नीलकंठ दीक्षित के उद्धरण

व्यक्ति यदि धार्मिक है तो उसे अपना धन याचकों में वितरित कर देना चाहिए, यदि वह नास्तिक है तो उसे धन का भोग-विलास में उपयोग करना चाहिए, यदि मनुष्य धन को स्पर्श भी न करके छिपा कर रखता है तो उसमें उसका क्या हेतु है, यह हमारी समझ में नहीं आता।
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यदि धन, धन द्वारा साध्य हो तो धर्म और काम की क्या? अर्थ सब जगत् का मूल है तथा अनर्थ अर्थ का विपर्यय हैं।
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