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फेरीवालों का रुख़

feri valon ka rukh

राजेश सकलानी

राजेश सकलानी

फेरीवालों का रुख़

राजेश सकलानी

और अधिकराजेश सकलानी

    फेरीवाले गली में क़रारी आवाज़ें लगाते हैं

    शायद उन्हें हमारी ज़रूरत है

    उनकी मासूमियत और असंगठन के भ्रम को

    हम चला सकते हैं

    कम वे भी नहीं हैं और अनजान बनते हुए

    हमारे मनसूबे से कामयाबी से खेलते हैं

    उनके पहनावों में दिलकश लापरवाही है

    और उनकी आवाज़ का तीखापन

    ईर्ष्या पैदा करता है

    वे हमारी तरह डरे हुए नहीं हैं

    क्यों उन्होंने सारे मौसमों को साध लिया है

    उनकी भाषा-नीति सरल और मज़बूत है

    उसे वे सिर पर नहीं चढ़ने देते

    हम यहीं फँसे हैं, अपनी कॉलोनी को ख़ामख़ाँ

    क़िला समझते हैं

    फेरीवाले हमारे देखने की अनदेखी करते हैं और

    रोज़ आगे बढ़ते हैं,

    पीछे तो वह जाने से रहे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : पानी है तो फूटेगा (पृष्ठ 63)
    • रचनाकार : राजेश सकलानी
    • प्रकाशन : परिकल्पना प्रकाशन
    • संस्करण : 2019

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