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रविवासरीय 4.0 : एक हिंदी लेखक की ज़िंदगी

• एक हिंदी लेखक के जीवन की सुबह सूचनाओं से और रात उपन्यास से होती है। वह दुपहर से शाम तक ख़राब सिनेमा के असर में रहता है। इस असर में बाहर धूल और भीतर पन्ने उड़ते रहते हैं। यह उड़ान ही है कि महानगर जीवन के नज़दीक अपना रूपाकर्षण खोने लगे हैं और मुख्य मार्गों से कटकर सुनसान गाँवों तक जाती दूरियाँ कल्पना में सुंदर लगने लगी हैं।

यह कल्पनाप्रवणता नमक प्रदान करती है।

इस दाय को समझना उस अनुपात को समझना है जो सिखाता है कि सूचनाओं में कितनी देर रहा जाए, सिनेमा में कितनी देर रहा जाए, उपन्यास में कितनी देर रहा जाए, धूल में कितनी देर रहा जाए, सुनसान में कितनी देर रहा जाए...

• एक हिंदी लेखक अगर वह सही मायनों में लेखक है और दिल्ली में है, तब वह सदा दिल्ली छोड़ देने के बारे में सोचा करता है। इस सिलसिले में उसे एक से बढ़कर एक बेसिलसिले की बातें याद आती हैं। वह समझ जाता है कि उसका यहाँ हुआ अपमान इस ब्रह्मांड में यूँ ही कहीं तैरता रहेगा। वह कहीं कभी काम नहीं आएगा। वह काम में भी कहीं कभी काम नहीं आएगा। उसका रट्टा रूढ़ हो चुका है। वह यह भी कहीं कभी कह नहीं पाएगा कि नैतिक, ईमानदार और परिश्रमी व्यक्तियों को सताना नहीं चाहिए; क्योंकि वे निर्बल ज़रूर होते हैं, लेकिन उनकी आहें-प्रार्थनाएँ बहुत बलवान् होती हैं।

• एक हिंदी लेखक बहुत प्रवाह, प्रसार और प्रभाव प्राप्त कर लेने के बावजूद इस तथ्य से परिचित नहीं होता कि बहुत आत्म-विश्लेषण बहुत सजगता की शर्त रखता है। 

एक हिंदी लेखक को पढ़कर आजकल कहीं कभी यह नहीं लगता है कि वह एक बहुत बड़ी दुनिया में रहता है, जो संयोगों और दुर्घटनाओं से गतिशील है और अपनी स्थिरता में भी घटनाबहुल है और जो हमें बार-बार आत्मग्रस्त होने के लिए धिक्कारती है। लेकिन रचना में सब कुछ की छूट है, अगर उसका निर्वाह तर्कपूर्ण और रचनात्मक है। एक रचना सामाजिक संचरण से दूर होकर भी असाधारण रूप से गंभीर हो सकती है। 

एक हिंदी लेखक का विषय फिर भी उसका तर्क है और उसकी रचनात्मकता के स्रोत उसकी भाषा और उसके सामने के समाज में हैं। वह जहाँ से आया है वहाँ के मार्मिक-प्रामाणिक विवरण उसके लेखन को वह ताना-बाना देते हैं जिसे पहनकर वह जहाँ है वहाँ उस दुनिया का सामना सशक्त ढंग से कर सकता है जो संयोगों और दुर्घटनाओं से गतिशील है और...

• एक हिंदी लेखक का अनुभव-संसार प्राय: बहुत सीमित-संक्षिप्त होता है। यह पाया गया है कि वह तीस-पैंतीस-चालीस की उम्र तक आते-आते पूरी तरह व्यक्त हो जाता है। उसका श्रेष्ठ-श्रेष्ठतम, औसत-औसततम, निकृष्ट-निकृष्टतम—सब कुछ इस दरमियान ही तय हो रहता है। वह अगर अपवाद या लेट ब्लूमर [Late bloomer] न हो या उसके पास अगर प्रकाशित से ज़्यादा अप्रकाशित न हो तो वह इसके बाद बस स्वयं को दोहराता रहता है। यहाँ तक आते-आते अगर उसमें विकलताएँ शेष रह जाएँ तो वह कम लिखना और कम दिखना पसंद करता है और यहाँ तक आते-आते अगर वह अपनी विकलताएँ खो दे, तब वह एक बहुत ज़्यादा नज़र आने-खाने वाले जोकर या भालू में बदल जाता है।  

• एक हिंदी लेखक का वास्तविक साहित्यिक संघर्ष चालीस की वय के बाद शुरू होता है। यह वय सच में द्वंद्व, स्मृति और विस्मृति से भारी है। यह भार इसलिए भी अधिक है, क्योंकि वह अब तक सेवा में है और उसे लगता है कि यह वय उसका निजी नवाचार है। यह वह वय है : जब वह ज़्यादातर मामलों में सेट हो चुका है; जिन मामलों में अपसेट है, उन मामलों का उसके लेखन से कोई विशेष वास्ता नहीं है। वह अब सार्वजनिक जीवन में अपनी पुरानी लिखाइयाँ भुना रहा है। वह पुरानी मनौतियाँ, प्रशस्तियाँ, स्वीकृतियाँ भुना रहा है। उसका किया जा चुका, उसके किए जा रहे पर बोझ है। वह निर्भार होना नहीं चाहता, क्योंकि वह विस्मृत कर दिए जाने से डरता है। उसका समीप उसकी सतत सक्रियता की शर्त पर उसे महत्त्वपूर्ण और ममत्वप्राप्त महसूस करवाता रहता है, जबकि वह अनवरत गर्त में गिर रहा होता है।  

• एक हिंदी लेखक का सबसे विशाल योगदान यह माना जाता है कि वह उस भयावह नाले के सामने खड़ा हो गया जिसमें उसके बहुत सारे पूर्ववर्ती बह गए, लेकिन सच यह है कि एक हिंदी लेखक इस नाले के सामने ज़्यादा देर तक खड़ा नहीं रह सकता। 

एक हिंदी लेखक का मलबा-उत्पादन यह उस लेख का शीर्षक है, जिसका पहला वाक्य यह है : वह यह कभी भाँप नहीं पाया कि सामने से आता हुआ एक तेज़ प्रवाह उसे स्वयं में समोने की प्रतीक्षा में है।    

• एक हिंदी लेखक यह बहुत बेहतर ढंग से जानता है कि चेले चाहे जितने ज़्यादा हों, जनता से कम ही होते हैं।

• एक हिंदी लेखक को इस बीच कभी-कभी [रोज़ नहीं] लगता है—अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया... वह बूढ़ा-अधबूढ़ा हो चुका है। इस इल्हाम के बाद—जनता की माँग हो या न हो—वह कुछ या कहें कई ग़लतियाँ करता है, मसलन : बहुत बात करने लग जाना, विवाहेतर संबंध बनाना, पारिवारिक कलह से ग्रस्त हो जाना, पशुप्रेमी हो जाना, कोई नशा करने लग जाना, संस्थानबद्धता के आकार में स्वयं को विलय कर लेना, एक पुस्तक तो छोड़िए एक सही-शॉट लेख तक से हीन होने के बावजूद स्वयं को आलोचक प्रसिद्ध कर लेना, संपादक-मॉडरेटर बन जाना, विषय-भाष्य-प्रस्तुति के लिए AI की शरण गहना, चुप नहीं रहना, प्रकाशन खोल लेना, हमक़दम रचनाकारों पर मरणशील गद्य में संस्मरण संभव करने लग जाना, यूट्यूब-वीडियो या रील बनाने लग जाना, राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह व्यवहार करना, आमंत्रित-अनामंत्रित-अवसरानवसर सब जगह आने-जाने-खाने लगना, सत्ता के पक्ष में हो जाना, उपेक्षा या उपद्रव या उपहास के लिए लड़ासे होकर साहित्यिक या साहित्यविरोधी या साहित्यवंचित टिप्पणियाँ करने लगना। 

एक हिंदी लेखक को ये ग़लतियाँ करने के लिए उसका समसामयिक परिवेश उतना ही बाध्य करता है, जितना कि उसकी पृष्ठभूमि। उसके परिचय और उसके प्रवेश, उसे निषेध सरीखी अद्भुत कला से दूर कर देते हैं। वह विषाक्त, विषम और विपथगामी हो जाता है। 

यहाँ इन पंक्तियों का लेखक भी इन ग़लतियों से परे नहीं है। इसलिए इन बातों को किसी ऊँचाई से कहा हुआ न माना जाए, ये भी एक गर्त से ही कही जा रही हैं। इनमें परालोचना से ज़्यादा आत्मालोचना का तत्त्व है।  

एक हिंदी लेखक के अनुभव और अध्ययन-क्षेत्र का विस्तार यह उस लेख का शीर्षक है, जिसका पहला वाक्य यह है : वह नहीं जानता था कि विकलताएँ वास्तविक अर्थ में व्यापक कैसे की जाएँ!

एक हिंदी लेखक अंदर की ओर बहुत कम मुड़ता है। यह इस प्रश्न का उत्तर है : एक हिंदी लेखक अंदर की ओर कब मुड़ता है? 

• एक हिंदी लेखक सारी तयशुदा ग़लतियाँ कर चुकने के बाद इस सृष्टि के प्रत्येक कोने पर अस्त-व्यस्त हो चुकता है। उसकी सारवंचित कामनाओं के सम्मुख उसका संयम पराभूत हो जाता है। वह रचना द्वारा परित्यक्त हो विचरता है। उसकी समझ में सीलन आ जाती है। उसकी दृष्टि में दीमक लग जाती है। उसकी विकलताओं के साथ घुन संभोग करने लगते हैं। उसकी उम्मीद में कॉकरोच घर कर लेते हैं। उसका किंडल-रीडर खो जाता है। उसका चश्मा टूट जाता है। वह हाँफता हुआ और रुग्ण प्रतीत होता है। वह फटी जींस पहनने लगता है। एक तबाही उसे सब तरफ़ से घेर लेती है, पर वह उसे नज़र नहीं आती, वह खो जाता है, वह कुचल जाता है। वह एक ऐसा पोस्टर बन जाता है, जिसमें उसकी तस्वीर के साथ उसकी जन्म और मृत्यु-तिथि का उल्लेख होता है। इसके बाद उसके लोग उसे यथासंभव याद करते हैं, फिर कुछ लोग, फिर कोई नहीं... दूर-दूर तक रद्दी नज़र आती है और स्खलित हुई साधनाएँ। इस त्याग से एक रोज़ एक नई आवाज़ जन्म लेती है। इस नश्वरता में यावच्चंद्र-दिवाकर अमर रहने का एक नया सूत्र जन्म लेता है। यह अवसर एक हिंदी लेखक की रचना कहीं प्रकाशित होने का प्राथमिक अवसर होता है।

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