लियो टॉल्स्टॉय की कहानियाँ
दो साथी
एक एक बार की बात है कि दो बूढ़े आदमी थे। उन्हें परम तीर्थ-धाम येरुशलम के यात्रा-दर्शन की चाह हुई। उनमें एक का नाम था एफिम शुएव। यह एक ख़ासा ख़ुशहाल काश्तकार था। दूसरे का नाम था एलीशा। एलीशा की हालत उतनी अच्छी न थी। एफिम आदमी औसत तरीक़े का था। संजीदा,
सूरत की बात
हिंदुस्तान के सूरत शहर में एक अतिथिशाला थी। उसी की बात है। सूरत शहर उन दिनों बढ़ा-चढ़ा बंदरगाह था और दुनियाभर से देश-विदेश के यात्री वहाँ आया करते और उस अतिथिशाला में मिला करते थे। एक दिन एक फ़ारसी आलिम वहाँ आए। उन्होंने ईश-तत्त्व पर मनन-चिंतन करने
धर्मपुत्र
एक एक दिन किसान के घर एक बालक जनमा। उसने अपने भाग्य सराहे और बड़ा कृतार्थ हुआ। ख़ुश-ख़ुश एक पड़ोसी के घर गया कि आप इस बालक के धर्म-पिता बन जाएँ। पर ग़रीब के बेटे को कौन अपनाए! सो पड़ोसी ने इनकार कर दिया। तब दूसरे पड़ोसी से कहा, उसने भी इनकार कर दिया।
जीवन-मूल
एक एक रैदास-मोची अपने स्त्री-बच्चों के साथ एक किसान की झोंपड़ी में रहा करता था। नाम था ननकू। उसके पास अपनी ज़मीन नहीं थी, न घर। रोज़ जूते गाठकर रोज़ी चलाता था। पर काम का भाव सस्ता था और अनाज का महँगा। सो जो कमाता था, खाना जुटाने में ख़र्च हो जाता।
खोखला ढोल
इमेल्यान नाम का एक मज़दूर एक दिन अपने मालिक के काम पर जा रहा था। जाते-जाते एक खेती की मेड़ पर कहीं से मेंढ़क फुदककर उसके सामने आ गया। मेंढ़क इमेल्यान के पैर से कुचल ही गया था कि वह तो इमेल्यान की तरक़ीब से बच गया। इतने में ही सुना कि पीछे से कोई नाम