जगह-जगह 2.0 : माई नेम इज़ रेड : फ़ारसी मिनिएचर, नक़्क़ाशख़ाना और पूर्व-पश्चिम का द्वंद्व
निशांत कौशिक
27 मार्च 2026
चश्म’त बियाफ़रीद ब: हर दम हज़ार चश्म,
ज़ीरा ख़ुदा ज़ क़ुदरत-ए-ख़ुद कुदरत’श ब-दाद
[तुम्हारी आँखों ने हर साँस के साथ हज़ारों आँखें पैदा कर दीं,
क्योंकि ख़ुदा ने अपनी क़ुदरत (शक्ति) से तुम्हारी नज़र को क़ुदरत दी है।]
—रूमी, दीवान-ए-शम्स, ग़ज़ल 867/2
फ़ारसी मिनिएचर [सूक्ष्मचित्रकला]
20वीं सदी के मध्य में दुर्लभ वस्तुओं और किताबों का संग्रह करने वाले आर्थर ए. हॉटन जूनियर ने जब अपनी संग्रहित वस्तुओं की नीलामी शुरू की, तब उनमें एक पांडुलिपि थी—सफ़वी शासक शाह तहमास्प का शाहनामा, जो तबरेज़ की मिनिएचर [सूक्ष्मचित्र-कला] शैली में तैयार हुआ था। यह पांडुलिपि पहले सफ़वी, फिर उस्मानी और रोथ्स्चाइल्ड संग्रहों से होती हुई, हॉटन जूनियर तक पहुँची। बाद में हॉटन जूनियर ने इसके पन्ने अलग-अलग करके बेच दिए। आज इस पांडुलिपि के पन्ने कुछ निजी संग्रहों में हैं और कुछ दुनिया भर के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। यह एक दुर्लभ कला के ह्रास का भी प्रसंग है।
यह घटना फ़ारसी मिनिएचर कला को समझने का एक सही बिंदु है।
मिनिएचर केवल स्वतंत्र चित्रण नहीं है, बल्कि कथा का हिस्सा है, उसका दृश्य रूप है। ईरानी सांस्कृतिक और भौगोलिक अस्मिता के केंद्र में कई ग्रंथ हैं, लेकिन उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण शाहनामा है, जिसे फ़िरदौसी ने लिखा। आज सबसे अधिक प्रसिद्ध फ़िरदौसी का शाहनामा है, लेकिन कथानक, घटनाओं, शासकों और प्रसंगों में बदलाव करते हुए इसके कई रूप तैयार होते रहे। जिस तरह शाहनामा ईरान को उसका इतिहास और आत्म देता है, उसी तरह विभिन्न कालों में इसे नए रूपों में लिखकर ईरानी अस्मिता से जुड़ने और उसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया। इस संदर्भ में मंगोल शाहनामा विशेष रूप से प्रसिद्ध है क्योंकि उसमें मिनिएचर कला का रूप अधिक विकसित दिखाई देता है। स्वयं फ़िरदौसी का शाहनामा भी पूर्ववर्ती ‘ख़ुदाय-नामे’ की कथा को समाहित करता है।
इन ग्रंथों की कथाएँ, जैसे सोहराब और रुस्तम की कहानी, होशंग और आग की खोज और सिकंदर का प्रसंग, मिनिएचर चित्रों का हिस्सा बनीं। आगे चलकर निज़ामी गंजवी की ‘लैला-मजनूँ’ के प्रसंग भी इसी परंपरा में शामिल हो गए।
पांडुलिपियों से बाहर भी शाहनामा और अन्य ग्रंथों की छवियाँ ईरानी जीवन में फैल गईं, बर्तनों, सजावटी वस्तुओं और रोज़मर्रा की चीज़ों पर। लेकिन मिनिएचर कला अपनी मूल प्रकृति में किताब से ही जुड़ी रही। कालांतर में इसी परंपरा से उस्मानी (Ottoman) दौर के नक़्क़ाशख़ाने (Nakkaşhane) विकसित हुए।
नक़्क़ाशख़ाना
नक़्क़ाशख़ाने उस्मानी दौर की शाही वर्कशॉप थीं, जिनके लिए आज अक्सर लैटिन-फ़्रेंच व्युत्पत्ति का atelier शब्द इस्तेमाल किया जाता है। यहाँ जिल्दसाज़, मुसव्विर, कातिब और अन्य कारीगर मिलकर मिनिएचर पांडुलिपियों पर काम करते थे। इन जगहों का उद्देश्य अलग-अलग कलाओं को जोड़कर एक संपूर्ण किताब तैयार करना था। इस्तांबुल में कुछ नक़्क़ाशख़ाने बाज़ार से जुड़े थे, लेकिन कुछ को शाही संरक्षण प्राप्त था और वे तोपकापी सराय के आस-पास स्थित थे।
इन नक़्क़ाशख़ानों में होने वाले काम की जड़ें फ़ारसी मिनिएचर परंपरा में थीं, जो पहले तबरेज़ और हेरात में विकसित हुई। जब उस्मानी साम्राज्य ने इन क्षेत्रों से संपर्क बढ़ाया और कलाकारों को अपने दरबार में आमंत्रित किया, तो फ़ारसी शैली इस्तांबुल पहुँची और नक़्क़ाशख़ानों के भीतर एक नए रूप में संगठित हुई। यहाँ उसी परंपरा को अपनाते हुए—उसे दरबारी इतिहास, युद्ध और शाही जीवन के चित्रण में ढाला गया।
बाद में यही परंपरा भारत तक पहुँची। हुमायूँ के ईरान प्रवास के दौरान फ़ारसी कलाकार मुग़ल दरबार से जुड़े और अकबर के समय इस परंपरा को और विस्तार मिला। भारतीय विषयों, रंगों और स्थानीय जीवन के साथ मिलकर एक नई मुग़ल मिनिएचर शैली विकसित हुई।
पूर्व और पश्चिम
आधुनिक तुर्की कथाओं और उपन्यास में पेयामी सफ़ा, तानपीनार, ख़ालिदा अदीब अदिवार, ओरहान पामुक के यहाँ पूर्व और पश्चिम का तनाव सबसे अधिक मुखर है। ‘My Name is Red’ इस पूर्व-पश्चिम की फाँक को उस्मानी मिनिएचर कला के संदर्भ में देखता है।
उपन्यास की कथा 16वीं सदी के इस्तांबुल में घटती है, जहाँ शाही नक़्क़ाशख़ाने के भीतर एक रहस्यमय हत्या हुई है। इसी समय ‘काला’ लगभग 12 वर्षों बाद इस्तांबुल लौटा है और अपने चाचा एनीश्ते के संपर्क में आता है, जो सुल्तान मुराद-III के लिए एक गुप्त मिनिएचर किताब पर काम कर रहे हैं। इस पुस्तक में पारंपरिक उस्मानी मिनिएचर शैली के साथ पश्चिमी तकनीकों को गुप्त रूप से इस्तेमाल करने का प्रयास किया जा रहा है। काला का निजी जीवन भी इसी घटना के साथ जुड़ा हुआ है, और भाग्य भी, क्योंकि वह अपनी पूर्व प्रेमिका शेकुरे के साथ अपने संबंध को फिर से स्थापित करना चाहता है।
उपन्यास के किरदार दिलचस्प शैली में लिखे गए हैं। उपन्यास के समीक्षक इसे पूर्वी ढंग का उत्तर-आधुनिक शिल्प कहते हैं। यहाँ किरदार ‘लाश’ हैं, ‘पेड़’ हैं, ‘कुत्ता’ है, और कभी ‘सिक्का’ है।
उपन्यास की शुरुआत कुएँ में पड़ी हुई एक ‘लाश’ से होती है। यह ज़रीफ़ की लाश है, जो अपने क़त्ल की दास्तान सुना रही है। यह 16वीं सदी का उस्मानी साम्राज्य है, जिसके सुल्तान मुराद तृतीय ने गुप्त रूप से मिनिएचर कलाकारों को नक़्क़ाशख़ाने में एक किताब तैयार करने के लिए कहा है। किताब एक यूरोपीय शासक के लिए उपहार के रूप में तैयार की जा रही है, संभवतः Doge of Venice के लिए। यही बात इस पूरे प्रसंग में तनाव पैदा करती है। इस तैयार हो रही किताब का पाठक उस्मानी साम्राज्य का नागरिक नहीं है। यहाँ यूरोप और उस्मानी साम्राज्य, या पूर्व-पश्चिम जैसा भौगोलिक विभाजन बेमानी होगा, लेकिन यह सांस्कृतिक फाँक मिनिएचर कला की शैलियों में निहित है।
उपन्यास का एक किरदार ‘सिक्का’ भी है, जो वेनिस का असली खरा सोने का सिक्का होने का दावा करता है, लेकिन बताता है कि इस्तांबुल में उसके जैसे नक़ली पश्चिमी सिक्कों की बाढ़ है, क्योंकि न जताने के बावजूद इस्तांबुल के लोग लालची हैं। सिक्के का यह किरदार बहुत दिलचस्प है, क्योंकि यह उस्मानी साम्राज्य के समय के आर्थिक संकटों और बदलते सामाजिक हालात पर एक इशारा करता है। यह भी कि उस्मानी साम्राज्य में किसी और ढंग से देखने और किसी और ढंग से जीने की आकांक्षाएँ भी हैं।
वेनिस, इस्तांबुल और उपन्यास में हत्या
Ben bir ağacın kendisi değil, manası olmak istiyorum
—Benim adım kırmızı
[मैं एक पेड़ नहीं, उसका अर्थ होना चाहता हूँ]
क्या चित्र बनाने का अलग ढंग या शैली, जीने और देखने की भी अलग शैली है? इस संदर्भ में वेनिस शैली क्या है?
वेनिस से आशय चित्रकला की उस नई यथार्थवादी शैली से है, जो पारंपरिक उस्मानी मिनिएचर कला से सर्वथा भिन्न है, जिसका कोई आधिभौतिक आधार नहीं है और पारंपरिक उस्ताद उसे चुनौती की तरह देखते हैं, वहीं उसके प्रति एक आकर्षण की भी इस नक़्क़ाशख़ाने में सुगबुगाहट है।
नक़्क़ाशख़ाने में बुज़ुर्ग उस्ताद उस्मान, उस्मानी मिनिएचर परंपरा के कठोर पक्षधर हैं। वह किताब संपादन की इस गुप्त योजना के भी विरोधी हैं। वे इसमें उस्मानी मिनिएचर कला के क्षय को देख रहे हैं। ओरहान पामुक उस्मान के किरदार के बहाने नक़ल और सांस्कृतिक परंपरा के बीच टहलती तुर्की दुनिया का दृश्य रचते हैं।
बहुत सारे फ़रमानों और किताबों के निश्चित पन्नों को किनारे से मोड़ा और काट दिया जाता था, यह दर्शाने के लिए कि कला में संपूर्णता केवल ईश्वर की सत्ता में ही संभव है।
एक घोड़े के चार पैर होते हैं, लेकिन दौड़ते समय हम उन्हें एक साथ साफ़ नहीं देख पाते। रेगिस्तान में आगे बढ़ता हुआ काफ़िला दूर जाते-जाते छोटा दिखाई देने लगता है, जबकि पास खड़ा व्यक्ति असल से बड़ा प्रतीत होता है। मिनिएचर सौंदर्यशास्त्र और मिनिएचर हुनरमंद इसीलिए आँख को धोखा मानता है। वह दुनिया को वैसा दिखाने की कोशिश करता है जैसी वह ख़ुदा की नज़र में है।
पश्चिमी कला में शैली का महत्त्व है। शैली न सिर्फ़ चित्र बनाने का ढंग है, बल्कि कलाकार की वैयक्तिकता का हस्ताक्षर भी है। हर कृति को उसके चित्रकार का दस्तख़त समझा जा सकता है। यह अलहदगी उसे कलात्मक स्वतंत्रता भी देती है। लेकिन मिनिएचर कलाकार किसी बाग़ को वैसे नहीं बनाता, जैसा वह आँखों के सामने दिखता है—बल्कि उस बाग़ की धारणा को चित्रित करता है।
मिनिएचर परंपरा के इस पक्ष और प्रस्तुतिकरण के विरोध में कई ऐतिहासिक तर्क हैं, लेकिन वे सभी तर्क उपन्यास के बाहर हैं।
उपन्यास में उस्ताद उस्मान का प्रसंग आता है, जहाँ वह बहज़ाद का ज़िक्र करते हैं, जिसने सुई चुभोकर ख़ुद को अंधा कर लिया था। तथ्यात्मक दृष्टि से बहज़ाद दृष्टिहीन नहीं था, लेकिन इस उपन्यास में उस्मान उसके अंधेपन का हवाला देते हुए उस्ताद बहज़ाद की सुई से ही अपनी आँखें फोड़ लेते हैं। तर्क यह है कि अगर किसी नक़्क़ाश की अलग, पहचानी जा सकने वाली शैली है, तो उसे ख़ूबी नहीं बल्कि गंभीर दोष समझा जाता है, एक तरह का अहंकार। आदर्श चित्रकार वह है जिसकी बनाई हुई तस्वीर देखकर यह कहना मुश्किल हो कि उसे किसने बनाया है। यह अपने उस्तादों और पूर्ववर्ती चित्रों से ऐसे मिल जाती है कि कलाकार का लोप हो जाता है। यह ख़ुद को मिटा देने का रियाज़ है। यह ख़ुदा का दिया हुआ अँधेरा है, जिसमें हुनर के लिए प्रेरणा यथार्थ से नहीं, बल्कि इल्हाम से पैदा होती है।
उपन्यास इसी सवाल से जूझता है। कुएँ में गिरी लाश ज़रीफ़ नाम के कलाकार की है, जो शाही नक़्क़ाशख़ाने में गुप्त किताब पर काम कर रहा था। वह इस द्वंद्व में था कि वह एक मिनिएचर परंपरा का हिस्सा है, जो व्यक्तिगतता और पश्चिमी यथार्थवाद को अस्वीकार करती है। लेकिन उसी समय वह एक ऐसे काम में लगा है जो ठीक उसी प्रतिबंधित और निषिद्ध दिशा की ओर बढ़ रहा है। यही विरोधाभास उस्मानी साम्राज्य के भीतर बढ़ती हुई फाँक है, जिस पर ओरहान पामुक ‘My Name is Red’ की कथा रचते हैं।
यह उपन्यास अपने विराट फलक और सभ्यता के गहन प्रश्नों को छूने के लिए प्रसिद्ध है। पामुक, लेखक बनने से पहले चित्रकला और स्थापत्य के छात्र रहे, और उनके प्राचीन फ़ारसी तथा अरबी काव्य, कला और मिथक संसार का प्रामाणिक तथा संजीदा अध्ययन उपन्यास को संपूर्ण उस्मानी साम्राज्य, मध्यपूर्व के संसार, ज्ञानार्जन और ज्ञान उत्पादन को देखने की एक नई दृष्टि प्रदान करता है। ख़ुद पर उत्तरआधुनिक तमग़ा लेने के बावजूद यह दृष्टि पूरी तरह ग़ैर-यूरोपीय है, और इसकी जड़ें उतनी ही एशियाई फ़्रेम स्टोरी में हैं, जितनी यह आधुनिक दिखती है। यह वैसी ही आँख है जो नजीब महफ़ूज़ ने अरब दुनिया को देखने के लिए विकसित की थी, या मार्केज़ ने अपने लैटिन अमेरिकी संसार को देखने के लिए अपनाई थी।
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