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खोखला ढोल

khokhla Dhol

लियो टॉल्स्टॉय

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और अधिकलियो टॉल्स्टॉय

    इमेल्यान नाम का एक मज़दूर एक दिन अपने मालिक के काम पर जा रहा था। जाते-जाते एक खेती की मेड़ पर कहीं से मेंढ़क फुदककर उसके सामने गया। मेंढ़क इमेल्यान के पैर से कुचल ही गया था कि वह तो इमेल्यान की तरक़ीब से बच गया। इतने में ही सुना कि पीछे से कोई नाम लेकर पुकार रहा है।

    मुड़कर देखता है कि एक बड़ी सुंदर लड़की है। उस लड़की ने कहा, इमेल्यान, तुम शादी क्यों नहीं कर लेत हो?

    इमेल्यान ने कहा कि भला मैं शादी कैसे कर सकता हूँ। जो पहने खड़ा हूँ वही कपड़े मेरे पास हैं, और कुछ भी नहीं। सो कौन मुझसे शादी करने को राज़ी होगा?

    लड़की ने कहा, “तुम कहो तो मैं राज़ी हूँ। मैं बुरी नहीं हूँ।

    लड़की इमेल्यान के मन को बहुत अच्छी लग रही थी। वह बोला, तुम तो परी दिखती हो। पर मेरा ठौर-ठिकाना भी नहीं है। हम लोग रहेंगे कहाँ और कैसे?

    लड़की बोली, इसकी क्या सोच-फिकर है! आलस कम किया और मेहनत ज़्यादा की तो अपने लायक़ खाने-पहनने को तो सब कहीं हो जाएगा।

    इमेल्यान ने कहा, “यह बात है, तो चल, शादी कर लें। लेकिन बताओ कि चलें कहाँ?

    आओ शहर चलो।

    सो इमेल्यान और लड़की दोनों शहर चले। वहाँ शहर के परले सिरे पर दूर एक झोंपड़ी में इमेल्यान को लड़की ले गई। दोनों की शादी हो गई और वे घर बसाकर रहने लगे।

    एक दिन शहर का राजा वहाँ से गुज़रा। इमेल्यान की बीबी भी राजा की सवारी देखने झोंपड़ी से बाहर निकली। राजा ने जो उसे देखा तो दंग रह गया।

    राजा ने मन में कहा, “ऐसी परी-सी सुंदरी यहाँ कहाँ से गई! उसने अपनी सवारी रोककर उसे पास बुलाया। पूछा, तुम कौन हो?

    सुंदरी ने कहा, मैं इमेल्यान किसान की बीबी हूँ।

    राजा ने कहा, ऐसी सुंदर होकर तुमने किसान से ब्याह क्यों किया? तुम तो रानी होने लायक़ हो।

    सुंदरी ने कहा, आप मुझसे ऐसी बात मत कहें। मेरे लिए तो किसान ही अच्छे हैं।

    इस कुछ देर की बात के बाद राजा की सवारी आगे बढ़ गई। लौटकर राजा महलों में तो गया; पर इमेल्यान की स्त्री की मूरत उसके मन से दूर नहीं हुई।

    वह रात भर नहीं सोया। सोचता रहा कैसे उसे पाऊँ। पर उसकी समझ में कोई ठोस जुगत नहीं आई। तब उसने अपने नौकरों को बुलाया और कहा, कोई तदवीर उस परी को पाने की निकालो।

    राजा के नौकरों ने बताया, इमेल्यान को काम करने के लिए महल में बुलाइए। यहाँ हम उससे इतना काम लेंगे, इतना काम लेंगे कि आख़िर वह मर ही जाए। तब उसकी बीबी अकेली रह जाएगी और आप उसे ले लीजिएगा।

    राजा ने वैसा ही किया। फ़रमान हो गया कि इमेल्यान महल में काम करने के लिए आए और स्त्री के साथ वहीं रहे।

    हुक्म इमेल्यान को मिला, तब उसकी स्त्री ने कहा, इमेल्यान, जाओ दिन भर काम करना, पर रात को सोने घर जाना।

    सुनकर इमेल्यान चला गया। महल पहुँचने पर राजा के दीवान ने पूछा, इमेल्यान, बीबी को छोड़कर तुम अकेले क्यों आए?

    इमेल्यान ने कहा, उसकी जगह तो वहीं है। घर उससे बनता है। यहाँ उसे क्या?

    राजा के महलों में उस अकेले को दो आदमियों का काम दिया गया। आशा तो नहीं थी कि वह काम पूरा होगा, पर इमेल्यान उसमें जुट गया और शाम होते-होते अचरज की बात देखो कि काम सब पूरा हो गया। दीवान ने देखा कि काम सब निबट गया है। तब अगले दिन के लिए उससे चौगुना काम बता दिया।

    इमेल्यान घर लौटा। वहाँ सब चीज़ साफ़-सुथरी थी, खाना तैयार था, पानी गरम रखा था और बीबी बैठी कपड़े सी रही थी और पति की बाट देख रही थी।

    उसने पति की आवभगत की, हाथ-पैर धुलाए, खाने-पीने को दिया और काम की बात पूछी।

    इमेल्यान ने कहा कि काम की बात क्या पूछती हो! काम तो इतना देते हैं कि बिसात से ज़्यादा। काम के बोझ से मुझे मारना चाहते हैं।

    स्त्री ने कहा, काम के बारे में झींकना अच्छा नहीं होता। काम के वक़्त आगे-पीछे भी नहीं देखना चाहिए कि कितना हमने कर लिया, कितना बाक़ी रह गया। बस काम करते चलना चाहिए। बाक़ी सब अपने-आप ठीक हो जाएगा।

    सुनकर इमेल्यान बेफिकरी से रात को सोया। सबेरे उठकर वह काम पर गया और बिना दाएँ-बाएँ देखे उसमें लगा रहा। होनहार की बात कि साँझ से पहले सभी काम पूरा हो गया और अँधेरा होते-होते रात बिताने वह अपने घर पहुँच गया।

    राजा के लोग दिन-ब-दिन उसका काम बढ़ाते गए। पर हर रोज़ शाम होने से पहले सब काम ख़त्म हो जाता और इमेल्यान सोने अपने घर पहुँच जाता। ऐसे एक हफ़्ता बीत गया। राजा के नौकरों ने देखा कि भारी काम दे-देकर तो वे इमेल्यान का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। उन्होंने तब से मुश्किल और बारीक़ काम कर दिया। पर उससे भी कुछ हुआ। क्या बढ़ई का क्या राजगिरी का और क्या और तरह का, सब काम इमेल्यान ठीक तरह और ठीक वक़्त से पहले कर देता और मजे में रात को घर रवाना हो जाता। ऐसे दूसरा हफ़्ता भी निकल गया।

    इस पर राजा ने अपने आदमियों को बुलाकर कहा, क्या मैं तुम्हें मुफ़्त का माल खिलाता हूँ? दो हफ़्ते बीत गए हैं, तुमने क्या करके दिखाया? कहते थे, तुम काम से इमेल्यान को थका दोगे। पर शाम होती नहीं कि ख़ुशी से उसे रोज़ गाते हुए घर लौटते मैं अपनी आँखों से देखता हूँ। क्या तुम लोग मुझे बेवक़ूफ़ बनाना चाहते हो?

    बादशाह के सामने वे लोग इधर-उधर करने लगे। बोले, हमने अपने बस तो भारी-से-भारी काम उसे दिया। पर उसने तो सब ऐसे साफ़ कर दिया जैसे झाडू से बुहार दिया हो। वह तो थकता ही नहीं। फिर हमने बारीक़ काम सौंपे। उन्हें भी उसने पार लगा दिया। कुछ भी काम दो वह सब काम कर देता है। जाने कैसे? वह, या तो उसकी बीबी, कोई-न-कोई जादू ज़रूर जानते मालूम होते हैं। हम तो ख़ुद उससे तंग हैं। हाँ, एक बात सोची है। इमेल्यान को बुलाया जाए, कहा जाए कि महल के सामने दिनभर के अंदर एक मंदिर की इमारत तुमको खड़ी करनी है। अगर वह कर सके तो उसका सिर कलम कर दिया जाए।

    राजा ने इमेल्यान को बुला भेजा। कहा, सुनो इमेल्यान, महल के सामने एक नया मंदिर बनवाना है। कल शाम तक वह तैयार हो जाना चाहिए। अगर कर दोगे तो इनाम दूँगा। नहीं करोगे तो सिर उतरवा लूँगा।

    बादशाह की आज्ञा चुपचाप सुनी और इमेल्यान लौटकर चला आया। उसने सोच लिया कि अब जान गई। घर पहुँचकर पत्नी से कहा, सुनती हो? अब तैयारी करो और यहाँ से भाग चलो; नहीं तो बेमौत मरना होगा।

    उसकी स्त्री ने कहा, ऐसे डर क्यों रहे हो? और हम क्यों भाग चलें? इमेल्यान ने कहा, डरने की बात ही है। राजा ने कल-कल में एक पूरा नया मंदिर खड़ा करने का हुक्म दिया है। नहीं कर सकूँगा तो सिर देना होगा। बस, बचने की एक ही राह है। वह यह कि वक़्त रहते हम लोग यहाँ से भाग चलें।

    लेकिन उसकी बीबी ने इस बात को अपने कान पर भी नहीं लिया। बोली, राजा के पास बहुत-से सिपाही हैं। कहीं से भी वे हमें पकड़ लाएँगे। हम बच नहीं सकते। और जब तक बस हो, हमें राजा का हुक्म मानना चाहिए।

    हुक्म मैं कैसे मानूँ जबकि काम मुझसे होना मुमकिन नहीं है। स्त्री ने कहा, तो भी जी क्यों हलका करते हो? जो होगा देखा जाएगा। अभी तो खा-पीकर आराम से सोओ। सबेरे तड़के उठ जाना और सब काम हो जाएगा।

    इस पर इमेल्यान आराम से सोया। अगले दिन पौ फटते ही बीवी ने उसे जगाया। कहा, “झटपट तैयार होकर जाओ और मंदिर का काम पूरा कर डालो। यह हथौड़ी है, ये कीलें हैं। अभी वहाँ एक दिन के लायक़ बाक़ी काम मिलेगा।

    इमेल्यान शहर में गया। चौक में पहुँचा तो देखता क्या है कि मंदिर बना-बनाया खड़ा है। वह ऊपरी कुछ काम करने में लग गया जो शाम तक सब पूरा हो गया।

    राजा ने जगने पर देखा कि सामने मंदिर तैयार खड़ा है और इमेल्यान यहाँ-वहाँ कुछ कीलें गाड़ रहा है। मंदिर बना देखकर राजा को ख़ुशी नहीं हुई। इमेल्यान को सज़ा अब वह कैसे दे? और उसकी बीवी कैसे हाथ लगे? फिर उसने नौकरों को इकट्ठा किया। कहा, इमेल्यान ने यह काम भी पूरा कर दिया। बताओ उसे किस बात पर ख़त्म किया जाए? इस बार कोई पक्की तरक़ीब निकालो। नहीं तो उसके साथ तुम सबके भी सिर उतारे जाएँगे।

    इस पर उन दोनों ने तय किया कि इमेल्यान से महल के चारों तरफ़ एक दरिया बहाने को कहा जाए, जिसमें किश्तियाँ तैर रही हों और किनारे-किनारे पक्के घाट हों। राजा ने इमेल्यान को बुला भेजा और यही हुक्म सुना दिया। कहा, अगर एक दिन में पूरा मंदिर बना सकते हो तो यह काम भी एक रात में कर सकते हो। कल सब हो जाए। नहीं तो तुम्हारा सिर धड़ पर नहीं रहेगा।

    इमेल्यान अब सब आस छोड़ बैठा और भारी जी से घर आया। घर में पत्नी ने पूछा, ऐसे उदास क्यों हो? क्या राजा ने और नया काम बताया है?

    जो हुआ था, इमेल्यान ने कह सुनाया। बोला, चलो, अब भी भाग चलें।

    लेकिन बीवी ने कहा, राजा के सिपाही हैं। उनसे कहाँ बचेंगे? जहाँ पहुँचोगे, वहीं से पकड़ लेंगे। इससे भागना नहीं, हुक्म मानना ही भला है।

    लेकिन मुझसे उतना सब काम कैसे होगा?

    स्त्री ने कहा, जी मत छोटा करो। खा-पीकर आराम से सोओ। सबेरे उठ पड़ना और भगवान ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा।

    चिंता छोड़कर इमेल्यान सो गया। सबेरे ही उसकी पत्नी ने उठकर कहा, उठो, अब महल जाओ। वहाँ सब तैयार है। महल के सामने दरिया के किनारे ज़रा ज़मीन उठी हुई है। लो यह फावड़ा, उसे हमवार कर देना।

    सबेरे उठते ही राजा ने अचंभे से देखा, जहाँ कुछ नहीं था, वहाँ दरिया मौजें ले रहा है, पाल खोले किश्तियाँ तैर रही हैं। राजा को अचरज तो हुआ; पर तो पानी से भरी नदी और उस पर खेलती हुई हंसिनी-सी नौकाओं को देखकर उसके मन में ज़रा ख़ुशी हुई। इमेल्यान को पकड़ पाने पर वह इस कदर बेचैन था। उसने सोचा कि अब मैं करूँ तो क्या करूँ? यह सोचकर उसने फिर अपने नौकरों को बुलवाया।

    देखो तुम लोग, राजा ने कहा, कोई-न-कोई काम निकालो जो उससे हो। समझे? जो कहते हैं वह सब कर देता है। और अब तक उसकी औरत हमको नहीं मिल सकी है।

    सोचते-सोचते नौकरों ने एक युक्ति लगाई। राजा के पास जाकर कहा, “इमेल्यान को बुलाकर कहिए कि देखो इमेल्यान, वहाँ जाओ कि जाने कहाँ और वह चीज़ लाओ कि जाने क्या। तब वह बचकर नहीं निकल सकेगा। वह फिर जहाँ-कहीं भी जाएगा, आप कह दीजिए कि वहाँ के लिए नहीं कहा था। और जो लाएगा, कह दीजिए कि वह हमने मँगाया ही नहीं था। यह कहकर मौत की सज़ा दे दीजिए और उसकी बीबी ले लीजिए।

    राजा सुनकर ख़ुश हुआ। कहा, यह तुमने ठीक सोचा है।

    इमेल्यान को बुलाया गया और राजा ने कहा, इमेल्यान, वहाँ जाओ कि जाने—कहाँ और वहाँ से वह लाओ कि जाने-क्या। अगर नहीं ला सके तो तुम्हारा सिर सलामत नहीं है।

    इमेल्यान ने घर जाकर बीबी से राजा की बात कह सुनाई। सुनकर बीबी सोच में पड़ गई।

    बोली, लोगों ने राजा को इस बार तुम्हें पकड़ने की ठीक तरकीब बता दी है। अब हमें होशियारी से चलना चाहिए।

    यह कहकर वह बैठी सोचती रही। आख़िर बोली, देखो, दूर एक दादी बुढ़िया हैं। सिपाहियों की वह धरती माँ जैसी है। उससे मदद माँगना। अगर वह तुम्हें कुछ दे, या बताए, तो उसे लेकर महल में आना। मैं वहीं रहूँगी। मैं अब राजा के लोगों से बच नहीं सकती; वे मुझे ज़बरदस्ती ले जाएँगे। पर थोड़े दिन की बात है। अगर तुम दादी की बात पर चलोगे तो मुझे जल्दी बचा लोगे।

    उसने यात्रा के लिए पति को तैयार कर दिया। साथ में कुछ कलेवे को बाँध दिया और चरखे का एक तकुआ दे दिया। कहा, देखो, यह तकुआ दादी को देना। इससे वह पहचान जाएगी कि तुम कौन हो। यह कहकर ठीक रास्ता बताकर उसे भेज दिया।

    इमेल्यान चलते-चलते एक जगह पहुँचा, जहाँ सिपाही क़वायद कर रहे थे। इमेल्यान खड़ा होकर उन्हें देखने लगा। क़वायद के बाद बैठकर सिपाही आराम करने लगे। उसने पास जाकर पूछा, भाइयो, आप लोग जानते हैं कि कौन रास्ता वहाँ जाने—कहाँ जाता है और मैं कैसे वह जाने क्या चीज़ पा सकता हूँ।

    सिपाहियों ने अचरज से उसकी बातें सुनीं। फिर पूछा, तुमको किसने यह काम देकर भेजा है।

    मुझको राजा ने यह हुक्म दिया है।

    सिपाहियों ने कहा. हम भी जिस दिन से सिपाही की नौकरी में आए हैं उसी दिन से वहाँ जाने कहाँ जा रहे हैं और अभी कहीं नहीं पहुँचे हैं। और वह जाने क्या ढूँढ़ रहे हैं और अभी तक कुछ नहीं पा सके हैं। हमसे भाई, तुम्हें कुछ मदद नहीं मिल सकती।

    इमेल्यान कुछ देर सिपाहियों के साथ ठहर आगे बढ़ा। कोस-पर-कोस चलता गया। आख़िर एक जंगल आया। जंगल में एक झोंपड़ी थी और थी सिपाहियों की धरती—माँ, वही बुढ़िया दादी, चर्खे पर सूत कात रही थी और रो रही थी। कातते-कातते वह उँगलियों को ले जाकर मुँह के नहीं आँख के पानी से गीला करती थी। इमेल्यान को देखकर बुढ़िया ने चिल्लाकर कहा, कौन है? तू यहाँ क्यों आया है?

    तब इमेल्यान ने वह तकुआ बुढ़िया को दिया और कहा, मेरी स्त्री ने यह देकर मुझे तुम्हारे पास भेजा है।

    बुढ़िया इस पर एकदम मुलायम पड़ गई और हाल-चाल पूछने लगी। इमेल्यान ने सब बता दिया। कैसे लड़की मिली; कैसे वे ब्याह करके गाँव में बसे; कैसे मंदिर बनाया और किश्ती-घाटवाला दरिया बनाया; और अब उसे राजा ने वहाँ जाने कहाँ जाने और वह-जाने-क्या लाने का हुक्म देकर भेजा है—यह सब उसने बता दिया।

    सुनकर दादी का रोना रुक गया। मन में बोली, अब मेरे संकट कटने का वक़्त आया है। प्रकट में इमेल्यान से कहा, अच्छा बेटा, बैठो कुछ खा-पी लो।

    खिला-पिलाकर दादी ने बताया कि देखो, यह सूत का पिंड है, इसे लो और सामने लुढ़का दो। इसके सूत के पीछे-पीछे तुम चलते जाना। चलते-चलते समंदर तक पहुँच जाओगे। वहाँ एक बड़ा शहर दीखेगा। उसमें चले जाना। शहर के पास आख़िरी मकान पर एक रात ठहरने को जगह माँगना। वहाँ आँख खोलकर रहना। तब तुम्हारी चीज़ मिल जाएगी।

    इमेल्यान ने कहा, दादी, मैं पहचानूँगा कैसे कि यही वह चीज़ है? बुढ़िया ने कहा, जब तुम ऐसी चीज़ देखो जिसकी लोग माँ-बाप से भी ज़्यादा सुनें, समझ लेना वही है। उसी को राजा के पास ले जाना। तब राजा कहेगा, यह वह चीज़ नहीं है। तुम कहना, यह वह नहीं है तो लाओ मैं उसे तोड़े देता हूँ, और तब तुम उसे धमाधम पीटने लगना। पीटते-पीटते नदी तक ले जाना और टुकड़े-टुकड़े करके उसे नदी में फेंक देना। तब तुम्हारी स्त्री तुम्हें वापस मिल जाएगी और मेरे आँसू पुछ जाएँगे।

    इमेल्यान ने दादी को प्रणाम करके विदा ली और सूत के गोले के पीछे-पीछे चला। गोला लुढ़कता और खुलता हुआ आख़िर समंदर के किनारे तक पहुँच गया। वहाँ एक बड़ा शहर था और उसके दूसरे सिरे पर एक बड़ा मकान। इमेल्यान ने रात को ठहरने के लिए वहाँ जगह माँगी और मिल गई।

    सबेरे उसने सुना कि घर में बाप लड़के को जगा रहा है कि भैया, उठ कर जाओ, जंगल से कुछ लकड़ी काट लाओ। लेकिन लड़के ने सुना-अनसुना करके कहा, अभी बहुतेरा वक़्त है। ऐसी जल्दी अभी क्या है?

    माँ ने कहा, उठो, बेटा जाओ। तुम्हारे पिताजी के बदन की हड्डी दुखती है। तुम नहीं जाओगे तो उन्हें जाना पड़ेगा। बेटा, दिन बहुत निकल आया है।

    पर लड़के ने कुछ बहाना बना दिया और करवट लेकर फिर सो गया। इमेल्यान ने यह सब सुना।

    तभी एकाएक बाहर सड़क पर किसी चीज़ की ज़ोर की आवाज़ होनी शुरू हुईं। और देखता क्या है कि वह आवाज़ सुनते ही लड़का फ़ौरन उछलकर उठा और चट कपड़े पहन घर से निकल भागा। इमेल्यान भी कूदकर देखने पीछे लपका कि क्या चीज़ है जिसका हुक्म लड़का माँ-बाप से ज़्यादा मानता है। देखता क्या है कि सड़क पर एक आदमी पेट के आगे बाँधे एक चीज़ लिए जा रहा है, जिसे वह दोनों तरफ़ दो कमचियों से पीट रहा है। वही चीज़ थी जो इस ज़ोर से गूँज रही थी और जिसकी आवाज़ पर लड़का घर से भाग आया था। वह चीज़ गोल थी। दोनों सिरों पर खाल मढ़ी थी। पूछा, कि इसका क्या नाम है?

    लोगों ने बताया, ढोल।

    क्या यह अंदर खोखला है?

    हाँ, अंदर यह खोखला है।

    इमेल्यान ताज्जुब में रह गया। उसने कहा, यह हमें दे दो। पर देनेवाले ने नहीं दिया। इस पर इमेल्यान ढोलवाले के पीछे-पीछे हो लिया। सारे दिन साथ लगा रहा। आख़िर जब ढोलवाला सोया, तब ढोल उठाकर इमेल्यान भाग आया।

    भागा-भाग, भागा-भाग, आया अपनी बस्ती में। पहले तो बीबी को देखने पहुँचा घर। पर वह वहाँ नहीं थी, इमेल्यान के जाने के अगले दिन उसे राजा के लोग ले गए थे। इस पर इमेल्यान महल की ड्योढ़ी पर पहुँचा और ख़बर भिजवाई कि इमेल्यान लौट आया है जो वहाँ गया था कि जाने—कहाँ और वह ले आया है कि जाने—क्या।

    सुनकर राजा ने हुक्म दिया कि कह दो अगले दिन आए।

    इस पर इमेल्यान ने कहलवाया, मैं वह चीज़ लेकर आया हूँ जो राजा ने चाही थी। राजा मेरे पास उसे लेने नहीं सकते तो मैं ही उनके पास आता हूँ।

    इस पर राजा बाहर आए। उन्होंने पूछा, अच्छा, तुम कहाँ गए थे?

    इमेल्यान ने ठीक-ठीक बता दिया।

    राजा ने कहा, वह असली जगह नहीं है। अच्छा, लाए क्या?

    इमेल्यान ने ढोल दिखा दिया। लेकिन राजा ने उसे देखा भी नहीं। कहा, यह वह चीज़ नहीं है।

    इमेल्यान ने कहा, अगर यह वह चीज नहीं है तो मैं इसे पीटकर तोड़े देता हूँ। फिर देखा जाएगा।

    यह कहकर इमेल्यान ढोल पीटता हुआ महल से बाहर निकल आया। ढोल का पिटना था कि पीछे-पीछे राजा की फ़ौज निकल आई और इमेल्यान को सलाम करके उसके हुक्म के इंतज़ार में खड़ी हो गई।

    राजा ने अपनी खिड़की में से यह देखा तो अपनी फ़ौज को चिल्ला-चिल्लाकर कहा कि इमेल्यान के पीछे मत जाओ। पर किसी ने कुछ नहीं सुना और सब ढोल के पीछे चल पड़े।

    राजा ने जब यह देखा तब हुक्म दिया कि इमेल्यान की बीबी उसको दे दो और वापस वह ढोल माँगा।

    पर इमेल्यान ने कहा, यह नहीं हो सकता। इसको तोड़कर मुझे नदी में फेंक देना है।

    यह कहकर इमेल्यान ढोल पीटता हुआ नदी की तरफ़ बढ़ गया। सिपाही सब उसके पीछे थे। नदी पहुँचकर ढोल के टुकड़े-टुकड़े करके इमेल्यान ने नदी की धार में फेंक दिया। और सिपाही सब अपने-अपने घर भाग गए।

    तब इमेल्यान अपनी बीबी को साथ लेकर अपने घर पहुँच गया। उसके बाद राजा ने उन्हें नहीं सताया और वे सुख से रहने लगे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : लियो टॉल्सटॉय प्रतिनिधि रचनाएँ भाग-3 (पृष्ठ 135)
    • संपादक : कृष्णदत्त पालीवाल
    • रचनाकार : लियो टॉल्सटॉय
    • प्रकाशन : सस्ता साहित्य मंडल प्रकाशन
    • संस्करण : 2019

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