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दिल्ली विश्वविद्यालय पर दोहे

हम अबुद्धि सुरतान इह। भट्ट भाष सुष काज॥

नव रस में रस अप्परस। इहै जोग सुष काज॥

जो कछु मंगहु भट्ट बर। करै बनै सुबिहान॥

भुम्मि लच्छि द्यौं चंद तुहि। नह अप्पौं चहुआंन॥

नह मंगै कबिचंद नृप। कहौ रसना छंडि॥

कथ्थ पुब्ब आलम कहौ। छिनक श्रवन जो मंडि॥

बालपनै ग्रथिराज सम। अति मित्रं तन कीन॥

जु कछु स्वाद मन मैं भयौ। इच्छा रस मंगि लीन॥

पुब्ब पराक्रम राज किय। कछु जंपो तुछ ग्यान॥

अरु जु कछू तुछ जपिहौं। सब जानौ सुबिहान॥

इक्क सुदिन प्रथिराज रस। मुष कढ्ढी तिहि बार॥

सिंगिन सरवर इच्छिविन। सत्त हनन घरियार॥

बर सुनंत कंपै हियौ। दिल रहै सुरतान॥

सुद्धरोग भौ रोग मन। कढ्ढन कौं सुबिहान॥

मैं जान्यो अचरिज्ज मन। नृपति संच की लीह॥

तब लगि इहि बिधिना लषी। आय संपत्ते दीह॥

सुनि सहाब गह हंस्यौ। बे बे भट्टा सुभट्ट॥

अंषिहीन मति हीन भौ। कहा मग्गै मति नट्ठ॥

सब बिधि घटी नींरद की। हम जाचक नह पीर॥

बनच परै सिर कट्टि दै। ते षित्री कुल धीर॥

तब चिंतिय साहाब मन। हंसि बु्ल्यौ सम चंद॥

जाय मंगि सम राज सौं। हम दिष्षहि आनंद॥

तव गोरी हुज्जाब प्रति। कहै सुकबि लै जांहु॥

अरस परस बिन दूरि तै। लै आसीस कहाउ॥

अग्या मन्नि हुजाब पहु। ले चल्लिय कबि सथ्थ॥

प्रथम राज पासहु गयौ। तब रक्क्यौ दह हथ्थ॥

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चवै चंद बरदाइ इम। सुनि मीरन सुरजात॥

दै कमान चौहान कौं। सहि दियै कछु दान॥

चंदबरदाई

रात्यूं रूंनी बिरहनीं, ज्यूं बंचौ कूं कुंज।

कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या बिरहा पुंज॥1॥

अंबर कुंजां कुरलियाँ, गरजि भरे सब ताल।

जिनि पैं गोबिंद बिछुटे, तिनके कौण हवाल॥2॥

चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिलि परभाति।

जे जन बिछुटे राम सूं, ते दिन मिले राति॥3॥

बासुरि सुख नाँ रैणि सुख, नाँ सुख सुपिनै माहिं।

कबीर बिछुढ्या राम सूं, नौ सुख धूप छाँह॥4॥

बिरहिन ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझै धाइ।

एक सबद कहि पीव का, कवर मिलैंगे आइ॥5॥

बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।

जिब तरसै तुझ मिलन कूं, माने नाहीं विश्राम॥6॥

बिरहिन ऊठै भी पड़े, दरसन कारनि राम।

मूवां पीछैं देहुगे, सो दरसन किहि काम॥7॥

मूवां पीछैं जिनि मिलै, कहै कबीरा राम।

पाथर घाटा लोह सब, (तब) पारस कौणें काम॥8॥

बिरहा बुरहा जनि कहौ, बिहरा है सुलितान।

जिस घटि बिरह संचरै, सो घटि सदा मसान॥21॥

अंषणियां झांईं पड़ी, पंथ निहारि निहारि।

जीभडियां छाला पड़्या,राम पुकारि पुकारि॥22॥

इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूं जीव।

लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखौं पीव॥23॥

रैणा दूर बिछोहिया, रह रे संषम झूरि।

देवलि देवलि धाहड़ी, देखी ऊगै सूरि॥44॥

सुखिया सब संसार है, खावै अरू सोवै।

दुखिया दास कबीर है, जागै अरू रोवै॥45॥

कबीर

सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सईं दाति।

हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं जाति॥1॥

बलिहारी गुर आपणैं, द्यौं हाड़ी कै बार।

जिनि मानिष तैं देवता, करत लागी बार॥2॥

सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपकार।

लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार॥3॥

राम नाम कै पटंतरै, देबै कौं कुछ नांहि।

क्या ले गुरु संतोषिए, हौंस रही मन मांहि॥4॥

सतगुर के सदकै करूं, दिल अपणीं का साछ।

कलियुग हम स्यूं लड़ि पड़या, मुहकम मेरा बाछ॥5॥

सतगुर लई कमांण करि, बांहण लागा तीर॥

एक जु बाह्या प्रीति सूं, भीतरि रह्या सरीर॥6॥

सतगुर साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक।

लागत ही मैं मिल गया, पड़या कलेजै छेक॥7॥

सतगुर मारया बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि।

अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूटि॥8॥

हँसै बोलै उन्मनीं, चंचल मेलह्या मारि।

कहै कबीर भीतरि भिद्य, सतगुर कै हथियारि॥9॥

गूंगा हूवा बावला, बहरा हूआ कान।

पाऊं थैं पंगुल भया, सतगुर मार्या बाण॥10॥

पीछैं लागा जाइ था, लोक वेद के साथि।

आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥11॥

दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट।

पूरा किया विसाहुणां, बहुरि आँवौं हट्ट॥12॥

ग्यान प्रकास्या गुर मिल्या, सो जिनि बोसरि जाइ।

जब गोबिंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥13॥

कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूंण।

जाति पाँति कुल सब मिटे, नाँव धरौगे कौंण॥14॥

जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।

अंधै अंधा ठेलिया, दून्यूं कूप पड़ंत॥15॥

नां गुर मिल्या सिष भया, लालच खेल्या डाव।

दून्यूं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥16॥

कबीर