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आशा भोसले : स्वर, छवि और स्वर्णिम दौर की आख़िरी चमक

आशा भोसले में एक चार्म है। वह छवि जो उनको सोचने से बनती है। वह जीवन के उस स्वरूप के अधिक निकट है जो इंसानी सुख-दुख, प्रेम-सौहार्द, ईर्ष्या-द्वेष जैसे मानवीय गुणों से मिलकर बनता है। यह उनकी बड़ी बहन [लता मंगेशकर] की उस छवि से अलग है जो भारतीय जगत में लगभग ईश्वरीय है। ईश्वर की आराधना की जा सकती है, किंतु अपने सुख-दुख विस्तार में किसी मनुष्य से ही बाँटे जा सकते हैं। हालाँकि हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि इन छवियों के बन जाने में दोनों ही बहनों ने कोई सायास प्रयास नहीं किया है।

आशा भोसले एक इंटरव्यू में कहती हैं कि यदि वह बांग्लादेश या पाकिस्तान से होतीं, तब उन्हें लता की छाया में नहीं देखा जाता और संभवतः तब उन्हें लता के समकक्ष रखते हुए उचित मूल्यांकन मिलता। लता हमेशा उस चश्मे में पड़ती थीं, जिससे आशा को देखा जा रहा होता था। लता की छोटी बहन होने के कारण एक छोटा होने का बोध हमेशा उनके मूल्यांकन के साथ रहा। हालाँकि आज की तारीख़ में हिंदी फ़िल्म संगीत जगत की सर्वाधिक लोकप्रिय गायिकाओं में आशा भोसले का नाम लता मंगेशकर के साथ निर्विवाद रूप से लिया जाता है। फिर भी अगर लता को पहले और आशा को दूसरे नंबर पर रखा जाता है तो शायद इसमें गायकी से ज़्यादा वह छवि ही है जो जनमानस किसी के पेशेवर कार्य के साथ-साथ उसके निजी जीवन में झाँककर बनाता है। लता शायद पार्श्व गायिकाओं में उसी तरह महान् हैं, जिस प्रकार की महानता राजनेताओं में अटल बिहारी वाजपेयी को प्राप्त है।

लता और आशा दोनों ही फ़िल्म संगीत के उस विशाल दौर का हिस्सा रहीं, जब फ़िल्म का संगीत किसी फ़िल्म की सफलता की गारंटी होता था। उसका महत्त्व फ़िल्म की कहानी या अभिनेताओं की लोकप्रियता जैसा ही था। लता और आशा ने संगीत को इंडस्ट्री में तब्दील होते हुए देखा और फिर कई दशकों तक उस इंडस्ट्री के सबसे चर्चित चेहरों में एक बनी रहीं। हालाँकि यह एक अफ़सोस की बात भी है कि दोनों के जीवनकाल में ही फ़िल्म संगीत अपने उस स्वर्णिम काल से निकलकर अब एक अवसान की तरफ़ बढ़ता नज़र आता है। अब वह फ़िल्म का वैसा हिस्सा नहीं रहा, जिसका काम कहानी को आगे बढ़ाने या कहानी के एक हिस्से में चल रहे ख़ास भाव को गहराई देना था। अब वह उस 12वें खिलाड़ी की तरह टीम का हिस्सा है, जिसे खेलने के लिए मैदान पर नहीं बुलाया जाता और जो सिर्फ़ मैच ख़त्म होने पर ट्रॉफ़ी लेने के लिए खिंचाई जाने वाली फ़ोटो में शामिल होता है।

आज की फ़िल्मों और वेब सीरीज़ में कहानी ही एकमात्र नायक है। कह सकते हैं कि फ़िल्मों में यह कविता और संगीत से रहित गद्य का दौर है। कहानी के नएपन के विकल्प को नए तरह के संगीत से स्थानापन्न नहीं किया जा सकता। यह कहानियों में कुछ बिल्कुल नया सोचे जाने का दौर है। फ़िल्म संगीत की लोकप्रियता में ह्रास की एक प्रमुख वजह ‘80 और ‘90 के दशकों में उसमें उत्तरोत्तर आता गया सतहीपन भी है। जब गीतों में बोल का स्तर गिरता गया और धुनों में कुछ इस तरह के प्रयोग किए गए—जो कुछ समय के लिए अलग सुनाई देने के कारण चर्चा में बने रहते थे, किंतु गहराई के अभाव में धीमे-धीमे भुला दिए जाते। समय-समय पर अब भी कुछ अच्छे मौलिक फ़िल्मी गीत सुनाई दे जाते हैं, किंतु अब कहानी का ज़रूरी हिस्सा न होने के कारण उनकी अहमियत पहले जैसी नहीं रह गई। फ़िल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों के समानांतर फ़िल्म संगीत से जुड़ा हुआ, जिस तरह का स्टारडम लता, आशा, रफ़ी और किशोर जैसे गायकों ने अपने समय में जिया, वह सोनू निगम, शान, श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान तक आते-आते कमज़ोर होता जान पड़ता है।

आज के समय में हम अक्सर पुराने गीतों को रीमिक्स करके फ़िल्मों में इस्तेमाल होते हुए देखते हैं। एक तरफ़ जहाँ यह नए संगीतकारों की सीमाओं को दर्शाता है, वहीं दूसरी तरफ़ हमारे पुरोधाओं द्वारा रचे गए संगीत की प्रासंगिकता को भी ज़ाहिर करता है। इसे हमें एक ख़ुशक़िस्मती के तौर पर देखना चाहिए कि हमारे पास इन गीतों का इतना वृहद खजाना है कि हम आने वाले लंबे समय तक सिर्फ़ रीमिक्स के दम पर संगीत की रचना कर सकते हैं।

आशा भोसले संगीत के खेल की एक हरफ़नमौला खिलाड़ी रहीं, जिन्होंने भजन और क़व्वालियों से लेकर ग़ज़ल तथा कैबरे गीतों को भी अपनी आवाज़ दी। विविधता का यह दौर ओ पी नैयर, मदन मोहन, ख़य्याम, आर. डी. बर्मन से होते हुए ए. आर. रहमान और अनु मलिक तक जाता है। इसके साथ ही नूतन, वहीदा, हेलेन, हेमा, रेखा से चलते हुए यह आवाज़ उर्मिला, ऐश्वर्या, काजोल से होती हुई, विद्या बालन तक आती है। संगीत के आकाश में आशा की उपस्थिति क्षितिज की तरह फैली हुई दिखती है।

लता, किशोर, रफ़ी, मुकेश और उस दौर के जाने-माने संगीतकारों के जाने के बाद, उस दौर को जानने के लिए हमारे पास आशा थीं। आशा भोसले के अवसान के साथ ही अब उस सुनहरे दौर का आख़िरी और संभवतः सबसे चमकदार तारा भी अस्त हुआ। आशा भी बहुत सारी लोकप्रियता और सम्मान के साथ-साथ मन में कुछ मलाल लेकर इस संसार से विदा हो गईं।

समय की लगातार बहती नदी में आशा उस मज़बूत चट्टान-सी खड़ी दिखती हैं, जिस पर समय का कोई निशान नहीं छूटा और जो स्वयं उस नदी को आगे का आकार देती है। यह चट्टान अब भले ही अपने भौतिक रूप में विद्यमान न हो, लेकिन फ़िल्म संगीत की दिशा अभी आने वाले लंबे समय तक उन्हीं के द्वारा आकार दिए गए रास्तों पर चलती रहेगी।

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