गीत गीतों में सर्वोपरि
geet giton mein sarvopari
चलें, मेरी यायावरा, साँवरे प्रेम मेरे;
श्यामल है वर्ण, लोचन भी श्याम तेरे;
चित्रल हैं पग और स्निग्ध केश तेरे;
सकल साँवरि, सकल वन-अल्हड़, साँवरे प्रेम मेरे।
तेरे नयनों के क्रंदन से प्यार मुझे, तेरे वक्षों के
क्रंदन से प्यार मुझे;
उसमें है हमारा प्रेम, दर्द में ही होता नारी से
प्रेम और दर्द ही संतान जनता;
ओ नग्न प्रेम मेरे।
स्वतंत्रता में विशाल है तू, विशालतर प्रेम हमारा;
प्रेम हमारा वन-सा तमस् और देवत्व-सा रक्तमयी;
नारी मेरी है प्रथम नारियों में : रात्रि-सी काली, बदली-सी
रहस्यमयी,
मेरे चुंबन-सी अल्हड़, मेरी पंक्तियों-सी ध्वंसकारी।
हमारा प्रेम विप्लव होगा : धुँधला और काल्पनिक और
लोगों के पास उसके लिए उपयुक्त शब्द न होंगे;
हम नग्न और गर्म परस्पर चूमेंगें, चुभन हमारी रक्तमयी
कविता होगी ;
नोंच लूँगा केश तेरे, और तू अपने नेत्र मेरी आत्मा में
छाप देगी और रौद्र होगी अभिशप्त कविता हमारी;
नाग-से कुंतलित होंगे, आदर्श-से रेंगेंगे—त्रासदी
हमारी निराश कविता होगी;
स्तंभित करेगा हमें प्रेम हमारा—संत्रासों के बेंत लगाएगा
और दर्द हमारी विकट कविता होगी;
वन होगा मंदिर, कुश होगी शैया हमारी—विप्लव हमारा दैव,
आत्माएँ हमारा बलि का बकरा।
विप्लव में से फटक आएगा हमारा बच्चा—ओ मेरी
अवैध पत्नी, मेरे अवैध प्रेम
उसका नाम होगा : अवैध बच्चा ;
भटकेगा संसार में भूखा हमारी वासना-सा, अभिशप्त
हमारी कविता-सा
और रक्तमयी हमारे प्रेम-सा;
शाप पर शाप टूटेंगे उस पर, लोगों के बीच उसे स्थान न मिलेगा;
माँ को, बाप को भी कोसेगा, उनके प्रेम को भी,
और गालियों से भर देगा लोगों से ईश्वर तक;
पीड़ा और आतंक काँप जाएँगे जहाँ भी उसका पैर पड़ेगा,
न पाएगा वह सूखी रोटी का तिनका तक;
पकड़ेंगे उसे, बाँधेंगे उसे, अपराध ही उसका भोजन होंगे।
संसार मर चुका है, मेरे प्रेम, उसकी उकताहट में तमस् है;
जनगण मर चुका है, मेरे प्रेम, निद्रालस है गीत उसका;
झक्की है मौन, मेरे प्रेम, और मौन ही बोल उसका;
देखो, उनींदे हैं वे और जँभाई बनी है संगीत नूतन;
उनकी आत्मा सूनी है वेश्या की मुस्कान-सी, मुस्कान उसकी
निर्जीव क़ानून के अक्षर-सी;
क़ानून हैं उनके मानो उनका ईश्वर हो- उनका दैव भी
हृदयहीन;
एकरस है बलिदान उनका सिगरेट के धुएँ-सा और
गंध जिसकी लोथ की गंध-सी;
उनके नभलोक में तारे नहीं, बादल भी दूसरे हैं;
सूरज उनका फीका है शवगृह की मोमबत्ती-सा, दीवारें उनका
जंगल हैं;
उजाड़ है, काला है, मेरे प्रेम, दिन भी उनके वैसे ही हैं जैसे
विचार;
उनके नेत्रों में अशांति नहीं, वे शूकरी के नेत्रों से हैं;
उनकी गतियों में द्रोह नहीं और वे बेलों की चालों-सी हैं;
उनके शरीरों में रक्त नहीं, उनकी आत्मा ईश्वर की भाँति
सूनी है।
वहीं फेंक देंगे अपना बच्चा, साँवरे प्रेम मेरे;
वहाँ होकर भटकेंगे पैर उसके, उसकी गालियाँ दमकेंगी;
वहीं काँपेगी आत्मा की लपट उसकी : विचार विध्वंस का,
गति द्रोह की और साँस रोष की;
वह ऐसा बनेगा जो सोते हुओं को जगाएगा, मृतकों को
जिलाएगा;
बेड़ियाँ उसकी वाग्दत्ता होंगी।
हमारा अवैध बच्चा, ओ अवैध माँ उसकी—
अपराध-सा अनाम और भूख-सा एकाकी!
हर्षध्वनि करेंगे हम अपने चुंबनों के स्वरों से, अपने रक्त की
पूर्णता से :
ओ अनाम, तुम हमारे बच्चे हो!
हमारी हर्षध्वनि होगी हर्षध्वनि प्रहर्ष की और प्रगल्भता की :
विशाल ज्यों चिरता,
लुंचन-सी वासनमय, वन के अँधेरे में नारी-सी लुभावनी।
चलें, मेरी यायावरा, साँवरे प्रेम मेरे;
प्रेम करेंगे विप्लव में, विप्लव से बच्चा उपजेगा,
बच्चा हमारे रक्त का बच्चा हमारी आत्मा का,
हमारे जीवन का।
चलें, यायावरा, साँवरे प्रेम मेरे;
बच्चा जनेंगे, अनाम बच्चा;
उसे नाम देंगे, सुंदरों में से सुंदरतम;
विक्रांति नाम होगा उसका, ओ अवैध प्रेम हमारे!
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 31)
- रचनाकार : यांको पोलिच-कामोव
- प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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