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‘बेला’ की 1000वीं पोस्ट : कुछ बात, कुछ बकवास

यह ‘बेला’ की 1000वीं पोस्ट है।

हमने गत वर्ष ‘हिन्दवी उत्सव’ से पूर्व संगत-शतक पूर्ण किया था। इस वर्ष ‘हिन्दवी उत्सव’ से पूर्व हमने बेला-सहस्र पूर्ण किया है।

यह संख्या हमारे लिए केवल एक आँकड़ा नहीं है। यह उन दिनों, रातों, ऋतुओं, परिस्थितियों और मनःस्थितियों का नैरंतर्य है; जिसके बीच ‘बेला’ ने अपने लिए एक समय और एक स्वभाव अर्जित किया है। आज से लगभग अट्ठाईस महीने पूर्व जब ‘बेला’ का शुभारंभ हुआ था, तब हमने एक ऐसे अदबी ठिकाने की कल्पना की थी; जहाँ केवल अदब ही नहीं—आर्ट, कल्चर और ज़ुबानों में रोज़-ब-रोज़ क्या हुआ, हो रहा और होने वाला है... उसकी इंदराजी नज़र आए। हमारा प्रयत्न था कि यह रजिस्टर इतना खुला और जीवंत हो कि कला, साहित्य और संस्कृति का समय जानने के लिए इसे जब चाहे देखा जा सके।

‘बेला’ के शुभारंभ के लिए हमने 9 अप्रैल की तारीख़ चुनी थी। यह तिथि प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना और राहुल सांकृत्यायन की जन्मतिथि के रूप में समादृत है। इससे पहले 2020 में हमने ‘हिन्दवी’ के शुभारंभ के लिए 31 जुलाई यानी प्रेमचंद-जयंती की तारीख़ चुनी थी। इन तारीख़ों से हमारे वैचारिक रुझान की एक तस्दीक़ हो सकती है, हालाँकि हम यह भी मानते हैं कि प्रतिकार और कदाचार दोनों पर किसी विशेष रंग और विचार का एकाधिकार नहीं है।

‘बेला’ के अब तक सार्वजनिक 1000 पोस्ट्स में सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह संख्या नहीं, इन पोस्ट्स की नियमितता है। रात-बिरात, दिन-दिनांत, देह-देहांत, अवकाश-अनवकाश, हारी-बीमारी, आँधी-पानी, शीत-लू, बाढ़-भूकंप, युद्ध-शांति, अनशन-आंदोलन, पलायन-विस्थापन, सुख-दुःख, आगमन-प्रस्थान—बाधा को हमने ‘बेला’ की नियमितता पर हावी नहीं होने दिया। यह नियमितता हमारे लिए केवल प्रकाशन-अनुशासन नहीं रही, यह एक तरह की संपादकीय साधना रही है।

1000 पोस्ट्स का अर्थ है—1000 बार यह तय करना कि इस समय क्या ज़रूरी है, क्या प्रासंगिक है, क्या सुंदर है, क्या विचारोत्तेजक है और क्या दर्ज किया जाना चाहिए। इसका अर्थ है—अनेक रचनाकारों की आवाज़ों को सुनना, उनमें से कुछ को चुनना, कुछ को मना करना, कुछ को समझना, कुछ को समझाना, कुछ को लौटाना और कई बार रचना के लिए प्रतीक्षा करना। इसका अर्थ यह भी है कि प्रत्येक प्रकाशित के पीछे बहुत-सा अप्रकाशित उपस्थित है।

हम यह दोहराना चाहते हैं कि आज हमारे पास इतनी रचनात्मक सामग्री है कि हिंदी समाज तत्काल कुछ नया लिखना हमेशा के लिए बंद भी कर दे, तब भी हम दो साल तक नियमित नया प्रकाशित कर सकते हैं। इस पर भी ‘बेला’ पर फ़रमाइशी लेखन कभी प्रकाशित नहीं होता है। हमें इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ती है; क्योंकि ‘बेला’ पर प्रकाशन के लिए आई रचनाएँ, समीक्षाएँ और सूचनाएँ इतनी ज़्यादा हैं कि हम अपनी सारी नियमितता के बावजूद उन्हें ही कभी-कभी समय पर प्रकाशित नहीं कर पाते हैं। इसलिए हम फ़िलहाल रचनाएँ नहीं, क्षमा माँगने की स्थिति में हैं। 

दरअस्ल, तात्कालिक महत्त्व की चीज़ों को हमें जल्द से जल्द प्रकाशित करना पड़ता है; क्योंकि एक वक़्त के बाद, वे उतनी प्रासंगिक नहीं रह जाती हैं। हम यह मानते हैं कि स्थायी महत्त्व की रचनाएँ धैर्य और उत्सुकता से सबल होती हैं। रचनाओं का आकांक्षित मंगल उनके अभ्यस्त संस्कार के अंतराल में रहता है। ये संस्कार विकसित करने में प्रकाशन-स्थलों का महत्त्वपूर्ण योगदान है, जहाँ से एक रचनाकार की कमज़ोर रचनाएँ बार-बार वापस आती हैं। उन्हें अस्वीकृत किया जाता है या थोड़ी गुंजाइश होने पर पुनः उन पर काम करने, फिर भी बात न बनने पर एक बार और काम करने के लिए कहा जाता है... अंततः प्रकाशन बहुत प्रतीक्षा, परिश्रम और अध्यवसाय का परिणाम है। ऐसी प्रक्रियाओं से गुज़रकर ही स्थायी महत्त्व की रचनाएँ आकार लेती हैं; फिर कहीं जाकर इनका एक संग्रह बनता है और उसके लिए भी वैसी ही प्रतीक्षा, मेहनत और अध्ययनशीलता दरकार होती है—जैसी रचना-प्रकाशन के लिए। वास्तव में, रचे जाने का जो आंतरिक अचीवमेंट होता है—वह महफ़िलों, जनसंपर्कों और जल्दबाज़ियों से हासिल नहीं हो सकता। महफ़िलों, जनसंपर्कों और जल्दबाज़ियों से जो हासिल होता है; वह हम अपने आस-पास रोज़-ब-रोज़ देख ही रहे हैं।

जैसे संसार की सारी प्रकाशन-संस्थाएँ मानती हैं; हम भी यह मानते हैं कि लेखक के विचार लेखक के ही होते हैं और संपादक, प्रकाशक, प्रकाशन-स्थल उन्हें सामने भर लाते हैं... ताकि अभिव्यक्ति, हस्तक्षेप और संवाद की संस्कृति सुरक्षित रहे। लेकिन हिंदी में गठजोड़ और स्वार्थ इस क़दर प्रबल हैं कि लोग दिमाग़ और आँख मूँदकर संदेह करते हैं और इस तरह ही विश्वास।

बेला@1000 के इस सफ़र में देखने वाले देख सकते हैं कि यहाँ हिंदी की सर्वाधिक नवीन पीढ़ी और विचारशील-बीहड़ आवाज़ें दर्ज हुई हैं। हमने दैनिक अख़बारों के फ़ीचर विभाग की उस पुरानी, लेकिन अब डूब-धुँधला चुकी मूल्यनिष्ठ परंपरा को ऑनलाइन नवीकृत और अद्यतन करने की कोशिश की है; जिसमें साहित्य, समाज, संस्कृति, कला, व्यक्ति और समय एक-दूसरे से अलग-अलग ख़ाने में नहीं रखे जाते थे। इस प्रयत्न में हमने वैचारिकता, प्रतिबद्धता और सुंदरता को अशक्त नहीं होने दिया है। हमें व्यक्तियों के आहत होने से ज़्यादा चिंता मूल्यों के आहत होने की है।

हमने ‘बेला’ की भाषा को अख़बारी ढंग से साहित्यिक और साहित्यिक ढंग से अख़बारी बनाने पर बल दिया है। हमने हिंदी की ऑनलाइन साहित्यिक पत्रकारिता में स्तंभ-लेखन की वापसी कराई है। हमारी देखा-देखी दूसरे कच्चे-पक्के-अधपके मंच भी अब इस यत्न में संलग्न हुए हैं। यह ख़ुशी की बात है। व्यंग्य से बचने वाले मंच अब उसकी धार से घायल होने को तैयार हैं—यह ‘बेला’ की कामयाबी है। हमने स्तंभ-लेखन में नवाचार को प्रमुखता से प्रवेश दिया है। इस क्रम में जेएनयू क्लासरूम के क़िस्से, जापान डायरी, सूफ़ी साहित्य की तस्वीर, काम से मुक्ति, Clubhouse के दिनों से, क़ुबूलनामा, जगह-जगहशनिवारेर चिट्ठी, रविवासरीय, बिंदुघाटी, रागदर्पण, शंखनाद, रीलमरील, जंकामंका गैंग [गणेश पाण्डेय का धारावाहिक उपन्यास], दास्तान-ए-गुरूज्जीस, इलाहाबाद तुम बहुत याद आते हो!, कवियों के क़िस्से वाया AI, AI : वाह! क्या एक्टिंग कर रहा है, विकुशुयोग [विनोद कुमार शुक्ल के देहावसान की तिथि (23 दिसंबर 2025) से लेकर उनकी जन्मतिथि (1 जनवरी 2026) तक प्रतिदिन उन पर केंद्रित एक आलेख], ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’ [अरुण कमल के व्यक्तित्व और कृतित्व पर केंद्रित दस क़िस्तों में एक आलेख] जैसे स्तंभ शुरू और सफलतापूर्वक समाप्त हुए और इनमें से कुछ अब तलक जारी हैं। इस प्रसंग में भविष्य में कुछ नए स्तंभ प्रस्तावित हैं, आने वाले हैं। यहीं यह कहना न होगा कि इस वर्ष की हमारी बड़ी निराशाओं में ‘घाम पानी’ स्तंभ का [घोषणा के बावजूद] न शुरू हो पाना है। यह स्तंभ—जिसमें घनघोर यात्राओं के दुर्लभ विस्तार के वर्णन-विवरण-विचलन एक विरल भाषा में संभव होने थे—हरि कार्की को लिखना था, लेकिन ‘हिन्दवी’ के संपादकीय विभाग से संबद्ध और ‘बेला’ के प्रमुख हस्त होने की वजह से कार्याधिक्य से ग्रस्त वह इसे अब तक आरंभ नहीं कर पाए हैं।

इस वर्ष ‘बेला’-प्रसंग में एक सुखमय संयोग यह भी जुड़ा है कि दैनिक भास्कर—‘हिन्दवी’ के साथ एक विशेष अनुबंध के तहत, प्रत्येक रविवार को अपने लोकप्रिय स्तंभ ‘रसरंग’ में हिन्दवी बेला पर प्रकाशित लेखों को पुनर्प्रकाशित कर रहा है।

सूचना और रपट, सिनेमा और रंगमंच, यात्रा और स्मरण, समीक्षा और संस्मरण, कथा और कथेतर, संवाद और अनुवाद, विवाद और अपवाद, प्रश्न और प्रसंग, अलंकार और पुरस्कार, लोक और अध्यात्म, सुझाव और सलाह, मत और पत्र, संगीत समारोह और पुस्तक मेले, अवसाद और दुर्लभ तस्वीरों से ‘बेला’ ने अट्ठाईस महीनों के भीतर एक ऐसी आर्काइव तैयार कर दी है; जिसकी समकालीनता और विश्वसनीयता चकित करती है।

इस अवसर पर हम अपने सभी रचनाकारों, कलाकारों, स्तंभकारों, रिपोर्टरों, अनुवादकों, सलाहकारों, शुभचिंतकों, धूमकेतुओं, इंद्रधनुषों, तारों, ग्रहों, उपग्रहों, नक्षत्रों, आकाशदीपों, देहरीदीपकों, स्रोतों को पूरे दिल से शुक्रिया कहते हैं। आप सबके बग़ैर ‘बेला’ के शुभारंभ का यह वैविध्यमय विस्तार संभव नहीं हो सकता था और भविष्य में भी इस विस्तार के विस्तार में इस एक हज़ार से आगे भी आपका योगदान होना ही है।

‘बेला’ की नियमितता को निर्बाध रखने में ‘हिन्दवी’ के संपादकीय, सोशल मीडिया और कला-विभाग की भी बड़ी भूमिका है। इस सिलसिले में हरि कार्की, रचित और संचित भट्ट के नाम बहुत उल्लेखनीय हैं।

‘बेला’ को हमने समय का रजिस्टर बनाने की कोशिश की थी, आज 1000 पोस्ट्स के बाद भी हमारा सबसे बड़ा काम यही है—समय को देखना, उसकी आहट सुनना, उसके भीतर छूटती हुई चीज़ों को दर्ज करना और जहाँ ज़रूरी हो; वहाँ उसके सामने एक सवाल रख देना। हमें नहीं मालूम कि अगली 1000 पोस्ट्स में क्या-क्या होगा-आएगा! पर हम इतना ज़रूर जानते हैं कि अपनी नियमितता, जिज्ञासा, संपादकीय स्वतंत्रता और हिंदी की जीवंतता पर हम भरोसा बनाए रखेंगे।

हम जानते हैं कि नए-नए रचनाकार और उनका नया-नया काम हमारे कोश में ही सुरक्षित है। यह नवाचार जल्द प्रकाश में आकर और अधिक सार्वजनिक होगा और रचना की दुनिया सचमुच की प्रतिभाओं को पहचानेगी। बहुत कुछ अभी अपनी आँच पर है, निर्णय लेना या देना... भूल के सिवा और क्या होगा! फिर भी हम चाहते हैं कि हम बहुत सारे कच्चेपन के लिए आवाँ हो सकें। इस संकल्प में कुछ स्वीकार भी ज़रूरी हैं—हमारे पास बहुत-बहुत सारी रचनाएँ आती हैं, लेकिन उनमें से बहुत सारी किसी काम की नहीं होतीं। हम चाहते हैं कि रचनाकार रचनाएँ लिखने का ही नहीं, उन्हें भेजने और प्रकाशित कराने का शिल्प भी सीखें। वे इस पूरी प्रक्रिया से परिचित हों, ताकि एक सुरुचिपूर्ण हिंदी-दृश्य संभव हो सके और सुरुचि पर केवल चंद जनों का ही अधिकार न रह जाए।

इस क्रम में यहाँ यह स्वीकार भी ज़रूरी है कि हम उन लेखकों को बहुत ज़्यादा प्राथमिकता देते हैं जो अब तक कहीं प्रकाशित नहीं हुए हैं या बहुत कम प्रकाशित हुए हैं या जिन पर हिंदी की धुँधली नज़र ठीक से नहीं पड़ती है। इसकी एक वजह वैसे यह भी है कि हमारे पास कमतर चीज़ों के लिए समय बहुत कम रहता है। यहाँ ‘बेला’ के लिए लिख रहे और लिखना चाह रहे लेखकों के ध्यानार्थ कुछ बिंदु प्रस्तुत हैं : 

• ‘बेला’ के लिए भेजी गई रचनाओं पर अगर 10 रोज़ के भीतर कोई उत्तर नहीं मिलता, तब रचनाकार उन्हें अन्यत्र भेजने के लिए स्वतंत्र हैं। रचनाएँ स्वीकृत होने की स्थिति में उनके प्रकाशित होने में 30-45 दिन का समय लग सकता है। इस बीच अगर ‘बेला’ के लिए स्वीकृत रचनाएँ अन्यत्र प्रकाशित पाई गईं, तब स्वीकृत रचनाएँ प्रकाशित कर पाना हमारे लिए संभव नहीं होगा। इस स्थिति में संबंधित रचनाकार की रचनाओं पर भविष्य में भी विचार कर पाना मुमकिन नहीं है।

• ‘बेला’ पर अगर आप स्तंभ-लेखन नहीं कर रहे हैं; तब ‘बेला’ पर एक रचनाकार के पुनर्प्रकाशन पर विचार हम एक महीने से पहले नहीं कर पाते हैं, जबकि रचनाएँ प्राय: प्रकाशित करने योग्य होती हैं। ऐसे में हमारा सुझाव है कि एक रचनाकार को भिन्न-भिन्न जगहों पर अपनी रचनाओं का प्रकाशन कराना चाहिए। 

• ‘बेला’ पर जल्दी-जल्दी प्रकाशित होने का सबसे सरल उपाय यह है कि आप तात्कालिक घटनाओं-विषयों पर जल्द से जल्द और नवीन ऊर्जा तथा दृष्टि के साथ लिखें। एकदम अनछुए विषयों में प्रवेश करें और लेखन के प्रत्येक मोर्चे पर भयानक तोड़-फोड़ करें।

• ‘बेला’ के लिए रचनाएँ भेजते समय सबसे पहले अपनी तरफ़ से जहाँ तक संभव हो भरपूर श्रम करके वर्तनी आदि ठीक रखें, ताकि हमें इस ओर कम मेहनत करनी पड़े। 

• ‘बेला’ के लिए रचनाएँ भेजते समय संकेत-चिह्न, जैसे : , ! । – — इनका प्रयोग करते समय शब्द और संकेत-चिह्न के बीच स्पेस न रखें। वाक्य में जहाँ डॉट्स का प्रयोग कर रहे हों, तीन डॉट्स […] से अधिक डॉट्स न दें।

• ‘बेला’ के लिए रचनाएँ भेजते समय चंद्रबिंदु, नुक़्ता आदि का ख़याल रखें; ये किन शब्दों में आते हैं या नहीं, इसके लिए ‘गूगल-सर्च’ या AI पर चेक कर सकते हैं।

• ‘बेला’ के लिए अनूदित रचनाएँ भेजते समय मूल सोर्स [वेबसाइट या पुस्तक] का उल्लेख करें।

• यह सब करने के बाद फ़ाइनल वर्ड फ़ाइल ही हमें ई-मेल [contact@hindwi.org] करें, यानी अन्यत्र व्हाट्सएप या फ़ेसबुक-इन्स्टाग्राम के मैसेंजर पर न भेजें। ई-मेल के सब्जेक्ट-बॉक्स में लिखें : ‘बेला’ के लिए...

पुन: शुक्रिया! 
शुभकामनाएँ...

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‘हिन्दवी उत्सव’ से जुड़ी जानकारियों के लिए यहाँ देखिए : हिन्दवी उत्सव-2026

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