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अज्ञात के कथाएँ
तित्तिर जातक
प्राचीन काल में हिमालय पर्वत पर न्यग्रोध का एक बहुत बड़ा वृक्ष था, जिसके पास एक तीतर, एक बंदर और एक हाथी रहता था। उन तीनों में बहुत मित्रता थी; पर उनमें परस्पर छोटे बड़े का कोई भाव नहीं था, इसलिए यह भी निश्चित नहीं था कि किसके प्रति कौन कितनी मर्यादा
पुष्परक्त जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय से बोधिसत्व आकाश देवता थे। एक बार कार्तिक रात्रि के उपलक्ष में वाराणसी नगरी बहुत अच्छी तरह सजाई गई थी और उसकी शोभा देवनगरी के समान हो गई थी। उस दिन सभी नगर निवासी आमोद-प्रमोद में मत्त हो रहे थे। उस समय
मशक जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व वाणिज्य करके जीविका निर्वाह करते थे। उन दिनों काशी राज्य के एक प्रत्यंत ग्राम में बहुत से सूत्रधर या बढ़ई रहा करते थे। उनमें से पके हुए वालों वाला एक सूत्रधर एक दिन काठ का एक टुकड़ा रँदकर
फल जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत के समय में बोधिसत्व ने एक श्रेष्ठि-कुल में जन्म लिया था। वयस्क होने पर वे पाँच सौ बैलगाड़ियों पर माल लादकर इधर-उधर वाणिज्य करने के लिए जाया करते थे। एक दिन वे किसी बहुत बड़े जंगल के पास पहुँचे। गंतव्य स्थान तक पहुँचने के लिए
शृगाल जातक
प्राचीन काल में जब कि ब्रह्मदत्त वाराणसी में राज कर रहे थे, बोधिसत्व ने शृगाल योनि में जन्म लिया था और वे जंगल में एक नदी के तीर पर रहते थे। उसी नदी के किनारे एक बुड्ढा हाथी मरा हुआ पड़ा था। बोधिसत्व भोजन की चिंता में बाहर निकले। मार्ग में उन्हें वह
मत्स्य जातक
इसी कोशल राज्य और श्रावस्ती नगर में, जहाँ इस समय जेतवन सरोवर है, वहाँ, किसी समय लताओं आदि से परिवृत एक और सरोवर था। बोधिसत्व मछली का जन्म ग्रहण करके उस सरोवर में रहा करते थे। इस समय की भाँति उस समय भी अनावृष्टि के कारण सरोवर और तड़ाग आदि सूखकर जलरहित
असंपदान जातक
असंपदान प्राचीन काल में बोधिसत्व मगध के राजा के श्रेष्ठी थे और राजगृह नगर में रहा करते थे। उनके पास अस्सी करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ थीं, इसलिए लोग उनको शंख श्रेष्ठी कहा करते थे। उन दिनों वाराणसी में पिलिय नामक एक और श्रेष्ठी रहा करता था। उसके पास भी अस्सी
विड़ाल जातक
विड़ाल प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने चूहे की योनि में जन्म धारण किया था। वे आकार में सूअर के शावक के समान और बहुत बुद्धिमान् थे। उनके पास कई सौ चूहे रहा करते थे और वे उन सबको अपने साथ लेकर जंगलों में घूमा करते थे। एक
विश्वासभाजन जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व एक बहुत संपन्न श्रेष्ठी थे। जिस समय जंगलों में हरी-हरी घास उगती थी, उस समय उनके गोपालक और भी सब गोपालकों को अपने साथ लेकर जंगल में जाया करते थे और वहीं गौएँ चराते थे। बीच-बीच में वे दूध आदि
काक जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व समुद्र देवता थे। एक बार एक कौवा अपनी स्त्री के साथ आहार ढूँढ़ने के लिए समुद्र तट पर गया था। उस समय कुछ लोग समुद्र तट पर खड़े होकर क्षीर, पायस, मत्स्य मांस, सुरा आदि से नाग की पूजा कर रहे
आरामदूषक जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में एक बार घोषणा हुई कि अमुक पर्व के उपलक्ष में एक उत्सव होगा। भेरी का शब्द सुनते ही सब नगरनिवासी उत्सव में सम्मिलित होने के लिए दौड़ पड़े। उस समय राजा के उद्यान में बहुत से बंदj रहा करते थे। उद्यानपाल ने सोचा कि
मुणिक जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने एक बैल का जन्म धारण किया था। उस समय वे एक भूस्वामी या ज़मींदार के घर में रहा करते थे। उनका नाम था महालोहित। उनके साथ उनका छोटा भाई भी रहता था जिसका नाम चुल्ललोहित था। उस ज़मींदार की
देवधर्म जातक
प्राचीन काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त नामक एक राजा राज्य करता था। बोधिसत्व ने उसके पुत्र के रूप में जन्म लिया था। उस समय उनका नाम महिंसासकुमार था। जब वे दो तीन वर्ष के हुए, तब उनका एक और छोटा भाई उत्पन्न हुआ। राजा ने उसका नाम चंद्र कुमार रखा। जब चंद्रकुमार
दुर्मेधा जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने राज-महिषी के गर्भ में जन्म लिया था। नामकरण के दिन उनका नाम ब्रह्मदत्तकुमार रखा गया था। उन्होंने सोलह वर्ष की अवस्था में ही तक्षशिला नगरी में विद्याभ्यास करके तीनों वेदों और अठारह कलाओं का बहुत अच्छा
कपोत जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने कबूतर का जन्म धारण किया था। उन दिनों काशी-निवासी पक्षियों के सुभीते और आश्रय के लिए स्थान-स्थान पर टोकरियाँ बाँधकर लटका दिया करते थे। वाराणसी के प्रधान श्रेष्ठी के पाचक या रसोईदार ने भी
वक जातक
प्राचीन काल में बोधिसत्व किसी वन में पद्म सरोवर के पास के एक वृक्ष पर वृक्ष-देवता के रूप में निवास किया करते थे। वहाँ पास ही एक छोटा तालाब था, जिसका जल ग्रीष्म ऋतु में बहुत घट जाता था। उस तालाब में मछलियों रहा करती थीं। एक दिन एक बगले ने उन मछिलयों को
कूटवाणिज जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने एक वणिक के यहाँ जन्म लिया था। नामकरण के दिन उनका नाम 'पंडित' रखा गया था। जब बोधिसत्व बड़े हुए, तब उन्होंने एक दूसरे वणिक के साथ, जिसका नाम 'अति पंडित' था, साझे में व्यापार करना आरंभ किया।
खदिरांगार जातक
प्राचीन काल में सम्यक्सबुंद्ध काश्यप के समय में किसी गाँव में एक शीलवान्, धर्मपरायण और तत्वदर्शी स्थविर रहा करता था। उस गाँव के स्वामी ने उसके भरण पोषण का भार अपने ऊपर ले लिया था। उसी समय एक और अहन् वहाँ आ पहुँचे जो अपने संघ के सभी भिक्षुओं के साथ बहुत
सुखविहारि जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने एक औदीच्य ब्राह्मण के घर में जन्म लिया था। उन्होंने यह समझकर कि काम सदा दुःखदायी और निष्क्रमण सदा सुखदायी होता है, काम का परिहार किया और वे हिमालय की ओर चले गए। वहाँ उन्होंने प्रव्रज्या
सत्यं-किल जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त का दुष्टकुमार नामक एक पुत्र था। उसका स्वभाव इतना भीषण और निष्ठुर था कि लोग उससे उतना ही डरते थे जितना आहत विषधर से डरते हैं। लोगों के साथ बातचीत करते-करते वह उनको गालियाँ दे बैठता था और कभी-कभी मार भी देता था। इस कारण वह भीतर
नामसिद्धिक जातक
प्राचीन काल में बोधिसत्व तक्षशिला में एक प्रसिद्ध आचार्य थे। पाँच सौ ब्राह्मण बालक उनके पास रहकर शिक्षा पाते थे। उन छात्रों में से एक छात्र का नाम था "पापक"। और सब छात्र उसे सदा "पापक पापक" कहकर पुकारा करते थे। पापक सोचने लगा कि मेरा नाम अमंगलसूचक है;
महासार जातक
महासार प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने सब विद्याओं में पारंगत होकर उनके अमात्य का पद प्राप्त किया था। एक बार राजा अपने साथ बहुत से अनुचरों को लेकर विहार करने के लिए उद्यान में गए थे। वहाँ घूमते फिरते उन्हें जल-विहार
भीमसेन जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने किसी निगम ग्राम में एक उदीच्य ब्राह्मण के घर में जन्म लिया था। वयस्क होने पर उन्होंने तक्षशिला के एक प्रसिद्ध आचार्य से शिक्षा पाई थी। वे तीनों वेदों और अठारहों विद्याओं की शिक्षा पाकर
वभ्रु जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने पाषाण-कुट्टक या संगतराश के घर में जन्म लिया था; और वयस्क होने पर उन्होंने अपने व्यवसाय में विलक्षण निपुणता प्राप्त की थी। काशी राज्य के किसी गाँव में एक बहुत प्रसन्न श्रेष्ठी रहता था।
कृष्णधर्म जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में पहले वैश्रवण की मृत्यु हो गई और शुक्र ने एक दूसरे देवता को उनके राज्य का भार प्रदान किया। नए वैश्रवण ने राजपद ग्रहण करके तरु, लता, गुल्म आदि के देवताओं को आज्ञा दी कि तुम लोग जहाँ चाहो, वहाँ विमान बनाकर निवास करो। उस
महास्वप्न जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने उदीच्य ब्राह्मण कुल में जन्म ग्रहण किया था। वयस्क होने पर उन्होंने ऋषि-प्रवज्या ग्रहण करके अभिज्ञा और समापत्ति प्राप्त की और हिमालय में जाकर ध्यान का सुख भोगने लगे। राजा ब्रह्मदत्त
कुहक जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में किसी गाँव में एक जटाधारी धूर्त तपस्वी रहा करता था। उस गाँव के एक ज़मींदार ने उसके रहने के लिए वन में एक पर्णशाला बनवा दी थी और उसके भोजन के लिए वह अपने घर से नित्य अच्छे-अच्छे पदार्थ भेजा करता था।
कुलायक जातक
बहुत दिनों की बात है, मगध के राजा लोग राजगृह नगर में रहा करते थे। उस समय बोधिसत्व ने मगध के मचल नामक ग्राम में उच्च कुल के एक ब्राह्मण के घर में जन्म लिया था। नामकरण के समय उनका नाम मघकुमार रखा गया था। पर जब वे बड़े हुए तब लोग उन्हें मधमाणवक उनके माता-पिता
अपण्णक जातक
अपण्णक* जातक प्राचीन काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त नामक एक राजा था। उसके समय में बोधिसत्व ने एक वणिक के घर में जन्म लिया था। बोधिसत्व बड़े होने पर व्यापार करने लगे। उनके पास पाँच सौ बैल-गाड़ियों थीं। उन्हीं गाड़ियों पर माल लादकर वे कभी पूरब और कभी
एकपर्ण जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने एक उदीच्य ब्राह्मण कुल में जन्म लिया था। बड़े होने पर उन्होंने तक्षशिला में तीनों वेदों और समस्त शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करके कुछ दिनों तक अपने घर में निवास किया था और तब वे ऋषि-प्रव्रज्या
मृतकभक्त जातक
मृतकभक्त जातक प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में एक प्रसिद्ध त्रिवेदज्ञ ब्राह्मण अध्यापक रहता था। एक दिन उसने मृतकभक्त देने के लिए एक बकरा लाकर अपने शिष्यों को दिया और कहा—"इसे ले जाकर नदी में स्नान करा लाओ, इसके गले में माला पहनाकर,
पंचायुध जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने महिषी के गर्भ में जन्म लिया था। उनके नामकरण के दिन उनके माता-पिता ने आठ सौ दैवज्ञ ब्राह्मणों को यथेष्ट भेंट देकर पूछा कि इस बालक का भाग्य कैसा होगा। दैवज्ञों ने बोधिसत्व को सुलक्षण संपन्न देखकर उत्तर
चुल्लश्रेष्ठि जातक
प्राचीन काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त नामक एक राजा रहता था। उसके समय में बोधिसत्व ने श्रेष्ठि कुल में जन्म लिया था। जब बोधिसत्व बड़े हुए, तब वे भी श्रेष्ठि के पद पर नियुक्त हुए। लोग उनको चुल्लश्रेष्ठि (छोटा सेठ) कहा करते थे। वे बहुत ही विद्वान और बुद्धिमान्
महाशील जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने राजमहिषी के गर्भ में जन्म लिया था। नामकरण के समय उनका नाम शीलवान् कुमार रखा था। सोलह वर्ष की अवस्था में वे सत्र विद्याओं के पंडित हो गए थे और पिता की मृत्यु के उपरांत राजपद पर प्रतिष्ठित
मखादेव जातक
प्राचीन काल में विदेह राज्य की मिथिला नगरी में मखादेव नामक एक धर्मपरायण राजा राज्य करता था। पहले कुमार रहकर, फिर उपराज होकर और अंत में महाराज होकर उसने चौरासी हज़ार वर्ष तक सुखपूर्वक शासन करते हुए अपना समय बिताया था। उसने अपने नापित से कह रखा था—"जब
आम्र जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने एक उदीच्य ब्राह्मण के कुल में जन्म लिया था और बड़े होने पर उन्होंने ऋषि प्रव्रज्या ग्रहण की थी। वे पाँच सौ ऋषियों के साथ हिमालय की तराई में निवास करते थे। एक बार हिमालय में बहुत अनावृष्टि
संजीव जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने एक संपन्न ब्राह्मण के घर में जन्म लिया था। जब वे बड़े हुए तब उन्होंने तक्षशिला में जाकर ख़ूब विद्याध्ययन किया और सब विद्याओं में पारंगत हो गए। पश्चात् काशी में आकर वे अध्यापन का कार्य
काष्ठहारि जातक
एक बार वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त अपने उद्यान में विहार करने के लिए गए थे। वहाँ वे फल-फूल आदि एकट्ठा करने के लिए इधर-उधर घूम रहे थे। इतने में उन्होंने देखा कि एक स्त्री गीत गा गाकर लकड़ियाँ चुन रही है। ब्रह्मदत्त ने उसके रूप पर मुग्ध होकर उसी समय उसके
इल्लीस जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में इल्लीस नामक एक श्रेष्ठी था, जिसके पास अस्सी करोड़ स्वर्णमुद्राएँ थीं। मनुष्य में जितने दोष हो सकते हैं, उनमें से कदाचित ही कोई दोष ऐसा न हो जो इल्लीस के शरीर या चरित्र में न हो। वह लँगड़ा, कुबड़ा और भेंगा था; धर्म
विरोचन जातक
प्राचीन काल में वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व सिंह का जन्म ग्रहण करके हिमालय की तराई में सोने की एक गुफ़ा में रहा करते थे। एक दिन उन्होंने अपनी गुफ़ा में खड़े होकर जँभाई ली और चारों ओर देखकर वे गरजते हुए मृगया के लिए बाहर निकले। उन्होंने
वेदब्भ जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में किसी गाँव में "वेदब्भ" मंत्र का ज्ञाता एक ब्राह्मण रहता था। इस वेदब्भ मंत्र में अद्भुत शक्ति थी। कुछ विशिष्ट नक्षत्रों के योग के समय इस मंत्र का पाठ करके आकाश की ओर देखने से ही सातों प्रकार के रत्नों की वृष्टि होने
वानरेंद्र जातक
वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय में बोधिसत्व ने एक बंदर के रूप में जन्म लिया था। बड़े होने पर वे बछेड़े के समान ऊँचे और असाधारण बलवान् हुए। वे अकेले एक नदी के तट पर रहा करते थे। उस नदी के बीच में एक द्वीप था जिसमें कई प्रकार के फलों के वृक्ष थे। बोधिसत्व
नन्दिविलास जातक
प्राचीन काल में तत्क्षशिला में गांधार लोग राज्य करते थे। उस समय बोधिसत्व ने बछड़े का जन्म धारण किया था। जिस समय वे नज मे थे, उसी समय एक ब्राह्मण ने किसी दाता से उन्हें प्राप्त किया था। ब्राह्मण ने उनका नाम नन्दिविलास रखा था। वह उन्हें अच्छे-अच्छे पदार्थ
वरूण जातक
प्राचीन काल में गांधार राज्य की तक्षशिला नगरी में बोधिसत्व एक प्रसिद्ध आचार्य थे। पाँच सौ शिष्य उनके पास रहकर विद्याभ्यास किया करते थे। एक दिन उन्होंने शिष्यों को लकड़ी लाने के लिए जंगल में भेजा। वे जंगल में जाकर लकड़ियाँ चुनने लगे। उनमें से एक विद्यार्थी