बच्चों ने क्रिकेट से ऊबकर कुछ अलग करने के लिए पॉकेट मनी सामूहिक बजट से एक फ़ुटबॉल ख़रीदी थी, जिसका ब्लैडर हफ़्ते भर में फटा और महीने भर में तीन-चार बार उसकी मोची से सिलाई करवाई गई, उस महाअभियान में दस-बीस रुपए मेरे भी थे।
इसके बाद 2010 में जब फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप हुआ तो हम लोग सातवीं क्लास में पहुँच चुके थे और पिछली बार से भी ज़्यादा उत्साहित थे, लेकिन वो पिछली बार वाली बात तो नहीं ही थी।
आज बचपन नहीं है, ‘नंदन’ नहीं है, हैरी पॉटर नहीं है; अमेरिका के मेज़बान होने पर भी मैकडॉनल्ड्स शायद उतना उत्साहित नहीं है, इस बार आईपीएल से फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप की प्रतिस्पर्धा है और फ़ीफ़ा को लेकर इतना रुखा रुख़ तो शायद पहली बार ही है। इसी माहौल पर एक शेर बड़ा क़रीब लगा, मंगल नसीम का शेर है...
“नहीं हम में कोई अनबन नहीं है,
बस इतना है कि अब वो मन नहीं है”
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