Font by Mehr Nastaliq Web

रविवासरीय 4.0 : साहित्य अकादेमी एक ऐसा पुरस्कार है

• “बताइए न बाबा कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?”

बाबा उस उम्र में थे कि किसी भी दिन साहित्य अकादेमी अवार्डी हो सकते थे। बशर्ते उस दिन साहित्य अकादेमी अवार्ड की घोषणा करने वाली प्रेस-कॉन्फ़्रेंस कैंसिल न हो और साहित्य अकादेमी अवार्ड पा-लौटा चुके बाबाओं को साहित्य अकादेमी की मृत्यु पर विनम्र श्रद्धांजलि न अर्पित करनी पड़े।

साहित्य अकादेमी एक ऐसी संस्था है जो रोज़ जीती-मरती-जीती रहती है, इसलिए बबा गए लेखक-अलेखक उसके प्रति कभी पूरी तरह नाउम्मीद नहीं होते और अपनी कल्पनाओं में तमामतर मतभेदों-झगड़ों के बावजूद उसे सदा उम्मीद से बनाए रखते हैं।

बहरहाल, जैसा कि ज्ञात ही है—बाबा अब तक साहित्य अकादेमी पुरस्कार से वंचित थे और इसलिए ही वह कभी भी इस प्रश्न का सही उत्तर नहीं दे सकते थे कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है? लेकिन एक दफ़ा जब उन्हें व्यास सम्मान मिला तब एक युवा साहित्य अकादेमी प्राप्त सहायक प्रोफ़ेसर बीस हज़ारिया रज़ा-बँधुआ उर्फ़ चूतिया-विशेषज्ञ उन्हें फ़ेसबुक पर बधाई देने के बाद साक्षात् बधाई देने के लिए शाहदरा से बालूशाही लेकर सीधे दिलशाद गार्डन पहुँच गया। उसे इस स्थिति में देख-सुनकर बाबा ने कहा कि बालूशाही तू लेकर आई नहीं आया। मैंने बालूशाही खाया नहीं खाई। पसीना तूने सुखाई नहीं सुखाया। बधाई मैंने पाया नहीं पाई। मोहम्मद रफ़ी तू बहुत याद आई नहीं आया...

बँधुए का लिंग ठीक करने के बाद बाबा बोले, “बोलो...”

“आपको व्यास सम्मान की फिर-फिर बधाई!”

“हाँ भाई!”

“😆😆😆😆”

“अब देखो ऐसा है कि मेरी इतनी उम्र हो गई है कि पुरस्कारादि की जब मीटिंग-सीटिंग चल रही हो तो बस किसी एक को मेरा नाम भर लेना होता है। सब अपने आप मान जाते हैं।”

“एक उम्र हो गई आपको साहित्य में काम करते हुए...”

“तुम्हारी भी हो जाएगी, काम करते रहो या न भी करते रहो...”

“बाबा, ये साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?”

“छोड़ो... चिनिया बादाम खाओगे?”

“जी, खा लूँगा।”

“चाय?”

“जी...”

“चाय भी!”

“😆😆😆😆”

“तुम बहुत उच्च कोटि के मूर्ख हो।”

“😆😆😆😆”

“तुम्हें पता है कि समीक्षा कैसे लिखी जाती है?”

“... ... ...!”

“उठो, वहाँ कोने में ‘देशज’ नाम की एक पत्रिका रखी है; उसे उठा लाओ, फिर बताता हूँ।”

“जी। [उठाकर लाता है]”

“ये देखो, इसमें छपी समीक्षाओं को देखो और पढ़ो और सीखो कि समीक्षा कैसे [नहीं] लिखी जाती है।”

“जी बाबा, पर बताइए न कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?”

• साहित्य अकादेमी पुरस्कार भारत का एक अत्यंत प्रतिष्ठित साहित्यिक सम्मान है जो केंद्रीय साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा दिया जाता है।

• साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रतिवर्ष चौबीस भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों के लिए दिया जाता है। इसमें उपन्यास, कविता, कहानी, निबंध, संस्मरण, आलोचना सरीखी विधाएँ शामिल होती हैं।

• साहित्य अकादेमी पुरस्कार 1954 से दिया जा रहा है।

• साहित्य अकादेमी पुरस्कार में एक सम्मान-पत्र और ₹1,00,000 की राशि और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा और पहचान प्राप्त होती है।

• साहित्य अकादेमी पुरस्कार की विशेषता यह है कि यह सरकारी नज़र आती एक स्वायत्त संस्था और स्वायत्त नज़र आती एक सरकारी संस्था द्वारा दिया जाता है।

• साहित्य अकादेमी पुरस्कार की चयन-प्रक्रिया में विशेषज्ञों और साहित्यकारों की समिति शामिल होती है।

• साहित्य अकादेमी पुरस्कार किसी लेखक की एक विशेष कृति के लिए दिया जाता है, न कि पूरे साहित्यिक-जीवन के लिए।

• बाबा की बिंदुघाटी से बँधुआ संतुष्ट नहीं हुआ और उसने उन्हें फिर छेड़ा कि बाबा ये बताइए न कि साहित्य अकादेमी अंततः पुरस्कार कैसा है?

इस प्रश्नावृत्ति पर बाबा ने उससे कहा कि कुछ और खाओगे...

“नहीं!”

“ट्रेन कब की है तुम्हारी?”

“जी अभी तो काफ़ी टाइम है।”

“काम करते रहो बेटा... और यह ध्यान रखो कि काम करने लिए हमेशा कामविरोधी माहौल चाहिए होता है।”

“जी बाबा!”

“आगे से आना तो केवल गाँव का नाम बताना।”

“जी बाबा!”

एक दुतरफ़ा लघु चुप के बाद बँधुए ने फिर कोशिश की और कहा, “इस बार उपन्यास को नहीं दिया बाबा, जबकि दे सकते थे! कैसा पुरस्कार है ये?”

“नए उपन्यास लिखे जा सकें; ऐसे नए चरित्रों की हिंदी में भरमार है, लेकिन नए उपन्यास नहीं हैं! हैं?”

“होंगे बाबा...”

“अच्छा! हमारे उपन्यासकार स्वयं उपन्यास के लिए नए चरित्र हैं। उन्हें पुरस्कार न मिले तो सारे समाज को संदेह से देखने लगते हैं।”

“जी...”

“कहाँ हैं सचमुच के नए उपन्यास?”

“देखना होगा...”

“देखो...”

“देखूँगा।”

“अच्छे पाठक चुप रहकर पढ़ते हैं बेटा, शोर नहीं करते... लेखक को डिस्टर्ब नहीं करते। इस प्रकार ही अच्छे लेखक चुप रहकर लिखते हैं, शोर नहीं करते... पाठक को डिस्टर्ब नहीं करते।”

“बाबा, मैं एक पत्रिका निकालूँ तो आप मुझे एक लेख देंगे?”

“तुम्हारे चिरंतन चैरकुट्य और विहंगम व्यर्थताओं का कोई अंत नहीं दीखता मुझे! क्या होगा युवा [2026] पीढ़ी का? तुम लोग अशोक वाजपेयी के आग्रह और निर्देशों को ध्यान से पढ़ते भी नहीं हो... बस इतना पढ़ते हो कि वह पारिश्रमिक के रूप में कुल बीस हज़ार रुपये की राशि दे सकेंगे! तुम लोग ज़रूरत से ज़्यादा सामान्यीकृत नहीं, वही होते जा रहे हो जिसके तुम विशेषज्ञ हो।”

“हमें सुनना नए को जानना है।”

“ऐसा!”

“हमें बहुचर्चित अवसरों पर अवसर मिले तो हमारा हिस्सा होना हमारे लिए सुखद होगा।”

“क्या कह रहे हो!”

“बताइए न बाबा कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?”

“साहित्य अकादेमी लाइब्रेरी जाते रहो, जब तक वह अपनी जगह पर है। यह सुनने में आया है कि वे उसे बहुत दूर ले जाने वाले हैं।

साहित्य अकादेमी के विक्रय-केंद्रों से किताबें ख़रीदते रहो, जब तक वे ख़रीदने लायक़ हैं। यह सुनने में आया है कि वे अब धीरे-धीरे किताब को दिमाग़ से बहुत दूर ले जाने वाले हैं।

साहित्य अकादेमी में कार्यरत मित्रों-परिचितों से मिलते रहो, जब तक वे मिल रहे हैं। यह सुनने में आता ही रहता है कि वे भी बहुत परेशान हैं।

साहित्य अकादेमी के आयोजनों में मत जाओ। एक वक्ता और श्रोता दोनों ही रूपों में उनसे बहुत दूर रहो।

तुम्हारा पहला कविता-संग्रह साहित्य अकादेमी ने प्रकाशित किया है न! उसे वापस ले लो, किसी प्रतिशोध-प्रतिरोध में नहीं; इसलिए कि वे रॉयल्टी नहीं देते, पुरस्कार दे देते हैं।”

• इस दौर में प्रत्येक संवाद के सिरे इस क़दर स्वार्थों से जुड़े हैं कि आहटों, हकलाहटों, फुसफुसाहटों को सुनकर भी एक नहीं कई अनुमान लगाए जा सकते हैं।

• बाबा से बँधुए ने पूछा कि क्या कभी मुझे भी साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिल सकता है!

बाबा : तुम्हारी इस प्रकार की बातों से मुझे सीताराम सूर्यवंशी, अधिवक्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय की याद आ रही है।

बँधुआ : मैं समझा नहीं!

बाबा : उन्हें भी बहुत जल्दी थी।

बँधुआ : मैं चलता हूँ बाबा!

बाबा : रुको पाँच मिनट, सुनोगे नहीं कि साहित्य अकादेमी कैसा पुरस्कार है?

बँधुआ : हाँ, बाबा! बताइए न...

बाबा : एक साहित्य अकादेमी अवार्डी थे। वह साहित्य अकादेमी अवार्ड लेकर लौटा चुके थे, पर अपने परिचयादि में स्वयं को बाक़ायदा साहित्य अकादेमी अवार्ड से सम्मानित ही दर्ज करते थे। वैसे उन्होंने न कभी पुरस्कार-राशि लौटाई, न सुंदर उत्कीर्ण ताम्र-पट्टिका जो सम्मान का प्रतीक होती है, न वह शॉल जो सम्मानस्वरूप ओढ़ाई जाती है, न प्रशस्ति-पत्र और न ही इस पुरस्कार के बाद मिली राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा तथा बधाइयाँ...

हिंदी में बेचारे बधाईबाज़ों की दिशा-दशा-दुर्दशा यह है कि वह पुरस्कार-वापसी पर साहस को सलाम करते हैं और पुरस्कार-प्राप्ति पर जुगाड़ को। आज स्थिति यह है कि साहित्य अकादेमी पुरस्कार पाने वाले, नहीं पाने वाले, लौटाने वाले, नहीं लौटाने वाले, दोनों ही प्रसंगों में बधाई देने वाले... सब मानो इस तथ्य पर एकमत हैं कि अक्टूबर-नवंबर 2015 में हमारे देश में जो संकट थे, आज वे दूर हो गए हैं और साहित्य अकादेमी पुरस्कार एक पवित्र वस्तु हो गई है जिसे पाना भी उतना ही नैतिक है जितना लौटाना। 

एनीवे, साहित्य अकादेमी अवार्ड पाने-लौटाने के बाद जब साहित्य अकादेमी अवार्डी एक बार कहीं और से एक और अवार्ड पाकर अपनी कार में लौट रहे थे, उन्हें पता चला कि आगे [घर] का रास्ता रात में सफ़र करने योग्य नहीं है। एक जनसंपर्काधारित दक्षता ने उनके लिए आस-पास ही कहीं कुछ अंदर एक सुंदर रेस्टहाउस की व्यवस्था की, पर अपनी कार सहित जब वह वहाँ पहुँचे तब उन्होंने पाया कि रेस्टहाउस बंद है और केयरटेकर गाँव गया हुआ है। उनके लिए लौटना जन्म से ही मुश्किल रहा आया था, अब भी था... इसलिए वह आस-पास ही कहीं एक ऐसी जगह ताकने लगे जहाँ यह कठिन रात बिताई जा सके। इतने में ही एक घर-सा उन्हें कुछ नज़र आया। वह उसके पास गए और हल्के हाथ से दरवाज़ा पीटने लगे। एक सुंदर-सी स्त्री बाहर आई। उन्होंने उससे फ़रमाया, “मैं साहित्य अकादेमी अवार्डी हूँ, यहाँ रात में फँस गया हूँ। आप अपने पति को बुला दीजिए तो मैं उनसे थोड़ी बात कर लूँ।” स्त्री बोली, “आप साहित्य अकादेमी अवार्डी हैं और वो बाहर गए हुए हैं।” उन्होंने कहा, “ओह! मैं साहित्य अकादेमी अवार्डी हूँ, क्या मैं आज रात आपके घर में ठहर सकता हूँ।” स्त्री बोली, “आप साहित्य अकादेमी अवार्डी हैं और मुझे कोई एतिराज़ नहीं है।”

साहित्य अकादेमी अवार्डी अंदर गए तो उन्होंने देखा कि इस घर में एक ही कमरा है और एक ही सिंगल बेड। उन्हें व्याकुल पाकर स्त्री बोली, “आप साहित्य अकादेमी अवार्डी हैं। आप बेड पर आराम से सो जाइए। मैं नीचे सो रहूँगी।” वह बोले, “धन्यवाद! मैं साहित्य अकादेमी अवार्डी हूँ। आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी।”

वे दोनों प्राणी सोने या सोने का यत्न करने लगे। एक-आध घंटे के बाद साहित्य अकादेमी अवार्डी को थोड़ी सर्दी लगी और वह बोले, “मैं साहित्य अकादेमी अवार्डी हूँ और मुझे ठंड लग रही है।” स्त्री बोली, “आप साहित्य अकादेमी अवार्डी हैं। मैं अपना कंबल भी आपको दे देती हूँ।” साहित्य अकादेमी अवार्डी को अब तक मिली सारी शॉलें याद आने लगीं!

फ़िलहाल उस एक घर में कंबल दो ही थे। साहित्य अकादेमी अवार्डी ने दोनों कंबल ओढ़ लिए और सोने लगे। रात धीमे-धीमे गहरा रही थी कि वह फिर विकल हुए और बोले, “मैं साहित्य अकादेमी अवार्डी हूँ और मुझे ठंड अब भी बहुत ज़्यादा लग रही है।” स्त्री बोली, “आप साहित्य अकादेमी अवार्डी हैं, पर कंबल तो दो ही हैं। बताइए, मैं आपके लिए और क्या कर सकती हूँ?” वह बोले, “मैं साहित्य अकादेमी अवार्डी हूँ। मैं कैसे भी करके यह रात काट लूँगा। आप सो जाइए।”

इस भूमंडल पर कुछ घंटों बाद अंततः एक विकट रात ने अपना प्रभात देखा। स्त्री ने साहित्य अकादेमी अवार्डी को चाय दी और वह उसे पीकर चलने-चलने को ही थे कि घर के बाहर उनकी दृष्टि एक मुर्ग़ीख़ाने पर पड़ी। वह बोले, “मैं साहित्य अकादेमी अवार्डी हूँ, लेकिन एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कि इस मुर्ग़ीबाड़े में मुर्ग़ियाँ हैं दो और मुर्ग़े हैं सात... ऐसा क्यों!?” स्त्री बोली, “जनाब, ठीक से देखिए... इसमें मुर्ग़े तो दो ही हैं, बाक़ी तो साहित्य अकादेमी अवार्डी हैं।”

•••

अन्य रविवासरीय : 4.0 यहाँ पढ़िए : ‘अब तुम भी जाने वाले हो सामान तो गया’ | एक बीस हज़ारिया बँधुए की दिल्ली-यात्रा | सुरेन्द्र मोहन पाठक के ख़िलाफ़

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट