रविवासरीय 4.0 : सेवासूक्त
अविनाश मिश्र
29 मार्च 2026
• ‘महर्षि’ पूर्व में अपने कार्यालय को महर्षि-आवास कहते थे। इधर वह कुछ रोज़ से उसे ‘सेवा तीर्थ’ कहने लगे हैं।
महर्षि को नाम बदलने की व्याधि है। पर नाम अगर बदल दिया जाए तब भी युगों तक बदले हुए नाम को बदल दिया गया नाम याद आता रहता है।
महर्षि के एक भक्त से जब एक बार मोम से मंजन करने वाली मंजना मोम त्रिपाठी ने यह जानना चाहा कि ‘पदउ’ [पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन] सुनकर उसे क्या याद आता है?... भक्त ने उत्तर दिया—“मुग़लसराय!”
• महर्षि को हाथ जोड़ने का अंतर्ज्ञान, अभ्यास और अनुभव बहुत अधिक है; इसलिए आज से तीन दिवस पूर्व चैत्र नवरात्र की महा अष्टमी को वह हाथ जोड़कर ममता-महुआ-महासायोनी की घोर आराधना में प्रवृत्त हुए।
महर्षि कई रोज़ से निराहार थे। वह बंग प्रदेश में विजयी होना चाहते थे। पर बंग मानुष अब तक उनकी सेवा से प्रसन्न नहीं हुए थे, जबकि समग्र राष्ट्र का बहुलांश तमाम निंदाओं-आरोपों-भर्त्सनाओं के बावजूद उनकी सेवा से अति मोहित था।
महा अष्टमी समाप्ति की ओर थी कि तभी महर्षि की एकाग्रतापूर्वक तृणमूल स्तर पर हार से रक्षा हेतु जारी अनाहार तपस्या से आजिज़ आकर ममता-महुआ-महासायोनी की संयुक्त शक्ति से निर्मित एक अद्भुत-अद्वितीय-अदम्य तेज राशि ‘माया’ प्रगट हुईं और बोलीं, “महर्षि, तुम अपनी पार्टी को आनंदित करने वाली जिस वास्तु-वस्तु की अभिलाषा रखते हो; वह मुझसे माँगो। मैं तुम्हारी साधना से न चाहते हुए भी संतुष्ट हूँ, अतः तुम्हें तुम्हारा अभीष्ट प्रदान करूँगी।” यह सुनकर माया से महर्षि ने पश्चिम बंगाल माँगा।
माया इस पर महर्षि के लिए कुछ व्यथित-चिंतित हुईं और बोलीं, “महर्षि, तुम्हें ‘सेवासूक्त’ सुनना चाहिए। इसे सुनकर पश्चिम बंगाल का राज्य पाने की महत्त्वाकांक्षा से तुम सदा के लिए विमुक्त हो जाओगे।”
इसके बाद माया से महर्षि ने सेवासूक्त सुनने की इच्छा प्रकट की।
माया ने महर्षि से कहा कि क्या तुम्हें अपने उस प्रिय मित्र की स्मृति है जिसे एक बार एक अपराध के सिलसिले में एक कारागार में क़ैद होना पड़ा था?
महर्षि उवाच, “हाँ माँ! वहाँ बेवर्दी और बावर्दी सब एक जैसी गालियाँ दे रहे थे। बेवर्दी दबंगों ने सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे और सारे क़ैदियों के साथ बदतमीज़ी से पेश आ रहे थे। उन्हें वहाँ यानी कारगार-परिसर में ‘सेवादार’ कहने का चलन था।”
• माया ने कहा कि ‘सेवा’ शब्द देखते-देखते इस समाज में अत्यंत अपवित्र हो गया है! इस शब्द के आशय के इतने अनुचित प्रयोग हुए हैं कि इसके सुंदर अर्थ-अंश विवर्जित हो गए हैं।
इस पर महर्षि बोले, “सेवा क्या है माँ? यह क्या सोचकर की जाती है या क्या सोचकर करनी चाहिए? सेवा में प्राप्ति का क्या अर्थ है? मुझे बताइए माँ!”
माया उवाच, “महर्षि, अब मैं तुमसे सात बिंदुओं से युक्त ‘सेवासूक्त’ कहूँगी। यह सूक्त नेक्टलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ़ बैकसांड के स्टीववेब्रा जॉनतोस्को तुम्हें नहीं बताएँगे, न ही ‘आलोचना’ के संपादक, न ही अतिपूर्वानंद, न ही अतिभय कु. दुबे, न ही अतिऊतक अग्रवाल, न ही अतिनिराश वाजपेयी, न ही अतिशोक कु. पांडेय... अतः इस सूक्त को ध्यानपूर्वक ग्रहण करो।”
• सेवा के विषय में सर्वप्रथम यह जान लेना ज़रूरी है महर्षि कि यह नि:स्वार्थ नहीं होती है, लेकिन इससे संबद्ध स्वार्थ सामान्य नहीं होते हैं। सेवा करते हुए ‘ईश्वर है’ की प्रतीति रहनी ही चाहिए, पर सेवा परलोक सँवारती है—यह बात मन में नहीं रखनी-लानी चाहिए। यह रखाव सेवा-भाव की पवित्रता को एक कलुषित संदर्भ देकर प्रभावित कर सकता है। सेवा करके स्वर्ग की कामना पालना सेवा को व्यर्थ कर देता है।
• इस संसार में सब तरफ़ पल-पल जारी अन्याय और विध्वंस में तुम्हारा भी योगदान है। वह सारा अन्याय और विध्वंस जिसे तुम महज़ देखकर गुज़र जाते हो, क्योंकि थोड़ी ही दूर पर कहीं कुछ छूट जाने का तुम्हें डर होता है। वह सारा अन्याय और विध्वंस जो तुमसे बहुत दूर होता है, लेकिन समाचारों-सूचनाओं की गति जिसे तुम्हारे बहुत पास ले आती है। वह सारा अन्याय और विध्वंस जो तुम करते हो और वह सारा अन्याय और विध्वंस जो तुम नहीं करते... तुम्हें सतत घेरे हुए है। समय चाहता है कि इस अन्याय और विध्वंस का तुम अपनी सामर्थ्य से बढ़कर प्रतिकार करो। जीवन का मूलभूत उद्देश्य यही है। पर ज़्यादातर जीवन मूलभूत उद्देश्यों से विचलित है।
प्रतिकार के उद्देश्य से विचलित जन सेवा का मार्ग चुनते हैं। सेवा का यही स्वार्थ है।
• अदृश्य आँसू सेवादार के भीतर बहते रहते हैं। इससे उसकी आँखें करुणामय प्रतीत होती हैं। वह सब समय यह याद रखता है कि यह सारा संसार दुःखयुक्त है और वह यह सारा दुःख दूर क्यों नहीं कर पा रहा! वह सताई हुई, सताई जा रही और पीड़ा के पाले में आई हुई सारी सजीवता को चुनता है। यह उसका पक्ष होता है। मनुष्य, पशु, प्रकृति... वह सबका दुःख समझता है और अपना अपराध भी। वह दे दिए गए या अपने द्वारा अर्जित-सृजित माध्यम से इनकी सेवा में जुटता है। इससे उसका जीना कुछ सुगम, कुछ सहज, कुछ सरल, कुछ अपराधबोधयुक्त और कुछ मुक्त होता है। यह सेवा का स्वार्थ है।
• सेवा किसी की नौकरी-चाकरी नहीं है, लेकिन सेवा एक सतत अनुशासन है।
प्रत्येक माध्यम उत्तरदायित्व के भार से संलग्न है। यह भार व्यक्ति को सब कुछ को कामचलाऊ ढंग से बरतने के लिए बाध्य करता है। यह भार उसे ऊबा हुआ, चिड़चिड़ा और हिंसक बनाता है। सेवा व्यक्ति को इस भार से मुक्त करती है और उसे उत्तरदायित्व के सौंदर्य से परिचित कराती है।
• सेवा माध्यम की पवित्रता को स्पर्श करने में सहायक है। वह कर्म के उत्कृष्ट, उचित और उच्चतम अर्थों तक ले जाती है। वह समीप को ऊर्जा, उजास और उच्छ्वास से भर देती है। वह प्रेरित करती है। वह अहंकार को जलाती, पिघलाती और नष्ट करती है।
• सेवा में पुरस्कार की कोई इच्छा नहीं होती। सेवा बताती है कि स्वयं को सबसे सुंदर पुरस्कार व्यक्ति स्वयं ही दे सकता है। यह सेवा का स्वार्थ है।
• सेवा सम्मान लेती नहीं है, देती है।
• ‘सेवासूक्त’ सुनकर महर्षि को महसूस हुआ कि इस प्रकार की सेवा उनके वश में नहीं है और मस्त प्रतीत होती हुई जनता वास्तव में उनकी तथाकथित सेवा से त्रस्त है। इस स्थिति में जिन राज्यों की जनसंख्या ने इस त्रासदी का अभिज्ञान कर लिया है, वह आबादी कम से कम राज्य स्तर पर महर्षि की सेवा से सुरक्षित है और भविष्य में भी उसके सुरक्षित बने रहने की संभावना है।
इस प्रकार महर्षि को मनोवांछित वरदान न देकर तथा उन्हें अति दुर्लभ-दुर्निवार-दुष्कर ‘सेवासूक्त’ सुनाकर माया तत्काल अंतर्ध्यान हो गईं।
इसके पश्चात् महर्षि फ़ौरन से पेश्तर इस प्रयास में रत हुए कि यह ‘सेवासूक्त’ राष्ट्र की सरकारी नज़र आती स्वायत्त संस्थाओं और स्वायत्त नज़र आती सरकारी संस्थाओं और लोकचंद्र के चार स्तंभों के प्रतिनिधियों-अधिकारियों-कर्मचारियों तक न पहुँच जाए।
•••
अन्य रविवासरीय : 4.0 यहाँ पढ़िए : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’ | एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा | सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़ | साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट