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प्रथम सत्र पर दोहे

हम अबुद्धि सुरतान इह। भट्ट भाष सुष काज॥

नव रस में रस अप्परस। इहै जोग सुष काज॥

जो कछु मंगहु भट्ट बर। करै बनै सुबिहान॥

भुम्मि लच्छि द्यौं चंद तुहि। नह अप्पौं चहुआंन॥

नह मंगै कबिचंद नृप। कहौ रसना छंडि॥

कथ्थ पुब्ब आलम कहौ। छिनक श्रवन जो मंडि॥

बालपनै ग्रथिराज सम। अति मित्रं तन कीन॥

जु कछु स्वाद मन मैं भयौ। इच्छा रस मंगि लीन॥

पुब्ब पराक्रम राज किय। कछु जंपो तुछ ग्यान॥

अरु जु कछू तुछ जपिहौं। सब जानौ सुबिहान॥

इक्क सुदिन प्रथिराज रस। मुष कढ्ढी तिहि बार॥

सिंगिन सरवर इच्छिविन। सत्त हनन घरियार॥

बर सुनंत कंपै हियौ। दिल रहै सुरतान॥

सुद्धरोग भौ रोग मन। कढ्ढन कौं सुबिहान॥

मैं जान्यो अचरिज्ज मन। नृपति संच की लीह॥

तब लगि इहि बिधिना लषी। आय संपत्ते दीह॥

सुनि सहाब गह हंस्यौ। बे बे भट्टा सुभट्ट॥

अंषिहीन मति हीन भौ। कहा मग्गै मति नट्ठ॥

सब बिधि घटी नींरद की। हम जाचक नह पीर॥

बनच परै सिर कट्टि दै। ते षित्री कुल धीर॥

तब चिंतिय साहाब मन। हंसि बु्ल्यौ सम चंद॥

जाय मंगि सम राज सौं। हम दिष्षहि आनंद॥

तव गोरी हुज्जाब प्रति। कहै सुकबि लै जांहु॥

अरस परस बिन दूरि तै। लै आसीस कहाउ॥

अग्या मन्नि हुजाब पहु। ले चल्लिय कबि सथ्थ॥

प्रथम राज पासहु गयौ। तब रक्क्यौ दह हथ्थ॥

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चवै चंद बरदाइ इम। सुनि मीरन सुरजात॥

दै कमान चौहान कौं। सहि दियै कछु दान॥

चंदबरदाई