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यही मटिया कै सान ई किसान बबुआ

yahi matiya kai saan ii kisan babua

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

यही मटिया कै सान ई किसान बबुआ

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    यही मटिया कै सान किसान बबुआ,

    करै तोहरा पे देसवा गुमान बबुआ,

    घनी-घनी बगिया तो मनवा लुभावै,

    चनवा के दनवा गजब गीत गावै,

    तुही धरती कै आन-बान-सान बबुआ,

    यही मटिया कै सान...

    हिल-मिल हम सब करबै किसानी,

    खेतवा में लउबै नहरवा कै पानी,

    फुलवरिया फुलवा फुलान बबुआ,

    यही मटिया कै सान...

    निलहे अकसवा चँदवा तरइया,

    भोर होत बिरछा बोलथिं चिरइया,

    करैं निमिया के छाँव जलपान बबुआ

    यही मटिया कै सान...

    देखा तनी खुद मगन किसनवा,

    मटिया मिलाय रहा मोतिया दनवा,

    खाली पेट भरै उड़ान बबुआ,

    यही मटिया कै सान...

    हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख इसाई अही,

    हम पहिले तौ सब भाई-भाई अही,

    इहै एकता हमार पहिचान बबुआ,

    यही मटिया कै सान...

    अँखिया कै पुतरी सगरौ जमनवा,

    प्रितिया कै गितिया सुनावै परवनवा,

    करी देसवा पे कविता दान बबुआ

    यही मटिया कै सान...

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 22)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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