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आबै का इंतज़ार

गाँव-घर में कहा जाता है कि सपने में अपने किसी प्रियजन को मरा हुआ देखो, तो उसे यह बात मत बताओ। ऐसा करने से उसकी उम्र बढ़ती है और अगर बता दिया, तो उसकी उम्र घट जाती है। मैंने अपना वह सपना कभी आबै को नहीं बताया।

बचपन में देखी हुई एक नेपाली फ़िल्म याद आती है। उसमें एक बच्चे को दूसरे अभिभावक बताते हैं कि उसकी माँ अब इस दुनिया में नहीं रही। यह सुनकर मैं सहम जाता था। सोचता था, ‘अगर मेरी आबै भी यह दुनिया छोड़ गईं, तो मैं क्या करूँगा? किसके साथ सोऊँगा? भूख लगेगी तो किससे कहूँगा? घास और लकड़ी काटकर लाने के बाद किसे दिखाऊँगा? गाय-बकरियाँ चराकर लाने के बाद किसे दिखाऊँगा? सुनहरे चावल के साथ आटो में सिंकी (स्थानीय अनाज से बना खाद्य पदार्थ) खाते समय अगर मिर्ची लगे, तो किसे चिढ़ाऊँगा? किसी बात से मन दुखे, तो ज़मीन की धूल में किसे दिखाकर लोट-लोटकर रोऊँगा? आबै को कहाँ खोजूँगा?’

उस रात मैं आबै का हाथ कसकर पकड़कर सोया था…

आबै के पुसै (ससुर) ग्राम पंचायत के मुखिया थे। वे दुदु बाजे (स्थानीय पारिवारिक संबोधन) की सबसे छोटी पत्नी और घर की मँझली बहू थीं। मुखिया के घर में हमेशा मेहमानों का आना-जाना लगा रहता था। आबै के हाथों को कभी आराम नहीं मिलता था। रसोई, कमरे, गोठ (पशुओं को रखने की जगह), जंगल—हर जगह आबै के पैर सक्रिय रहते थे। अब समझ में आता है कि बाजे ने आबै से विवाह शायद प्रेमपूर्वक जीवन बिताने के लिए नहीं, बल्कि एक कामगार और संतान पैदा करने वाली स्त्री के रूप में किया था, जो घर की पूरी व्यवस्था सँभाल सके।

विवाह के बाद जब आबै बिजु, पश्चिम सुर्खेत आईं, तो उन्होंने सबसे बड़ी संतान के रूप में मेरी माँ को जन्म दिया। उसके बाद मँझली, साँइली, काइँली और कुछ समय बाद सबसे छोटी बेटी को जन्म दिया। सबसे छोटी बेटी के जन्म के समय केवल बेटियाँ पैदा करने के कारण आबै को खाने के बर्तन तक दिए बिना घर से अलग कर दिया गया। वे अपनी चार बेटियों को लेकर बद्दिचौर में एक झोपड़ी बनाकर रहने लगीं। वहीं उन्होंने अपनी सबसे छोटी बेटी को जन्म दिया। बाद में मेरा जन्म भी उसी घर में हुआ।

मैं ठीक से नहीं जानता कि आबै ने अपने पुसै (ससुर) से कितना अपमान और दुख सहा होगा। गाँव वाले कहते हैं, “उस समय फुपू (बुआ) और सौत (पति की दूसरी पत्नी) ने खोतेनी माइली को बहुत दुख दिया था!” बिद्यापुर से मध्य सुर्खेत आने के बाद उनका वह दुख और भी पहाड़ की तरह ऊँचा होता गया। अकेली माँ और पाँच बेटियों की ज़िम्मेदारी। ख़ुद निरक्षर होने के बावजूद आबै इस बात को लेकर सचेत थीं कि बेटियों को पढ़ाना चाहिए। उन्होंने अपनी पूरी ताक़त लगाकर उस समय की सामाजिक सोच—‘बेटियों को पढ़ाना नहीं चाहिए, उनकी शादी कर देनी चाहिए’—को चुनौती दी और अपनी बेटियों को पढ़ाया। उसी की वजह से मुझे भी अक्षर पहचानने का अवसर मिला।

बेटियाँ स्कूल तो जाती थीं, लेकिन स्कूल की पोशाक, किताबें और फ़ीस हमेशा उनके रास्ते की बाधा बनती थीं। पति ने साथ नहीं दिया था, इसलिए खर्च जुटाने का कोई निश्चित स्रोत नहीं था। थोड़ा-बहुत अनाज और शराब बेचकर जो पैसे मिलते, उन्हीं से बेटियों की पोशाक, किताबें और फ़ीस का इंतज़ाम होता था। इन्हीं कठिनाइयों से जूझते हुए आबै के जीवन के अधिकांश पल बीते।

आबै ने एक आदिवासी अकेली स्त्री के रूप में सामने आने वाली हर बाधा और कठिनाई को पार किया। ख़ुद को और अपनी बेटियों को आवारा पुरुषों की गिद्ध जैसी निगाहों से बचाते हुए उन्होंने पितृसत्तात्मक समाज की आँखों में आँखें डालकर खड़ा होना सिखाया। शायद आबै की ही प्रेरणा से मेरी मँझली और साँइली छ्यामा (माँ की बहनों के लिए स्थानीय संबोधन) अर्थात् आबै की मँझली और साँइली बेटियों ने गाँव में ख़ुद हल चलाकर खेती की और खेती-किसानी के काम को पुरुषों तक सीमित मानने वाली धारणा को बदलने में मदद की। आज भी खेत में फ़सल लगाने के लिए श्रम देने वाले पुरुषों को ही खोजा जाता है।

बाजे ने ज़मीन तो दी, लेकिन ज़मीन का पुर्जा (स्वामित्व का दस्तावेज़) नहीं दिया। जब आबै की साँइली और सबसे छोटी बेटी को अपने पति और पिता से आसानी से ज़मीन का हक़ नहीं मिला, तो आबै अदालत तक गईं और अपना हक़ लेकर ही लौटीं। शायद वही विद्रोही चेतना मुझमें भी आई है।

शायद अपनी कोख से बेटा न जन्मने के कारण, या उससे भी अधिक किसी स्वार्थ के बिना, उन्होंने मुझे अपनी बेटियों से भी अधिक प्यार किया। अपने हाथों में मुझे उठाकर आकाश की ओर उछालते हुए ‘छाक्कुन नाकुन छाक्कुन’ कहकर नचाती थीं। मैं आबै की बुलाकी (नाक में पहना जाने वाला आभूषण) को देखते हुए नाचता था। आबै को मुझे खिलाते हुए देखकर पड़ोसी मज़ाक़ में कहते, “खिलाओ, बज्यै (बुज़ुर्ग महिला के लिए स्थानीय संबोधन), नाती को।”

जिस खुरदुरे किसान के हाथों ने कभी कॉपी और क़लम नहीं पकड़ी थी, उन्हीं हाथों ने मेरा नन्हा हाथ पकड़कर मुझे ‘क’ लिखना सिखाया। उन्होंने मुझे सिंदुरे बैल और चौली गाय से प्यार करना सिखाया। गाँजलु बकरी से प्यार करना सिखाया। चल्लेनी माउ (स्थानीय नाम) से प्यार करना सिखाया। काले कुत्ते से प्यार करना सिखाया। इस तरह उन्होंने मुझे अन्न, पेड़-पौधों, फ़सलों और मिट्टी से प्रेम करना सिखाया। मेरे भीतर करुणा का भाव जगाया।

आबै जहाँ-जहाँ जातीं, मुझे भी अपने साथ ले जातीं। किसी की शादी में या तीज पर मायके, दीदी से मिलने थारी, बहन से मिलने सदरमुकाम (ज़िले का मुख्यालय) और स्वाउले। मैं आबै का अलग न किया जा सकने वाला हिस्सा था। न आबै मुझे छोड़कर कहीं अकेली जा सकती थीं, न मैं आबै के बिना घर में अकेला रह सकता था। मैं आबै को अकेले खड़े होकर नागरिकता की तस्वीर तक खिंचवाने नहीं देता था।

जब मैं उस प्रादेशिक अस्पताल पहुँचा, जहाँ आबै को रखा गया था, तब आधी रात हो चुकी थी। आबै का ऑपरेशन हो चुका था। उन्हें अभी तक होश नहीं आया था। डॉक्टर के अनुसार उनके बचने की संभावना केवल पाँच प्रतिशत थी। यह बात काइँली छ्यामा ने बताई। छ्यामा ख़ुद को सँभालने की कोशिश कर रही थीं। मैंने भी ख़ुद को सँभालने की कोशिश की, लेकिन सँभाल नहीं पाया। अस्पताल के एक कोने में जाकर मैं भी रोया। मेरे रोने के बाद छ्यामा मुझे सँभालने की कोशिश करने लगीं। लेकिन मैं रोता ही रहा, छ्यामाओं के बीच बैठकर ठीक वैसे ही, जैसे बचपन में आबै मुझे छोड़कर सदरमुकाम जाती थीं और मैं छ्यामाओं के साथ सोने से मना करके रोया करता था।

किसी समय एक मित्र ने कोटेश्वर की पहाड़ी पर चाय पीते हुए मुझसे कहा था, “पवनजी, आपके मरने पर रोने वाला कोई है?”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा था, “आबै।”

सुबह डॉक्टर आए और बताया कि मस्तिष्क में ख़ून जम जाने के कारण होश आने की संभावना नहीं है और आईसीयू में रखने का भी कोई फ़ायदा नहीं होगा।

बचपन में शरारत करने पर जब दूसरे लोग मुझे दौड़ाते थे, तो मैं आबै की गोद में जाकर छिप जाता था। मुझे लगता था कि इस दुनिया में मेरी आबै से बढ़कर कोई नहीं है। आबै से ज़्यादा ताक़तवर भी कोई नहीं है, राजेश हमाल से भी ज़्यादा ताक़तवर।

जब वही ताक़तवर नारी आईसीयू में अपनी अंतिम साँसें ले रही थीं, तब मैं ख़ुद को बहुत कमज़ोर और अकेला महसूस कर रहा था।

डॉक्टर ने विकल्प देते हुए कहा, “यह उनकी आख़िरी धड़कन है। उन्हें कृत्रिम साँस दी जा रही है। ऐसे ही रखे रहने से उन्हें और तकलीफ़ होगी। सिर्फ़ पैसे ख़र्च होंगे। परिवार फ़ैसला करे।”

मैं घबरा गया। लगा, जैसे अचानक कोई बड़ा वज्रपात हो गया हो। हाथ-पैर ढीले पड़ गए। शरीर की सारी ताक़त जैसे ख़त्म हो गई। ऐसा लगा, मानो दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया हो। क्या करूँ, क्या न करूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा था। चारों ओर अँधेरा छा गया था।

रिश्तेदार आने लगे। परिवार की सहमति बनी कि आज ही उन्हें घर ले जाकर बाक़ी रिश्तेदारों को ख़बर कर दी जाए। मेरी आवाज़ दब गई थी। मैंने उसी दबी हुई आवाज़ में विरोध करने की कोशिश की, “मेरी आबै के साथ यहाँ कुछ मत करो। अस्पताल में नहीं, मैं आबै को घर में किमु (शहतूत जैसा फल देने वाला स्थानीय पेड़) के पेड़ के नीचे सुलाना चाहता हूँ, जहाँ आबै ने मेरे साथ-साथ किमु के उस पेड़ को भी प्यार से पाला था।”

किमु के फलने के हर मौसम में मेरे पैरों के तलवे किमु के रंग से रंग जाते थे। मेरे पैरों के पास किमु के रंग में रंग जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था। बाद में भी मैंने आबै के पैरों को उसी तरह रंगा हुआ देखा था।

हमेशा की तरह एक दिन आबै मुझे अपनी पीठ पर लादकर गाय-बकरियाँ चराने जंगल ले गईं। ज़मीन ढलानदार थी, इसलिए बकरियों को सँभालना मुश्किल होता था। ऊपर से मुझे पीठ पर लादकर चढ़ाई-उतराई करना और भी कठिन था।

मुझे ज़मीन पर उतारने पर मैं रोने लगता था। इसलिए आबै मुझे पीठ पर लादे हुए ही बड़ी मुश्किल से ढलानदार ज़मीन पर तिरछे चलते हुए मवेशियों को वापस ला रही थीं। तभी उनका पैर एक पत्थर में उलझ गया और वे गिर पड़ीं। कुछ देर तक वे उठ नहीं सकीं। मैं चीख-चीखकर रोने लगा। थोड़ी देर बाद आबै उठीं और अपने दाहिने हाथ को पकड़े रहीं। कुछ समय बाद उन्होंने मुझे पीठ पर बिठाया और घर की ओर चल पड़ीं। बाद में पता चला कि आबै का हाथ टूट गया था।

एक दिन मैंने आबै की थैली से 100 भारतीय रुपये चुरा लिए और उन्हें बदलवाने के लिए पास की दुकान, चौरे बाजे के यहाँ चला गया। बाजे मुझे बहला-फुसलाकर घर ले आए और पैसों के साथ मुझे आबै के हवाले कर दिया। आबै ने मुझे समझाया, “काले, पैसे नहीं चुराने चाहिए। मैं भले ही न देखूँ, भगुमान (भगवान) तो देख रहे हैं। अब ऐसा मत करना, है न?”

मैंने सिर हिलाकर हामी भर दी।

जब भी कोई मुझसे कुछ कहता, आबै मेरे लिए ढाल बनकर खड़ी हो जाती थीं। गाँव में किसी के बग़ीचे का फल अपने आप गिर भी जाता, तो बग़ीचे का मालिक मुझे दोष देने आ जाता। आबै उसे डाँटकर भगा देती थीं।

मुझे आज भी याद है, गाँव की एक स्त्री ने मेरा अपमान करते हुए कहा था, “ऐसे बिना बाप के बच्चे हमारे समाज को बिगाड़ देंगे।” यह बात एक कान से दूसरे कान तक पहुँचते-पहुँचते मेरी आबै तक पहुँच गई। आबै ने अपनी पूरी ताक़त लगाकर उस स्त्री का विरोध किया।

उस रात मैंने आबै से पूछा था, “आबै, अगर बाप हो तो क्या होता है?”

आबै मुझे गोद में लेकर देर रात तक रोती रहीं। उसके बाद मैंने उनसे यह सवाल कभी नहीं पूछा। दोस्तों से भी इसी बात को लेकर कई बार अपमानित हुआ, लेकिन आबै को कभी नहीं बताया, क्योंकि मैं उन्हें रोते हुए नहीं देखना चाहता था।

आबै अक्सर बालों में कंघी करके बैठी रहती थीं। अपने काले बालों में काली डोरी बाँधती थीं। नीला गुन्यू (नेपाली स्त्रियों का पारंपरिक परिधान) और ढाका की चोली (ढाका कपड़े से बनी पारंपरिक चोली) पहनती थीं। कमर में पटुकी (कमर पर बाँधा जाने वाला कपड़ा) बाँधती थीं और उसके किनारे पर खुर्पेटो (औज़ार रखने की छोटी थैली) लटकता रहता था, जिसके भीतर आसी (दराँती) रखी होती थी।

मुझे वह दिन याद है, जब मैं आबै का गुन्यू पकड़े कक्षा एक में दाख़िला लेने गया था।

जब स्कूल में अभिभावकों को बुलाया जाता, तो मेरी ओर से आबै ही आती थीं। आबै के स्कूल के गेट से भीतर आते ही मेरा आत्मविश्वास बढ़ जाता था। घर पर मैं आबै को ‘क, ख, रा’ कंठस्थ करके सुनाता था। आबै बहुत ख़ुश होती थीं और मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहती थीं, “जब मैं बूढ़ी हो जाऊँगी, तब तू बड़ा हो जाएगा और मेरा पालन-पोषण करेगा न, बेटा?”

मैं शर्माते हुए वर्णमाला की ओर देखते हुए कहता, “करूँगा, हाँ…”

“तू तो आलसी है, क्या काम करके मेरा पालन करेगा?” यह पूछने पर मैं कहता, “झाड़ू से घर बुहारकर पालूँगा।”

आबै ख़ुश होकर होंठ टेढ़े करतीं और मुझे कुरौनी (स्थानीय दुग्ध-व्यंजन) तथा भात का माड़ (चावल का पानी) खाने को देती थीं।

सबसे छोटी छ्यामा आबै की ओर इशारा करके मुझे चिढ़ाते हुए कहती थीं, “यही मेरी मम्मी हैं।”

मैं जवाब देता, “आपकी मम्मी हैं, मेरी आबै हैं।”

जब आबै को घर लाया गया, तब सभी पड़ोसी इकट्ठा हो चुके थे। साँइली छ्यामा बेहोश थीं। सभी पड़ोसी आबै को आख़िरी बार देखने आए थे। आबै को घर के बीच वाले कमरे में रखा गया।

बेफ़िक्र होकर सो रही आबै पड़ोसियों से बातें करने के लिए नहीं उठीं। बेटियों को समझाने के लिए नहीं उठीं। मुझे “बाबू, आ गए?” कहकर प्यार करने के लिए भी नहीं उठीं। आबै अपने ही पक्के घर में सोई रहीं, वह घर जिसे उन्होंने सालों तक एक-एक ईंट जोड़कर बनाया था।

एक सप्ताह पहले आबै से फ़ोन पर बात हुई थी। उन्होंने कहा था, “बाबू, मुझसे मिलने नहीं आओगे? लगता है, अब तुम्हारे मिलने से पहले ही मर जाऊँगी।”

हर बार फ़ोन पर बात करते हुए आबै इसी तरह भावुक होकर आँसू बहाने लगती थीं। जब मैं घर आता, तो वे सब कुछ भूलकर मेरी देखभाल में लग जातीं और कहतीं, “वहाँ खाना नहीं मिलता होगा, इसलिए दुबले हो गए हो।”

उनकी नज़रों से दूर रहते हुए मैं हमेशा दुबला ही रहा, वही छोटा-सा पवन बना रहा।

जब भी मैं घर छोड़कर जाता, आबै आँसू बहाते हुए अपने गुन्यू में खोंसी हुई थैली से कुछ पैसे निकालकर देतीं और कहतीं, “उस पराए शहर में मत जाओ, बाबू। वहाँ तुम्हारा ख़याल कौन रखेगा? तुम्हें तो खाना पकाना भी ठीक से नहीं आता। यहीं रहो, मेरी वृद्धावस्था की पेंशन आती है।”

आबै मुझे हर तरह से बहलाने की कोशिश करती थीं। ठीक वैसे ही, जैसे बचपन में मुझे भिक्षु (श्रमण) बनने से रोकने के लिए बहलाया था। ‘थाइलैंड मत जाओ, तुम्हें साइकिल ख़रीदकर दूँगी’ कहकर भी मुझे मनाया था।

गाँव में टिन की छत लगाना वर्ग के लिहाज़ से ऊपर उठने का संकेत माना जाता था। पड़ोस में रहने वाले बाजे, जो आबै के सबसे छोटे देवर थे, ने पुश्तैनी घर की घास की छत हटाकर टिन की चादरें लगा दी थीं। यह देखकर मैंने आबै से पूछा था, “आबै, हमारे घर पर टिन की छत कब लगेगी?”

आबै मुझे सहलाते हुए जवाब देती थीं, “टिन की छत लगा दी, तो गर्मियों में धूप से घर इतना गर्म हो जाएगा कि उसमें बैठना ही मुश्किल होगा। मंसिर-पुस (नेपाली पंचांग के दो महीने) में ओस पड़ेगी और घर भीग जाएगा।”

मेरी अबोध समझ जितना उत्तर समझ सकती थी, उतना पाकर मैं संतुष्ट हो जाता था।

मैं घास-लकड़ी का भारी बोझ उठाकर घर के सामने खड़ा होकर आबै को आवाज़ देता था। जब तक आबै मुझे देखकर यह नहीं कहती थीं, “शाबाश, मेरा नाती काम करता है”, तब तक मैं वह बोझ उठाए खड़ा रहता था।

उस रात बहुत लंबे समय बाद मैं आबै के पास सोया। सभी छ्यामाएँ भी आबै के पास सोईं। उस रात आबै कुछ नहीं बोलीं। सुबह होने पर भी उन्होंने ढ्यालो (स्थानीय प्रकाश या आग जलाने की व्यवस्था) नहीं जलाया, आग नहीं जलाई, रेडियो नेपाल नहीं बजाया। आबै उठकर मुझे सहलाने नहीं आईं। “काले, कंबल ओढ़ ले” नहीं कहा।

सुबह हुई, अँधेरा चला गया, लेकिन मेरे जीवन का सारा उजाला अपने साथ ले गया। मेरा साहस ले गया, मेरा हौसला ले गया, मेरा प्रिय इंसान ले गया, मेरी आबै को ले गया।

जब आबै बीमार पड़ती थीं और “देवता आ गया” कहकर काँपती थीं, तब मैं निरंकारी गीत की पंक्तियाँ किताब देखकर पढ़ता था—
“सुन सुन ए दीदी भाई, कल का नहीं है यह जीवन,
जीवन का कोई भरोसा नहीं, समझो तो अपना ही कौन है?”

इतना पढ़ने के बाद आबै ठीक हो जाती थीं। पानी माँगती थीं और मैं पानी लाकर देता था। मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहती थीं, “मेरे मरने के बाद तू ही मेरा क्रिया-कर्म करेगा न?”

मैं अवाक् खड़ा रह जाता था।

आबै के देवता भी तरह-तरह के थे। निराकार, आदिवासी देवता, जो मक्का चढ़ाते समय और अन्न-बाली की देखभाल करते समय ही आबै की स्मृति में आते थे।

कुछ पड़ोसी आपस में बातें कर रहे थे, “खोतेनी माइली बहुत सुख से गईं। बेटियों को व्यवस्थित करके गईं। झोंपड़ी थी, पक्का घर बनाकर गईं।”

कुछ संतान और रिश्तेदार मर्माहत थे, “बेटा नहीं है, छोटा क्रिया-कर्म कर दें। पूरे बारह दिन मानने की ज़रूरत नहीं। बेटियाँ तीन दिन बारकर (शोक-संस्कार की स्थानीय अवधि या परंपरा) ही पूरा कर देंगी।”

कुछ लोगों ने कहा, “नाती ने क्रिया-कर्म करने की बात कही है।”

आबै के पास बैठी बेटियों ने अपनी माँ का क्रिया-कर्म स्वयं सिर मुंडवाकर करने का निर्णय लिया। बड़े मामा टेक, जिन्हें जन्म जेठी बजै (बड़ी दादी/बुज़ुर्ग स्त्री के लिए स्थानीय संबोधन) ने दिया था, लेकिन जीवन और कर्म मेरी आबै ने दिए थे, अपनी छोटी माँ का क्रिया-कर्म करने के निर्णय के साथ काला पहाड़ से आ पहुँचे।

बचपन में मैं किसी की भी अंतिम यात्रा नहीं छोड़ता था। आबै कहा करती थीं, “मेरा काले सबकी अंतिम यात्रा में जाता है और मेरे लिए भी अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले लोग जुटाता है।”

मैं बहुत ख़ुश होता था। किसी की अंतिम यात्रा से लौटते समय घर के लिए कुछ न कुछ लेकर आता था—कभी सीमेंट का ब्लॉक, तो कभी किसी कुतिया के साथ उसके पिल्ले।

मुझे इंसानों के अलावा दूसरे जीव-जंतु भी बहुत प्यारे लगते हैं। यह गुण शायद आबै से ही मुझमें आया होगा। मैं घर में जो भी जीवित या निर्जीव चीज़ें लाता था, आबै उन्हें बहुत प्यार और सावधानी से सँभालकर रखती थीं। मेरे द्वारा बटोरी गई हर चीज़ को आबै सँभालकर रख देती थीं। उनमें से बहुत-सी चीज़ें आज भी हैं।

एक साल पहले कान्तिपुर के शनिवार परिशिष्ट ‘कोसेली’ में राउटे समुदाय पर मेरा फ़ोटो-फ़ीचर प्रकाशित हुआ था। स्थानीय मास्टर कमल सर के माध्यम से वह पत्रिका आबै के हाथों तक पहुँची। आबै बहुत ख़ुश हुईं। “मेरा नाती पत्रिका में आया है”, कहते हुए उन्होंने गाँव में जैसे ढोल ही पिटवा दिया था। वह पत्रिका उनके अंतिम समय में भी उनके सिरहाने रखी हुई थी।

एक दिन आबै ने कमल सर को मनाते हुए कहा था, “बाबू, मेरा काले चुनाव लड़ने के लिए बहुत उत्साहित है, उसे एक वोट दे देना है।”

संभवतः आबै सुर्खेत में वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति को वोट देने वाली पहली व्यक्ति थीं। और मुझे वोट देने वाली पहली व्यक्ति भी आबै ही थीं।

यह स्मृति लिखते हुए मैं बार-बार चौंक जाता हूँ। मेरा चेतन मन अभी तक यह स्वीकार नहीं कर पा रहा कि आबै अब भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन मेरा अवचेतन मन कुछ क्षणों के लिए इस सच्चाई को स्वीकार कर लेता है और मुझे राहत देता है। अब मुझे अवचेतन के वे क्षण अच्छे लगने लगे हैं, जिनके हर पल में मैं आबै की छाया के नीचे की शीतलता महसूस करता हूँ।

आबै के अंतिम क्षणों में उनके साथ रह नहीं पाने का पछतावा मुझे भीतर तक मर्माहत करता है। जब भी मैं घर जाता हूँ, हर दिन उनकी समाधि पर जाकर कुछ पल बिताता हूँ। आबै को याद करता हूँ। आबै ने जो जीवन जिया, उसे याद करता हूँ। बेटियों को पालने के लिए उन्होंने जो संघर्ष किया, उसे याद करता हूँ। अपने पति से जितना भी प्रेम नहीं मिला, वह सारा प्रेम उन्होंने मुझ पर लुटाया—यह याद करता हूँ। आबै से कभी मन दुखाने वाले अपने पल याद करता हूँ। बचपन में मेरी शरारतों पर उन्होंने मुझे जो समझाया, वह याद करता हूँ। ख़ुद पुराने कपड़ों में ख़ुश रहकर मेरे लिए तिहार (नेपाली त्योहार, विशेषकर दीपावली का पर्व) में नए कपड़े ख़रीद देने की बात याद करता हूँ। आटो खाने के लिए मुझे बहलाने की बात याद करता हूँ। छोटी-छोटी बातों पर मुझे दुलारने के वे पल याद करता हूँ और फिर इंतज़ार करता हूँ।

मैं आबै का इंतज़ार करता ही जा रहा हूँ।

आशा है, आने वाले तिहार में मैं फिर बारह साल का हो जाऊँगा। दोस्तों के साथ भैली (तिहार के अवसर पर घर-घर जाकर गाए जाने वाले पारंपरिक गीत और उत्सव) खेलकर, भूखा और थका हुआ जब घर लौटूँगा, तब आबै पुराने घर की रसोई में सेलरोटी (नेपाली पारंपरिक गोलाकार चावल की रोटी) तल रही होंगी। आँगन भर किमु के दाने गिरे होंगे और पूरा आँगन रंगीन हो गया होगा।

मैं उन्हीं किमु के दानों को पैरों से कुचलता हुआ, नंगे पाँव, जहाँ आबै होंगी, उधर दौड़ता हुआ जाऊँगा…

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