हिंदी के साहित्यिक क्षेत्र में आचार्य पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी का व्यक्तित्व महान् व्यक्तित्व है। नई हिंदी के निर्माण में भारतेंदु हरिश्चंद्र के बाद द्विवेदी जी का नाम बिना किसी पसोपेश के लिया जा सकता है। आज-कल के किसी भी प्रसिद्ध हिंदी-कवि या लेखक की जीवनी देखिए तो आपको उसके साहित्यिक विकास में श्री द्विवेदी जी का हाथ निश्चय ही दिखेगा। स्वर्गीय गणेशशंकर विद्याथों ठीक ही कहते थे कि वे केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि साहित्यकारों के निर्माता भी है। इसका अनुभव मुझे भी है। लगभग दस साल हुए, उन्होंने बिना किसी पूर्वपरिचय के मेरे यहाँ पधारने की कृपा की और मेरी रामायणी व्याख्यायों के विषय में वे शिक्षाएँ दी जिनका उल्लेख मैंने 'कल्याण' में प्रकाशित अपनी लेख-माला के प्रारंभ में किया है। उनके तीन उत्साहमद कृपा-पत्रों को अपनी जान से भी बढ़कर समझते हुए सुरक्षित किए हुए हैं, जिन्हें मैं अपनी विश्व विद्यालयवाली डिग्रियों से भी अधिक आदर की दृष्टि से देखता है। वस्तुतः आचार्य का गुण ही यह है कि वह औरों को भी साहित्यकार बना सके। पर समय की प्रगति देखिए कि अभी हाल में हिंदू-विश्वविद्यालय तथा प्रयाग विश्वविद्यालय ने 'डॉक्टर' की डिग्रियाँ बड़ी उदारता एवं प्रचुरता से बाँटी, पर आचार्य जैसे सबसे बड़े अधिकारी को किसी ने पूछा! सच पूछिए तो ऐसे महान व्यक्ति को 'डॉक्टर' बनाना स्वयं विश्व-विद्यालय की महत्ता का हेतु हो सकता है। यों तो आचार्य जी के विचार विचित्र है। कई वर्ष हुए, मैंने इस बारे में एक लेख लिखा था।
जब वे मेरे यहाँ पधारे तब कहा कि मुझे तुम्हारा लेख देखकर दुख हुआ। यह आंग्ल शिक्षा का प्रभाव है कि तुम भी 'डॉक्टर' को 'आचार्य' से बेहतर समझते हो। भई! मेरी राय में तो मेरी साहित्य-सेवा के बदले में जो उपाधि तुम जैसे साहित्यकारों ने मुझे दे डाली है यह विश्वविद्यालयों की बनावटी डिग्रियों से अधिक प्रिय है।
जभी से यह इरादा था कि में आचार्य जी के आश्रम (दौलतपुर, ज़िला रायबरेली) में स्वयं जाकर मुलाक़ात की वापसी का नैतिक कर्तव्य पूरा करूँ। पर हूँ गृहस्थी के तेली का बैल, जो अपने कोल्हू के गिर्द ही घूमता रहता है। फिर बीमारी से और भी मजबूर कर दिया। तीन वर्ष हुए कि एक बार तो सब लोग मेरी ज़िंदगी से ही निराश हो बैठे थे। अब स्वास्थ्य की दशा न कहने योग्य है—न सर्दी की बर्दाश्त, न गर्मी की। अस्तु, मामला टलता ही रहा। हाल में मेरे सहकारी श्री इक़बाल वर्मा 'सेहर' के आग्रह पर में इस साहित्यिक तीर्थ-यात्रा के लिए तैयार हो गया। पर शुभ कार्य में बाधा भी होती है। दो-चार दिन पहले से 'सेहर' जी की कमर और पैर में दर्द पैदा हो गया और हमारी आशाओं पर फिर पानी फिरता हुआ दिखाई दिया। पर सेहर जी हिम्मत न हारे और वैसी दशा में भी तैयार हो गए। हम लोग 15 अप्रैल 38 को 4 ½ बजे सुबह फ़तेहपुर से इक्के पर चल दिए।
वह समय बड़ा सुहावना था। चार-पाँच कोस तक उसका आनंद उठाते और वसंत ऋतु की बढ़िया हवा खाते एक निमग्नता की-सी दशा में हम लोग चले गए। मेरे मस्तिष्क में वे विचार आ रहे थे जिन्होंने वैदिक ऋषियों को उषा की प्रशंसा में तल्लीन कर दिया था। एक सुंदर कुमारी लाल ओढ़नी ओढ़े पूर्वी क्षितिज में अपनी सौंदर्य-छटा छिटका रही थी। आगे बढ़कर जब ग्रैंडट्रंक रोड छोड़ी तब यह भूल गए। कुछ चक्कर काटते हुए लहँगी मौज़ा (जहाँ घाट से गंगा पार करनी पड़ती है) के क़रीब पहुँचे तब एक भलेमानस ने ठीक राह बताई। हमने किसी तरह वहाँ पहुँचकर ठाकुर चंद्रराल सिंह मुख़्तार के घर पर इक्का खड़ा किया। उनके पक्के और सुडौल कमरे पर कांग्रेस का तिरंगा झंडा लहराता हुआ बहुत भला लगता था। अतिथी-सरकार की पुरानी बात यहाँ अब भी मौजूद थी। इक्का नहीं छोड़ा और हम लोग गंगा-पार जाने को रवाना हो गए। पहले एक सोता मिला, जो किसी छोटी नदी से कम न था—जाँघों के ऊपर तक पानी और किसी डोंगी का पता नहीं। ठाकुर साहब के चचा राह दिखाने को साथ थे। हमने डोंगी की बात कही तब हँसकर बोले—बाबू जी, हम गँवार आदमी हैं सही, पर दुनिया में पहले चार तरह के लोग थे। एक जोड़ा ईमान अली और बरकत अली का जो सगे भाई थे। दूसरा वैसा ही जोड़ा बेईमान अली और मतलब अली का। पहले ईमान अली का स्वर्गवास हुआ और उनके रहने पर बरकत अली भी चल बसे। अब बाक़ी दोनों रह गए हैं। घाट के ठेकेदार को अपने मतलब से मतलब। मुसाफ़िरों को तकलीफ़ हो या आराम। अस्तु किसी प्रकार 2 ½ मील रेत और कटरी चलकर घाट पर पहुँचे। वहाँ एक मल्लाह और एक नाव थी। न निख़नामे की तख़्ती, न मुसाफ़िरों के आराम की जगह! पार होते-होते धूप बढ़ गई। किनारे की एक कुरिया में जाना चाहा तथ फेक्ट ने मना किया कि यहाँ पशु बाँचे जाते हैं। इसने तपती हुई धूप में नाव पर ही बैठ कर खाना खाया। वहाँ कोई ज़िम्मेवार आदमी न था, अतः उतराई भी दूनी ली गई और कष्ट भी हुआ। हम फिर चल पड़े। दुपहर होती जा रही थी और अभी ढाई-तीन मील चलकर दौलतपुर पहुँचना था। बेचारे सेहर जी की पीड़ा की तकलीफ़ और शिकायत अलग थी। मेरा उत्तर था कि भई, यदि तीर्थ-यात्रा में कष्ट न हो तो फिर लुत्फ़ ही क्या? वही कष्ट तो हमारे भावों का परीक्षक है!
हम 12 बजते-बजते द्विवेदी जी के घर पर पहुँचे। बाहर नीम की घनी छाया थी। मुझे तो ऐसा जान पड़ा कि किसी वानप्रस्थी के आश्रम में आ गए हैं। दो मकान बराबर-बराबर थे। ईंटें लाल रंगी हुई और उनके गिर्द सफ़ेद टीप थी। मुझे तो पुरानी चित्रकारी का मज़ा आ गया, जिसमें ईंटें सुंदरता से पृथक-पृथक् दिखाई जाती थीं। सफ़ाई ऐसी थी कि कहीं तिनके का पता नहीं था। लाइब्रेरी में 10 अलमारियाँ पुस्तकों से ठसाठस भरी हुई थी, परंतु गर्द-ग़ुबार से साफ़ और तरतीब से चुनी हुई थीं। एक अँग्रेज़ का कथन याद आ गया कि कवि या लेखक का पहले अपना ही जीवन सुखंगठित करना चाहिए। अंदर जाकर प्रणाम किया और चरण हुए। वयोवृद्ध आचार्य ने उठकर प्रेम और प्रसन्नता से पीठ पर हाथ फेरा। इसमें यात्रा के सारे कष्ट भूल गए।
उनकी हास्यप्रियता बराबर बनी हुई है। खाने का सवाल हुआ और जब हमने कहा कि खाना ती गंगास्नान कर वहीं खा चुके हैं तब हँसकर बोले कि क्या फ़कीर की मेहमानदारी पर भरोसा न था। अच्छा यह बताओ कि हमारे लिए भी बचाया कि सब खा गए। मेरा उत्तर था कि देवता के नैवेध का सामान अलग है। द्विवेदी जी फिर हँसे और हमसे बग़लवाले मेहमान-घर में जाकर आराम करने के कहा। इस घर की सफ़ाई और सादगी ने भी मुझ-से बे-परवा और बे-तरतीब आदमी को मोहित कर लिया, पर सेहर जी तो यही कह रहे थे कि मैं भी अपने हथगाँव (ज़िला फ़तेहपुर) के घर के उपरी हिस्से पर जहाँ मैं रहता हूँ, प्रायः ऐसी ही सफ़ाई और तरतीब रखने की कोशिश करता हूँ। मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया कि आख़िर तुम भी तो कवि हो। अस्तु, हम इतना थक गए थे कि शीघ्र ही से गए और पाँच बजे शाम से पहले न उठ सके।
उठकर आए तब द्विवेदी की कमरे में गाँव की सरकारी पंचायत हो रही थी। द्विवेदी जी सरपंच है। केई मामला पेश था। हमें दिलचस्पी न थी, अतः अलग बैठे देखते रहे। मैं सोच रहा था कि जीवन का आदर्श यहाँ भी वही है जो शेक्सपियर का था कि जब साहित्यिक जीवन से अवकाश मिला तब अपने छोटे से गाँव की ही शरण ली और उसी की सेवा करना अपना फ़र्ज़ समझा। इतने में पंचायत ख़त्म हुई। लोग जाने लगे। एक साधारण देहाती से द्विवेदी जी को यह कहते सुना कि भई, तुम आज मुझसे नाराज़ तो नहीं हो गए? बड़े-छोटे का कृत्रिम विभाग तो वहाँ जान ही न पड़ता था। इन्हीं विचारों के सन्नाटे में मैंने द्विवेदी जी को मुबारक़बाद दी कि आप धन्य है जो इस 76 वर्ष की आयु में भी अपने ग्राम-सुधार के काम में इतनी दिलचसी लेते हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि हाँ भई, यहाँ स्कूल और डाक घर खुलवाया। औषधालय भी है और पंचायत और मवेशीख़ाना भी। पर जानते हो कि इन सेवाओं के बदले मुझे क्या उपनाम मिला है। मैंने कहा कि आपके सभी प्रशंसक ही होंगे और शायद मेरे मुँह से ‘ग्रामसेवक’ शब्द निकलना चाहता था कि वे बोल उठे—भई! देहाती ज़िंदगी उतनी साफ़-सुथरी नहीं है जितना तुम शहरवाले समझते हो। यहाँ ईर्ष्या और पार्टी बंद का बाज़ार गर्म है। मुझे जो उपनाम मिला है वह है ‘दुबौना...’। आह! मेरा वह सब ख़याल ख़्वाब हो गया और मनुष्य अपनी सारी स्वार्थपरता लिए हुए सामने आ गया। बर्नार्ड शा की बात याद आई कि इस समय आज़ादी के मानी यह है कि हम तो जो चाहें वह करें, पर औरों को आज़ादी न हो। द्विवेदी जी ने कहा—भई, पंचायत से अब किसी को वैसे अत्याचार का मौक़ा नहीं मिलता और मवेशीख़ाने से औरों के खेत चरा लेने की आज़ादी कहाँ? मैंने हँसकर कहा कि द्विवेदी जी, पहले लोगों ने ईर्ष्या से ही हरिश्चंद्र को ‘भारतेंदु’ कहना शुरू किया था। वे बोले—नहीं भई, यह गाड़ी कमाई है। इसे कैसे खोऊँगा? लमगोड़ा जी, जो काम करता हूँ, इच्छा यही रहती है कि संपूर्ण हो। वकील की मदद तो मिलती नहीं, क्योंकि पंचायत-क़ानून में वकील की इजाज़त ही नहीं है। परंतु देखिए मेरी अलमारी में फ़ौजदारी और दीवानी की पुस्तकें मौजूद हैं। यहाँ छोटे-मोटे मुख़्तारों को इजाज़त होती तो अच्छा था। मैंने हँसकर कहा—द्विवेदी जी, काटजू साहब तो ख़ुद वकील होकर वकीलों हस्ती ही मिटा देना चाहतें हैं। उत्तर मिला—यह ग़लती है।
द्विवेदी जी के घर के सामने एक सुंदर तिदरी है, जिस पर बेल-बूटे बने हुए हैं। कुछ संस्कृत-श्लोक भी लिखे हैं। उन्होंने कहा—वह देखो मेरा ख़ब्त! अपनी स्त्री कस स्मारक में ग़रीबी का इतना पैसा ख़र्च कर दिया। एक ओर सरस्वती, दूसरी ओर लक्ष्मी और बीच में धर्मपत्नी जी की मूर्ति है। लक्ष्मी का उपासक मैं कभी नहीं था। 200 मासिक से अधिक की नौकरी छोड़कर 23 मासिक पर ‘सरस्वती’ के संपादक होना स्वीकार किया। धर्मपत्नी को ऐसा दुःख हुआ था कि दो दिन खाना न खाया कहा। हाँ, मैंने सरस्वती की आराधना अवश्य की भई, यह ख़ब्त है। तुमने मुझसा ख़ब्ती और कहीं देखा है? मेरी आँखों में आँसू आ गए। मैंने कहा—आचार्य वर, शाहजहाँ भी ऐसा ही ख़ब्ती था। उसने मृत्यु पर प्रेम को विजयी बनाने के लिए ही ‘ताजमहल’ की तैयारी में कितना रुपया लगा दिया। द्विवेदी भी हँस दिए और बोले—एक बात और देखी है कि हातेवाले जँगले में ताला क्यों पड़ा है। मैंने प्रश्नात्मक दृष्टि डाली। वे बोले—आह, दुनिया मुहब्बत की क़द्र क्या जाने? लोगों ने यह कहना शुरू किया कि 'दुबौना' अपनी स्त्री को देवी बनाकर पुजना चाहता है। इसीलिए मैंने ताला डाल रखा है। मैं सोचने लगा कि संसार की दृष्टि कितनी संकीर्ण है, पर साथ ही इस शुद्ध सुंदरता के उपासक के दिल का नक़्शा भी सामने आ गया। आचार्य जी की 42 वर्ष की आयु में धर्मपत्नी का स्वर्गवास हुआ था। अब वह आयु 75-76 वर्ष है। मानो बीच के सारे वर्ष इसी प्रेम-निर्वाह के भावों पर निछावर कर दिए गए। मुझे तो हर तरफ़ आचार्य जी की साहित्यिक सरलता की ही छटा देख पड़ी, जो प्रेम एवं सौंदर्य के प्रभावों से परिपूर्ण थी। कृत्रिमता का कहीं लेश नहीं था।
सेहर जी ने अपनी नई पुस्तक 'रुबाइयात-ख़ैयाम' के पद्यबद्ध अनुवाद की एक प्रति आचार्य जी को भेंट की थी। कहते थे कि बच्चों को यह पुस्तक बहुत पसंद आई। छपाई आदि तो इंडियन-प्रेस की विशेषता भी अच्छा है। अनुवाद भी अच्छा है। फ़ारसी-कवि के भावों को बड़ी सादगी और सफ़ाई से पेश किया है।
मेरे रामायणी लेखों के बारे में उन्हें यह सुनकर आश्चर्य हुआ कि उन्हें पुस्तकरूप में छापने का कोई प्रकाशक तैयार नहीं, और हिंदी मासिक भी खोज-संबंधी लेखों को छापने से प्रायः हिचकते हैं। बोले—हिंदी ने ऐसे लेखों का आदर करना अभी नहीं सीखा। वहाँ ग्राहक की अधिक चिंता है। परंतु यदि हिंदी मासिक 5 प्रतिशत पृष्ठ भी ऐसे लेखों के लिए अलग नहीं करेंगे तो साहित्यिक खोज का क्या हाल होगा?
हमें यह सुनकर बड़ा ताज्जुब हुआ कि आचार्य जी 'हिंदुस्तानी एकाडमी' के सदस्य नहीं है। पूछने पर कहा—भई, कॉन्फ़्रेंस का हाल 'लीडर' में पढ़ लेता हूँ। मुझे तो बुलावा भी नहीं आता। यहाँ तो पड़ों की पूँछ है। मैं कोई 'डॉक्टर' थोड़ा हूँ। मैं तो हूँ हिंदी का एक ग्रामीण सेवक और वह है 'एकाडमी'!
द्विवेदी जी का स्वास्थ्य ठीक नहीं। नींद न आने को बड़ी शिकायत है। शाम से ही सो जाने की कोशिश करते हैं। उस दिन भी वे 8 बजे रात के क़रीब हम लोगों से क्षमा-प्रार्थना कर भीतर चले गए। तब उनके भानजे पंडित कमलाकिशोर त्रिपाठी से बातें होने लगीं। यही द्विवेदी जी के अकेले वारिस हैं—नवयुवक, सुंदर, सरल और सुशील। उनके अतिथि सत्कार का क्या कहना? हर काम को नौकर से पहले करना चाहते थे। 'होमियों पैथी? से जनता की सेवा करते रहते हैं, जिसमें उन्हें दिन-रात का ख़याल नहीं रहता।
हम लोग दूसरे ही दिन सवेरे बैलगाड़ी से वापस हुए। फिर वही वसंतऋतु का मनोमोहक दृश्य था और वही सुगंधित वायु के शीतल झकोरे। मैं गुनगुना रहा था—
पंछी बोलन लगे राह चलन लागी राम-नाम की बेरा,
सबेरे उठो!
बैल चढ़े भोला डमरू बजावैं आगे गौरादेई का डोला,
सवेरे उठो!
गंगा की कटरी आ गई। वहाँ गाड़ी की कोई राह तक नहीं। झाऊ की झाड़ियों में ऊँची-नीची ज़मीन को पार करते और घट के ठेकेदार को कोसते चले जाते थे। यदि कुछ झाऊ काट डाली जाती तो क्या सौ-दो सौ का ख़र्च था? फिर गाड़ियों की लीक आप ही बन जाती। लौटते समय भी घाट पर कोई ज़िम्मेवार आदमी न था, जिससे कुछ कहा जाता। घाट और रास्ता कुछ बेहतर हो सकता है और होना चाहिए, क्योंकि आचार्य जी के दर्शनार्थ बहुधा बड़े-बड़े कवि और लेखक इधर आया ही करते हैं और यही मुक़ाम यानी लहँगी-घाट दौलतपुर के सबसे ज़्यादा नज़दीक है। अभी कुछ ही दिन पूर्व थी मैथिलीशरण गुप्त और पंडित दुलारेलाल भार्गव वहाँ गए थे।
वापसी में ठाकुर चंद्रपालसिंह मुख़्तार के पिता दास जी ने खाने का सामान कर रखा था। हम लोग घाट किनारे ही नहाकर द्विवेदी जी के घर का 'प्रसाद' खाने गए थे । पर ठाकुर साहब किसी तरह न माने। उन्होंने घर के घी की बनी हुई गर्म पूरियाँ और घर के शुद्ध देसी घी में वह मज़ा आया कि जी तृप्त हो गया। लौटते हुए लोग कल्यानपुर होकर आए, जो गैंड-ट्रंक रोड लहँगी-घाट से 2 मील पर है और जहाँ से कंसपुर-गुगौली ई. आई. आर. लगभग मील भर होगा। धूप बड़ी तेज़ हो गई थी। राह में एक बरौरा नामक गाँव है, जहाँ सड़क के किनारे कुएँ पर एक जनेउधारी महाशय पानी खींच रहे थे। सेहर जी ने जाकर पानी पिला देने को कहा। पर ये 'हम पानी नहीं दे सकते' कहकर तर्पण में लग गए। यह देखकर दुःख हुआ कि वे गर्मी में एक प्यासे मनुष्य को पानी पिलाने की अपेक्षा एक अदृश्य अस्तित्व के तर्पण में पानी लुढ़काना अधिक आवश्यक समझते थे! परंतु उसी समय कुएँ पर खड़े हुए एक दूसरे ग़रीब देहाती ने अपना भरा हुआ डोल आगे बढ़ा दिया। हम लोगों ने पानी पिया और यह सोचते हुए चल दिए कि देवता के निकट वह तर्पण अधिक स्वीकृत होने योग्य था या वह मानवोचित कार्य जिसने दो तृप्त मनुष्यों से तृप्ति और शांति दी। स्मरण रहे कि मैं स्वयं सनातनधर्मी हूँ और दैनिक तर्पण करने का आदी।
hindi ke sahityik kshetr mein acharya panDit mahaviraprsad dvivedi ka vyaktitv mahan vyaktitv hai. nai hindi ke nirman mein bhartendu harishchandr ke baad dvivedi ji ka naam bina kisi pasopesh ke liya ja sakta hai. aaj kal ke kisi bhi prasiddh hindi kavi ya lekhak ki jivani dekhiye to aapko uske sahityik vikas mein shri dvivedi ji ka haath nishchay hi dikhega. svargiy ganeshshankar vidyathon theek hi kahte the ki ve keval sahityakar nahin, balki sahitykaron ke nirmata bhi hai. iska anubhav mujhe bhi hai. lagbhag das saal hue, unhonne bina kisi purvansarichay ke mere yahan padharne ki kripa ki aur meri ramayni vyakhyayon ke vishay mein ve shikshayen di jinka ullekh mainne kalyan mein prakashit apni lekh mala ke prarambh mein kiya hai. unke teen utsahmad kripa patron ko apni jaan se bhi baDhkar samajhte hue surakshit kiye hue hain, jinhen main apni vishv vidyalayvali Digriyon se bhi adhik aadar ki drishti se dekhta hai. vastutः acharya ka gun hi ye hai ki wo auron ko bhi sahityakar bana sake. par samay ki pragti dekhiye ki abhi haal mein hindu vishvavidyalay tatha prayag vishvavidyalay ne Dauktar ki Digriyan baDi udarta evan prachurta se banti, par acharya jaise sabse baDe adhikari ko kisi ne na puchha! sach puchhiye to aise mahan vyakti ko Dauktar banana svayan vishv vidyalay ki mahatta ka hetu ho sakta hai. yon to acharya ji ke vichar vichitr hai. kai varsh hue, mainne is bare mein ek lekh likha tha.
jab ve mere yahan padhare tab kaha ki mujhe tumhara lekh dekhkar dukh hua. ye angl shiksha ka prabhav hai ki tum bhi Dauktar ko acharya se behtar samajhte ho. bhai! meri raay mein to meri sahitya seva ke badle mein jo upadhi tum jaise sahitykaron ne mujhe de Dali hai ye vishvvidyalyon ki banavati Digriyon se adhik priy hai.
jabhi se ye irada tha ki mein acharya ji ke ashram (daulatpur, jila rayabreli) mein svayan jakar mulaqat ki vapsi ka naitik kartavya pura karun. par hoon grihasthi ke teli ka bail, jo apne kolhu ke gird hi ghumta rahta hai. phir bimari se aur bhi majbur kar diya. teen varsh hue ki ek baar to sab log meri zindagi se hi nirash ho baithe the. ab svasthya ki dasha na kahne yogya hai—na sardi ki bardasht, na garmi ki. astu, mamla talta hi raha. haal mein mere sahkari shri iqbaal varma sehar ke agrah par mein is sahityik teerth yatra ke liye taiyar ho gaya. par shubh karya mein badha bhi hoti hai. do chaar din pahle se sehar ji ki kamar aur pair mein dard paida ho gaya aur hamari ashaon par phir pani phirta hua dikhai diya. par sehar ji himmat na hare aur vaisi dasha mein bhi taiyar ho ge. hum log 15 april 38 ko 4 ½ baje subah pha]tehpur se ikke par chal diye.
wo samay baDa suhavna tha. chaar paanch kos tak uska anand uthate aur vasantritu ki baDhiya hava khate ek nimagnta ki si dasha mein hum log chale ge. mere mastishk mein ve vichar aa rahe the jinhonne vaidik rishiyon ko usha ki prshansa mein tallin kar diya tha. ek sundar kumari laal oDhni oDhe purvi kshitij mein apni saundarya chhata chhitka rahi thi. aage baDhkar jab grainDatrank roD chhoDi tab ye bhool ge. kuch chakkar katte hue lahngi mauza (jahan ghaat se ganga paar karni paDti hai) ke qarib pahunche tab ek bhalemanas ne theek raah batai. hamne kisi tarah vahan pahunchakar thakur chandrral sinh mukhtar ke ghar par ikka khaDa kiya. unke pakke aur suDaul kamre par kangres ka tiranga jhanDa lahrata hua bahut bhala lagta tha. atithi sarkar ki purani baat yahan ab bhi maujud thi. ikka nahin chhoDa aur hum log ganga paar jane ko ravana ho ge. pahle ek sota mila, jo kisi chhoti nadi se kam na tha—janghon ke uupar tak pani aur kisi Dongi ka pata nahin. thakur sahab ke chacha raah dikhane ko saath the. hamne Dongi ki baat kahi tab hansakar bole—babu ji, hum ganvar adami hain sahi, par duniya mein pahle chaar tarah ke log the. ek joDa iiman ali aur barkat ali ka jo sage bhai the. dusra vaisa hi joDa beiman ali aur matlab ali ka. pahle iiman ali ka svargavas hua aur unke rahne par barkat ali bhi chal base. ab baqi donon rah ge hain. ghaat ke thekedar ko apne matlab se matlab. musafiron ko taklif ho ya aram. astu. kisi prakar 2 ½ meel ret aur katri chalkar ghaat par pahunche. vahan ek mallah aur ek naav thi. na nikhname ki takhti, na musafiron ke aram ki jagah! paar hote hote dhoop baDh gai. kinare ki ek kuriya mein jana chaha tath phekt ne mana kiya ki yahan pashu banche jate hain. imne tapti hui dhoop mein naav par hi baith kar khana khaya. vahan koi zimmevar adami na tha, atः utrai bhi duni li gai aur kasht bhi hua. hum phir chal paDe. dopahar hoti ja rahi thi aur abhi Dhai teen meel chalkar daulatpur pahunchna tha. bechare sehar ji ki piDa ki taklif aur shikayat alag thi. mera uttar tha ki bhai, yadi teerth yatra mein kasht na ho to phir lutf hi kyaa? vahi kasht to hamare bhavon ka parikshak hai!
hum 12 bajte bajte dvivedi ji ke ghar par pahunche. bahar neem ki ghani chhaya thi. mujhe to aisa jaan paDa ki kisi vanaprasthi ke ashram mein aa ge hain. do makan barabar barabar the. iiten laal rangi hui aur unke gird safed teep thi. mujhe to purani chitrkari ka maza aa gaya, jismen iten sundarta se prithak prithak dikhai jati theen. safai aisi thi ki kahin tinke ka pata nahin tha. laibreri mein 10 almariyan pustkon se thasathas bhari hui thi, parantu gard ghubar se saaf aur tartib se chuni hui theen. ek angrez ka kathan yaad aa gaya ki kavi ya lekhak ka pahle apna hi jivan sukhangthit karna chahiye. andar jakar prnaam kiya aur charan hue. vayovriddh acharya ne uthkar prem aur prasannata se peeth par haath phera. ismen yatra ke sare kasht bhool ge.
unki hasyapriyta barabar bani hui hai. khane ka saval hua aur jab hamne kaha ki khana ti gangasnan kar vahin kha chuke hain tab hansakar bole ki kya fakir ki mehmandari par bharosa na tha. achchha ye batao ki hamare liye bhi bachaya ki sab kha ge. mera uttar tha ki devta ke naivedh ka saman alag hai. dvivedi ji phir hanse aur hamse baghalvale mehman ghar mein jakar aram karne ke kaha. is ghar ki safai aur sadgi ne bhi mujh se be parva aur be tartib adami ko mohit kar liya, par sehar ji to yahi kah rahe the ki main bhi apne hathganv (zila fatehpur) ke ghar ke upri hisse par jahan main rahta hoon, praayः aisi hi safai aur tartib rakhne ki koshish karta hoon. mainne muskurate hue javab diya ki akhir tum bhi to kavi ho. astu, hum itna thak ge the ki sheeghr hi se ge aur paanch baje shaam se pahle na uth sake.
uthkar aaye tab dvivedi ki kamre mein gaanv ki sarkari panchayat ho rahi thi. dvivedi ji sarpanch hai. kei mamla pesh tha. hamein dilchaspi na thi, atः alag baithe dekhte rahe. main soch raha tha ki jivan ka adarsh yahan bhi vahi hai jo sheksapiyar ka tha ki jab sahityik jivan se avkash mila tab apne chhote se gaanv ki hi sharan li aur usi ki seva karna apna farz samjha. itne mein panchayat khatm hui. log jane lage. ek sadharan dehati se dvivedi ji ko ye kahte suna ki bhai, tum aaj mujhse naraz to nahin ho ge? baDe chhote ka kritim vibhag to vahan jaan hi na paDta tha. inhin vicharon ke sannate mein mainne dvivedi ji ko mubaraqbad di ki aap dhanya hai jo is 76 varsh ki aayu mein bhi apne gram sudhar ke kaam mein itni dilachsi lete hain. unhonne muskurate hue kaha ki haan bhai, yahan skool aur Daak ghar khulvaya. aushadhalay bhi hai aur panchayat aur maveshikhana bhi. par jante ho ki in sevaon ke badle mujhe kya upnaam mila hai. mainne kaha ki aapke sabhi prshansak do honge aur shayad mere munh se ‘gramasevak’ shabd nikalna chahta tha ki ve bol uthe—bhai! dehati zindagi utni saaf suthari nahin hai jitna tum shaharvale samajhte ho. yahan iirshya aur parti band ka bazar garm hai. mujhe jo upnaam mila hai wo hai ‘dubauna. . . ’. aah! mera wo sab khayal khvaab ho gaya aur manushya apni sari svarthaparta liye hue samne aa gaya. barnarD sha ki baat yaad aai ki is samay azadi ke mani ye hai ki hum to jo chahen wo karen, par auron ko azadi na ho. dvivedi ji ne kaha—bhai, panchayat se ab kisi ko vaise atyachar ka mauqa nahin milta aur maveshikhane se auron ke khet chara lene ki azadi kahan? mainne hansakar kaha ki dvivedi ji, pahle logon ne iirshya se hi harishchandr ko ‘bhartendu’ kahna shuru kiya tha. ve bole—nahin bhai, ye gaDi kamai hai. ise kaise khounga? lamgoDa ji, jo kaam karta hoon, ichchha yahi rahti hai ki sanmurn ho. vakil ki madad to milti nahin, kyonki panchayat qanun mein vakil ki ijazat hi nahin hai. parantu dekhiye meri almari mein faujadari aur divani ki pustken maujud hain. yahan chhote mote mukhtaron ko ijazat hoti to achchha tha. mainne hansakar kaha—dvivedi ji, katju sahab to khud vakil hokar vakilon hasti hi mita dena chahten hain. uttar mila—yah ghalati hai.
dvivedi ji ke ghar ke samne ek sundar tidri hai, jis par bel bute bane hue hain. kuch sanskrit shlok bhi likhe hain. unhonne kaha—vah dekho mera khabt! apni stri kas smarak mein gharibi ka itna paisa kharch kar diya. ek or sarasvati, dusri or lakshmi aur beech mein dharmpatni ji ki murti hai. lakshmi ka upasak main kabi nahin tha. 200) masik se adhik ki naukari chhoDkar 23) masik par ‘sarasvati’ ke sampadak hona svikar kiya. dharmpatni ko aisa duःkha hua tha ki do din khana na khaya kaha. haan, mainne sarasvati ki aradhana avashya ki bhai, ye khabt hai. tumne mujhsa khabti aur kahin dekha hai? meri ankhon mein ansu aa ge. mainne kaha—acharya var, shahajhan bhi aisa hi khabti tha. usne mrityu par prem ko vijyi banane ke liye hi ‘tajamhal’ ki taiyari mein kitna rupya laga diya. dvivedi bhi hans diye aur bole—ek baat aur dekhi hai ki hatevale jangale mein tala kyon paDa hai. mainne prashnatmak drishti Dali. ve bole—ah, duniya muhabbat ki qadr kya jane? logon ne ye kahna shuru kiya ki dubauna apni stri ko devi banakar pujana chahta hai. isiliye mainne tala Daal rakha hai. main sochne laga ki sansar ki drishti kitni sankirnan hai, par saath hi is shuddh sundarta ke upasak ke dil ka naqsha bhi samne aa gaya. acharya ji ki 42 varsh ki aayu mein dharmpatni ka svargavas hua tha. ab wo aayu 75 76 varsh hai. mano beech ke sare varsh isi prem nirvah ke bhavon par nichhavar kar diye ge. mujhe to har taraf acharya ji ki sahityik saralta ki hi chhata dekh paDi, jo prem evan saundarya ke prbhavon se paripurn thi. kritrimta ka kahin lesh nahin tha.
sehar ji ne apni nai pustak rubaiyat khaiyam ke padyabaddh anuvad ki ek prati acharya ji ko bhent ki thi. kahte the ki bachchon ko ye pustak bahut pasand aai. chhapai aadi to inDiyan pres ki visheshata bhi achchha hai. anuvad bhi achchha hai. farsi kavi ke bhavon ko baDi sadgi aur safai se pesh kiya hai.
mere ramayni lekhon ke bare mein unhen ye sunkar ashcharya hua ki unhen pustakrup mein chhapne ka koi prakashak taiyar nahin, aur hindi masik bhi khoj sambandhi lekhon ko chhapne se praayः hichakte hain. bole—hindi ne aise lekhon ka aadar karna abhi nahin sikha. vahan grahak ki adhik chinta hai. parantu yadi hindi masik 5 pratishat prishth bhi aise lekhon ke liye alag nahin karenge to sahityik khoj ka kya haal hoga?
hamein ye sunkar baDa tajjub hua ki acharya ji hindustani ekaDmi ke sadasya nahin hai. puchhne par kaha—bhai, kaunfrens ka haal liDar mein paDh leta hoon. mujhe to bulava bhi nahin aata. yahan to paDon ki poonchh hai. main koi Dauktar thoDa hoon. main to hoon hindi ka ek gramin sevak aur wo hai ekaDmi!
dvivedi ji ka svasthya theek nahin. neend na aane ko baDi shikayat hai. shaam se hi so jane ki koshish karte hain. us din bhi ve 8 baje raat ke qarib hum logon se kshama pararthna kar bhitar chale ge. tab unke bhanje panDit kamlakishor tripathi se baten hone lagin. yahi dvivedi ji ke akele varis hain—navyuvak, sundar, saral aur sushil. unke atithi satkar ka kya kahna? har kaam ko naukar se pahle karna chahte the. homiyon paithi? se janta ki seva karte rahte hain, jismen unhen din raat ka khayal nahin rahta.
hum log dusre hi din savere bailgaDi se vapas hue. phir vahi vasantritu ka manomohak drishya tha aur vahi sugandhit vayu ke shital jhakore. main gunguna raha tha—
panchhi bolan lage raah chalan lagi raam naam ki bera,
sabere utho!
bail chaDhe bhola Damru bajavain aage gauradei ka Dola,
savere utho!
ganga ki katri aa gai. vahan gaDi ki koi raah tak nahin. jhau ki jhaDiyon mein uunchi nichi zamin ko paar karte aur ghat ke thekedar ko koste chale jate the. yadi kuch jhau kaat Dali jati to kya sau do sau ka kharch tha? phir gaDiyon ki leek aap hi ban jati. lautte samay bhi ghaat par koi zimmevar adami na tha, jisse kuch kaha jata. ghaat aur rasta kuch behtar ho sakta hai aur hona chahiye, kyonki acharya ji ke darshanarth bahudha baDe baDe kavi aur lekhak idhar aaya hi karte hain aur yahi muqam yani lahngi ghaat daulatpur ke sabse zyada nazdik hai. abhi kuch hi din poorv thi maithilishran gupt aur panDit dularelal bhargav vahan ge the.
vapsi mein thakur chandrpalsinh mukhtar ke pita daas ji ne khane ka saman kar rakha tha. hum log ghaat kinare hi nahakar dvivedi ji ke ghar ka parsad khane ge the. par thakur sahab kisi tarah na mane. unhonne ghar ke ghi ki bani hui garm puriyan aur ghar ke shuddh desi ghi mein wo maza aaya ki ji tript ho gaya. lautte hue log kalyanpur hokar aaye, jo gainD trank roD lahngi ghaat se 2 meel par hai aur jahan se kanspur gugauli ii. aai. aar. lagbhag meel bhar hoga. dhoop baDi tez ho gai thi. raah mein ek baraura namak gaanv hai, jahan saDak ke kinare kuen par ek janeudhari mahashay pani kheench rahe the. sehar ji ne jakar pani pila dene ko kaha. par ye hum pani nahin de sakte kahkar tarpan mein lag ge. ye dekhkar duःkha hua ki ve garmi mein ek pyase manushya ko pani pilane ki apeksha ek adrishya astitv ke tarpan mein pani luDhkana adhik avashyak samajhte the! parantu usi samay kuen par khaDe hue ek dusre gharib dehati ne apna bhara hua Dol aage baDha diya. hum logon ne pani piya aur ye sochte hue chal diye ki devta ke nikat wo tarpan adhik svikrit hone yogya tha ya wo manavochit karya jisne do tript manushyon se tripti aur shanti di. smran rahe ki main svayan sanatandharmi hoon aur dainik tarpan karne ka aadi.
hindi ke sahityik kshetr mein acharya panDit mahaviraprsad dvivedi ka vyaktitv mahan vyaktitv hai. nai hindi ke nirman mein bhartendu harishchandr ke baad dvivedi ji ka naam bina kisi pasopesh ke liya ja sakta hai. aaj kal ke kisi bhi prasiddh hindi kavi ya lekhak ki jivani dekhiye to aapko uske sahityik vikas mein shri dvivedi ji ka haath nishchay hi dikhega. svargiy ganeshshankar vidyathon theek hi kahte the ki ve keval sahityakar nahin, balki sahitykaron ke nirmata bhi hai. iska anubhav mujhe bhi hai. lagbhag das saal hue, unhonne bina kisi purvansarichay ke mere yahan padharne ki kripa ki aur meri ramayni vyakhyayon ke vishay mein ve shikshayen di jinka ullekh mainne kalyan mein prakashit apni lekh mala ke prarambh mein kiya hai. unke teen utsahmad kripa patron ko apni jaan se bhi baDhkar samajhte hue surakshit kiye hue hain, jinhen main apni vishv vidyalayvali Digriyon se bhi adhik aadar ki drishti se dekhta hai. vastutः acharya ka gun hi ye hai ki wo auron ko bhi sahityakar bana sake. par samay ki pragti dekhiye ki abhi haal mein hindu vishvavidyalay tatha prayag vishvavidyalay ne Dauktar ki Digriyan baDi udarta evan prachurta se banti, par acharya jaise sabse baDe adhikari ko kisi ne na puchha! sach puchhiye to aise mahan vyakti ko Dauktar banana svayan vishv vidyalay ki mahatta ka hetu ho sakta hai. yon to acharya ji ke vichar vichitr hai. kai varsh hue, mainne is bare mein ek lekh likha tha.
jab ve mere yahan padhare tab kaha ki mujhe tumhara lekh dekhkar dukh hua. ye angl shiksha ka prabhav hai ki tum bhi Dauktar ko acharya se behtar samajhte ho. bhai! meri raay mein to meri sahitya seva ke badle mein jo upadhi tum jaise sahitykaron ne mujhe de Dali hai ye vishvvidyalyon ki banavati Digriyon se adhik priy hai.
jabhi se ye irada tha ki mein acharya ji ke ashram (daulatpur, jila rayabreli) mein svayan jakar mulaqat ki vapsi ka naitik kartavya pura karun. par hoon grihasthi ke teli ka bail, jo apne kolhu ke gird hi ghumta rahta hai. phir bimari se aur bhi majbur kar diya. teen varsh hue ki ek baar to sab log meri zindagi se hi nirash ho baithe the. ab svasthya ki dasha na kahne yogya hai—na sardi ki bardasht, na garmi ki. astu, mamla talta hi raha. haal mein mere sahkari shri iqbaal varma sehar ke agrah par mein is sahityik teerth yatra ke liye taiyar ho gaya. par shubh karya mein badha bhi hoti hai. do chaar din pahle se sehar ji ki kamar aur pair mein dard paida ho gaya aur hamari ashaon par phir pani phirta hua dikhai diya. par sehar ji himmat na hare aur vaisi dasha mein bhi taiyar ho ge. hum log 15 april 38 ko 4 ½ baje subah pha]tehpur se ikke par chal diye.
wo samay baDa suhavna tha. chaar paanch kos tak uska anand uthate aur vasantritu ki baDhiya hava khate ek nimagnta ki si dasha mein hum log chale ge. mere mastishk mein ve vichar aa rahe the jinhonne vaidik rishiyon ko usha ki prshansa mein tallin kar diya tha. ek sundar kumari laal oDhni oDhe purvi kshitij mein apni saundarya chhata chhitka rahi thi. aage baDhkar jab grainDatrank roD chhoDi tab ye bhool ge. kuch chakkar katte hue lahngi mauza (jahan ghaat se ganga paar karni paDti hai) ke qarib pahunche tab ek bhalemanas ne theek raah batai. hamne kisi tarah vahan pahunchakar thakur chandrral sinh mukhtar ke ghar par ikka khaDa kiya. unke pakke aur suDaul kamre par kangres ka tiranga jhanDa lahrata hua bahut bhala lagta tha. atithi sarkar ki purani baat yahan ab bhi maujud thi. ikka nahin chhoDa aur hum log ganga paar jane ko ravana ho ge. pahle ek sota mila, jo kisi chhoti nadi se kam na tha—janghon ke uupar tak pani aur kisi Dongi ka pata nahin. thakur sahab ke chacha raah dikhane ko saath the. hamne Dongi ki baat kahi tab hansakar bole—babu ji, hum ganvar adami hain sahi, par duniya mein pahle chaar tarah ke log the. ek joDa iiman ali aur barkat ali ka jo sage bhai the. dusra vaisa hi joDa beiman ali aur matlab ali ka. pahle iiman ali ka svargavas hua aur unke rahne par barkat ali bhi chal base. ab baqi donon rah ge hain. ghaat ke thekedar ko apne matlab se matlab. musafiron ko taklif ho ya aram. astu. kisi prakar 2 ½ meel ret aur katri chalkar ghaat par pahunche. vahan ek mallah aur ek naav thi. na nikhname ki takhti, na musafiron ke aram ki jagah! paar hote hote dhoop baDh gai. kinare ki ek kuriya mein jana chaha tath phekt ne mana kiya ki yahan pashu banche jate hain. imne tapti hui dhoop mein naav par hi baith kar khana khaya. vahan koi zimmevar adami na tha, atः utrai bhi duni li gai aur kasht bhi hua. hum phir chal paDe. dopahar hoti ja rahi thi aur abhi Dhai teen meel chalkar daulatpur pahunchna tha. bechare sehar ji ki piDa ki taklif aur shikayat alag thi. mera uttar tha ki bhai, yadi teerth yatra mein kasht na ho to phir lutf hi kyaa? vahi kasht to hamare bhavon ka parikshak hai!
hum 12 bajte bajte dvivedi ji ke ghar par pahunche. bahar neem ki ghani chhaya thi. mujhe to aisa jaan paDa ki kisi vanaprasthi ke ashram mein aa ge hain. do makan barabar barabar the. iiten laal rangi hui aur unke gird safed teep thi. mujhe to purani chitrkari ka maza aa gaya, jismen iten sundarta se prithak prithak dikhai jati theen. safai aisi thi ki kahin tinke ka pata nahin tha. laibreri mein 10 almariyan pustkon se thasathas bhari hui thi, parantu gard ghubar se saaf aur tartib se chuni hui theen. ek angrez ka kathan yaad aa gaya ki kavi ya lekhak ka pahle apna hi jivan sukhangthit karna chahiye. andar jakar prnaam kiya aur charan hue. vayovriddh acharya ne uthkar prem aur prasannata se peeth par haath phera. ismen yatra ke sare kasht bhool ge.
unki hasyapriyta barabar bani hui hai. khane ka saval hua aur jab hamne kaha ki khana ti gangasnan kar vahin kha chuke hain tab hansakar bole ki kya fakir ki mehmandari par bharosa na tha. achchha ye batao ki hamare liye bhi bachaya ki sab kha ge. mera uttar tha ki devta ke naivedh ka saman alag hai. dvivedi ji phir hanse aur hamse baghalvale mehman ghar mein jakar aram karne ke kaha. is ghar ki safai aur sadgi ne bhi mujh se be parva aur be tartib adami ko mohit kar liya, par sehar ji to yahi kah rahe the ki main bhi apne hathganv (zila fatehpur) ke ghar ke upri hisse par jahan main rahta hoon, praayः aisi hi safai aur tartib rakhne ki koshish karta hoon. mainne muskurate hue javab diya ki akhir tum bhi to kavi ho. astu, hum itna thak ge the ki sheeghr hi se ge aur paanch baje shaam se pahle na uth sake.
uthkar aaye tab dvivedi ki kamre mein gaanv ki sarkari panchayat ho rahi thi. dvivedi ji sarpanch hai. kei mamla pesh tha. hamein dilchaspi na thi, atः alag baithe dekhte rahe. main soch raha tha ki jivan ka adarsh yahan bhi vahi hai jo sheksapiyar ka tha ki jab sahityik jivan se avkash mila tab apne chhote se gaanv ki hi sharan li aur usi ki seva karna apna farz samjha. itne mein panchayat khatm hui. log jane lage. ek sadharan dehati se dvivedi ji ko ye kahte suna ki bhai, tum aaj mujhse naraz to nahin ho ge? baDe chhote ka kritim vibhag to vahan jaan hi na paDta tha. inhin vicharon ke sannate mein mainne dvivedi ji ko mubaraqbad di ki aap dhanya hai jo is 76 varsh ki aayu mein bhi apne gram sudhar ke kaam mein itni dilachsi lete hain. unhonne muskurate hue kaha ki haan bhai, yahan skool aur Daak ghar khulvaya. aushadhalay bhi hai aur panchayat aur maveshikhana bhi. par jante ho ki in sevaon ke badle mujhe kya upnaam mila hai. mainne kaha ki aapke sabhi prshansak do honge aur shayad mere munh se ‘gramasevak’ shabd nikalna chahta tha ki ve bol uthe—bhai! dehati zindagi utni saaf suthari nahin hai jitna tum shaharvale samajhte ho. yahan iirshya aur parti band ka bazar garm hai. mujhe jo upnaam mila hai wo hai ‘dubauna. . . ’. aah! mera wo sab khayal khvaab ho gaya aur manushya apni sari svarthaparta liye hue samne aa gaya. barnarD sha ki baat yaad aai ki is samay azadi ke mani ye hai ki hum to jo chahen wo karen, par auron ko azadi na ho. dvivedi ji ne kaha—bhai, panchayat se ab kisi ko vaise atyachar ka mauqa nahin milta aur maveshikhane se auron ke khet chara lene ki azadi kahan? mainne hansakar kaha ki dvivedi ji, pahle logon ne iirshya se hi harishchandr ko ‘bhartendu’ kahna shuru kiya tha. ve bole—nahin bhai, ye gaDi kamai hai. ise kaise khounga? lamgoDa ji, jo kaam karta hoon, ichchha yahi rahti hai ki sanmurn ho. vakil ki madad to milti nahin, kyonki panchayat qanun mein vakil ki ijazat hi nahin hai. parantu dekhiye meri almari mein faujadari aur divani ki pustken maujud hain. yahan chhote mote mukhtaron ko ijazat hoti to achchha tha. mainne hansakar kaha—dvivedi ji, katju sahab to khud vakil hokar vakilon hasti hi mita dena chahten hain. uttar mila—yah ghalati hai.
dvivedi ji ke ghar ke samne ek sundar tidri hai, jis par bel bute bane hue hain. kuch sanskrit shlok bhi likhe hain. unhonne kaha—vah dekho mera khabt! apni stri kas smarak mein gharibi ka itna paisa kharch kar diya. ek or sarasvati, dusri or lakshmi aur beech mein dharmpatni ji ki murti hai. lakshmi ka upasak main kabi nahin tha. 200) masik se adhik ki naukari chhoDkar 23) masik par ‘sarasvati’ ke sampadak hona svikar kiya. dharmpatni ko aisa duःkha hua tha ki do din khana na khaya kaha. haan, mainne sarasvati ki aradhana avashya ki bhai, ye khabt hai. tumne mujhsa khabti aur kahin dekha hai? meri ankhon mein ansu aa ge. mainne kaha—acharya var, shahajhan bhi aisa hi khabti tha. usne mrityu par prem ko vijyi banane ke liye hi ‘tajamhal’ ki taiyari mein kitna rupya laga diya. dvivedi bhi hans diye aur bole—ek baat aur dekhi hai ki hatevale jangale mein tala kyon paDa hai. mainne prashnatmak drishti Dali. ve bole—ah, duniya muhabbat ki qadr kya jane? logon ne ye kahna shuru kiya ki dubauna apni stri ko devi banakar pujana chahta hai. isiliye mainne tala Daal rakha hai. main sochne laga ki sansar ki drishti kitni sankirnan hai, par saath hi is shuddh sundarta ke upasak ke dil ka naqsha bhi samne aa gaya. acharya ji ki 42 varsh ki aayu mein dharmpatni ka svargavas hua tha. ab wo aayu 75 76 varsh hai. mano beech ke sare varsh isi prem nirvah ke bhavon par nichhavar kar diye ge. mujhe to har taraf acharya ji ki sahityik saralta ki hi chhata dekh paDi, jo prem evan saundarya ke prbhavon se paripurn thi. kritrimta ka kahin lesh nahin tha.
sehar ji ne apni nai pustak rubaiyat khaiyam ke padyabaddh anuvad ki ek prati acharya ji ko bhent ki thi. kahte the ki bachchon ko ye pustak bahut pasand aai. chhapai aadi to inDiyan pres ki visheshata bhi achchha hai. anuvad bhi achchha hai. farsi kavi ke bhavon ko baDi sadgi aur safai se pesh kiya hai.
mere ramayni lekhon ke bare mein unhen ye sunkar ashcharya hua ki unhen pustakrup mein chhapne ka koi prakashak taiyar nahin, aur hindi masik bhi khoj sambandhi lekhon ko chhapne se praayः hichakte hain. bole—hindi ne aise lekhon ka aadar karna abhi nahin sikha. vahan grahak ki adhik chinta hai. parantu yadi hindi masik 5 pratishat prishth bhi aise lekhon ke liye alag nahin karenge to sahityik khoj ka kya haal hoga?
hamein ye sunkar baDa tajjub hua ki acharya ji hindustani ekaDmi ke sadasya nahin hai. puchhne par kaha—bhai, kaunfrens ka haal liDar mein paDh leta hoon. mujhe to bulava bhi nahin aata. yahan to paDon ki poonchh hai. main koi Dauktar thoDa hoon. main to hoon hindi ka ek gramin sevak aur wo hai ekaDmi!
dvivedi ji ka svasthya theek nahin. neend na aane ko baDi shikayat hai. shaam se hi so jane ki koshish karte hain. us din bhi ve 8 baje raat ke qarib hum logon se kshama pararthna kar bhitar chale ge. tab unke bhanje panDit kamlakishor tripathi se baten hone lagin. yahi dvivedi ji ke akele varis hain—navyuvak, sundar, saral aur sushil. unke atithi satkar ka kya kahna? har kaam ko naukar se pahle karna chahte the. homiyon paithi? se janta ki seva karte rahte hain, jismen unhen din raat ka khayal nahin rahta.
hum log dusre hi din savere bailgaDi se vapas hue. phir vahi vasantritu ka manomohak drishya tha aur vahi sugandhit vayu ke shital jhakore. main gunguna raha tha—
panchhi bolan lage raah chalan lagi raam naam ki bera,
sabere utho!
bail chaDhe bhola Damru bajavain aage gauradei ka Dola,
savere utho!
ganga ki katri aa gai. vahan gaDi ki koi raah tak nahin. jhau ki jhaDiyon mein uunchi nichi zamin ko paar karte aur ghat ke thekedar ko koste chale jate the. yadi kuch jhau kaat Dali jati to kya sau do sau ka kharch tha? phir gaDiyon ki leek aap hi ban jati. lautte samay bhi ghaat par koi zimmevar adami na tha, jisse kuch kaha jata. ghaat aur rasta kuch behtar ho sakta hai aur hona chahiye, kyonki acharya ji ke darshanarth bahudha baDe baDe kavi aur lekhak idhar aaya hi karte hain aur yahi muqam yani lahngi ghaat daulatpur ke sabse zyada nazdik hai. abhi kuch hi din poorv thi maithilishran gupt aur panDit dularelal bhargav vahan ge the.
vapsi mein thakur chandrpalsinh mukhtar ke pita daas ji ne khane ka saman kar rakha tha. hum log ghaat kinare hi nahakar dvivedi ji ke ghar ka parsad khane ge the. par thakur sahab kisi tarah na mane. unhonne ghar ke ghi ki bani hui garm puriyan aur ghar ke shuddh desi ghi mein wo maza aaya ki ji tript ho gaya. lautte hue log kalyanpur hokar aaye, jo gainD trank roD lahngi ghaat se 2 meel par hai aur jahan se kanspur gugauli ii. aai. aar. lagbhag meel bhar hoga. dhoop baDi tez ho gai thi. raah mein ek baraura namak gaanv hai, jahan saDak ke kinare kuen par ek janeudhari mahashay pani kheench rahe the. sehar ji ne jakar pani pila dene ko kaha. par ye hum pani nahin de sakte kahkar tarpan mein lag ge. ye dekhkar duःkha hua ki ve garmi mein ek pyase manushya ko pani pilane ki apeksha ek adrishya astitv ke tarpan mein pani luDhkana adhik avashyak samajhte the! parantu usi samay kuen par khaDe hue ek dusre gharib dehati ne apna bhara hua Dol aage baDha diya. hum logon ne pani piya aur ye sochte hue chal diye ki devta ke nikat wo tarpan adhik svikrit hone yogya tha ya wo manavochit karya jisne do tript manushyon se tripti aur shanti di. smran rahe ki main svayan sanatandharmi hoon aur dainik tarpan karne ka aadi.
स्रोत :
पुस्तक : सचित्र मासिक पत्रिका भाग-39, खंड 2 (पृष्ठ 31)
हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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