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यही मटिया म सोनवा उगावै चली

yahi matiya ma sonva ugavai chali

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

यही मटिया म सोनवा उगावै चली

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    चला खेतवा धनवा लगावै चली,

    यही मटिया सोनवा उगावै चली,

    भरि जइहैं तलवा तलइया पानी,

    खेतिया किसनिया पै आवै जवानी,

    धानी चुनरी धरा का ओढ़ावै चली।

    यही मटिया...

    गँउआ अँजोर करै चन्दा तरइया,

    अमवा की डारी पै बोले चिरइया,

    फूल बगिया अपने रखावै चली।

    यही मटिया...

    पाकि गवा जोंधरी बजरिया कै दनवा,

    उड़ जइहैं टोट मारि-मारि के सुगनवा,

    मार ढेलवा चिरइया उड़ावै चली।

    यही मटिया...

    केहू भूखा रहै पियासा रहै,

    हम पंचन रोटी कै आसा रहै,

    प्रीत कै गीत सबका सुनावै चली।

    यही मटिया...

    अपने सिमवा पे राखब सदा चौकसी,

    फन जौ कुचला करब नाग कइसे डसी,

    केहू सोवै पावै जगावै चली।

    यही मटिया...

    जान जे केहु देहे बा वतन के बरे,

    सीस ओहका झुकी फिर नमन के बरे,

    प्रेम सद्भाव सबका सिखावै चली।

    यही मटिया...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 25)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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