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राहुल सांकृत्यायन को 2026 में पढ़ना कैसा है?

मैं Clarice Lispector, Annie Ernaux और Han Kang के बीच राहुल सांकृत्यायन को पढ़ रही थी। क्या यह सही फ़ैसला था? पता नहीं। कुछ ही दिनों पहले; मैं 1950 के पेरिस की सैर कर रही थी, और उसके कुछ दिन बाद मैंने ख़ुद को वर्ष 1920 के तिब्बत में पाया। हमारा subconscious mind इमेजिनेशन और रियलिटी के बीच के अंतर को समझ नहीं पाता, तो थोड़ी देर के लिए यह मान लिया जाना चाहिए कि मैं तिब्बत की यात्रा करके लौट रही हूँ। वही तिब्बत, जिसकी यात्रा राहुल सांकृत्यायन ने तीन बार की है। 
 
ऐसा बहुत कम होता है, जब आपको किताब के साथ-साथ उस किताब का लेखक भी कंप्लीट लगे। यहाँ ध्यान दिया जाए कि मैं ‘पूरा’ की जगह ‘कंप्लीट’ शब्द का इस्तेमाल कर रही हूँ। राहुल सांकृत्यायन एक कंप्लीट लेखक के साथ-साथ, कंप्लीट पर्सनालिटी भी हैं। अपने आधे से ज़्यादा जीवन में देश-दुनिया की यात्रा करने वाले; सात से ज़्यादा भाषाओं के जानकार, अनेक विषयों पर 150 से ज़्यादा किताबें लिखने वाले व्यक्ति के बारे में बताते हुए ‘फ़ादर ऑफ़ हिंदी ट्रैवल लिटरेचर’ सबसे अंत में लिखा जाना चाहिए। उन्हें पढ़ना Ludovico Einaudi का Primavera सुनने जैसा है।

‘घुमक्कड़ शास्त्र’ सिर्फ़ घुमक्कड़ी के बारे में नहीं है। वर्ष 1949 के जून माह में लिखे गए ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ में, राहुल सांकृत्यायन एक जगह अमीबा के बारे में विस्तार से बता रहे हैं, तो दूसरी जगह कुछ पंक्तियों में एनर्जी और वाइब्स को परिभाषित कर रहे हैं। एक व्यक्ति हर मायने में इतना कंप्लीट कैसे हो सकता है? जहाँ एक तरफ़ वह संस्कृत के श्लोक का अर्थ समझाते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ प्लेटॉनिक लव के बारे में बताते हैं।

इस किताब के शुरू में वह कहते हैं कि अगर आप चौबीस वर्ष से ज़्यादा के हैं, तो घुमक्कड़ी के लिए बहुत देर हो गई है। इस बात पर मैं सोचने लगी कि देर तो वाक़ई हो गई है। काश मैंने यह किताब बीस की उम्र में वर्ष 1949 में पढ़ी होती, ताकि मैं अपने विचार उन्हें पत्र के ज़रिये भेज पाती और वह मेरे पत्र पढ़कर, एक नया चैप्टर ‘तरुणियाँ कैसे करें’ लिखते। फिर मेरे ख़ुशियों के पिटारे में ये भी जुड़ जाता, जिस तरह घुमक्कड़ों के पिटारे में स्मृतियाँ जुड़ती है। ज़ाहिर है कि यह मुमकिन नहीं। अब तो बस मन के गैप्स को एक साथ जोड़ने की कोशिश की जा सकती है, जिसमें भी अधिकतर समय नाकामी हाथ लगती है। बाक़ी उनकी तिब्बत यात्रा को बार-बार तो पढ़ा जा ही सकता है।

राहुल सांकृत्यायन को पढ़कर ज़ेहन में उठे कई अहसासों के बीच, यह सवाल भी उठता है कि एक व्यक्ति, एक ही जीवन में इतना कुछ हासिल कैसे कर सकता है! यहाँ हासिल से मेरा मतलब अनुभवों से है। उन्होंने हर रंग को जिया है और उसे लिखा भी है। उनकी स्मृतियों से रश्क होता है। उनकी किताबें पढ़ना ठीक वैसा ही है—जैसे किसी आर्ट गैलेरी में टहलना।

ह्यूमन साइकोलॉजी को गहराई से समझने वाले राहुल सांकृत्यायन जानते थे कि आने वाली पीढ़ी किस सोच की होगी, दुनिया कितने बदलावों से होकर गुज़रेगी। वह सही मायने में एक मॉडर्न व्यक्ति थे। उन्हें वाक़ई फिजिक्स के नियम, एस्ट्रोनॉमी, बिग बैंग थ्योरी, आइंस्टीन की थ्योरीज़, लोगों के दु:ख और सुख की इतनी परवाह थी कि उन्होंने पानी के बुलबुले समान ज़िंदगी को ज़ाया नहीं जाने दिया—न ख़ुद के लिए और न दुनिया के लिए। एक व्यक्ति इस तरह से ख़ुद के लिए और दुनिया के लिए कंप्लीट हो सकता है, यह हैरानी वाली बात है। कम से कम मेरे लिए तो है ही।

जिस तरह आइंस्टीन ने गांधी के लिए कहा था, “आने वाली पीढ़ियाँ शायद ही विश्वास कर पाएँगी कि महात्मा गांधी जैसा कोई व्यक्ति कभी हाड़-मांस के शरीर में इस धरती पर चला था।” कुछ ऐसा ही महापंडित राहुल सांकृत्यायन के लिए भी कहा जाना चाहिए। जैसा कि मैंने ऊपर भी लिखा है, मैं तो महज अपने मन के गैप्स को जोड़ने की नाकाम कोशिश कर रही हूँ। क्या आज से दो सौ साल बाद कोई यक़ीन कर पाएगा कि इस तरह का व्यक्ति भी जी कर गया है। आज से सौ साल पहले वह इस दुनिया को जी चुके हैं, वह भी अपने पक्के रंग में। उसकी ख़ुशबू आज भी महसूस की जा सकती है। सौ साल पहले! यह कितना डिप्रेसिंग लेकिन अद्भुत विचार है कि सबको जीने के लिए अलग टाइम फ़्रेम मिलता है। राहुल सांकृत्यायन को बीसवीं शताब्दी का टाइम फ़्रेम मिला था, और विद्वान कुमारजीव को 401 ई. का।

ख़ुद पर भी वह ‘मेरी जीवन यात्रा’ में इतना लिख चुके हैं कि अब उन पर कुछ लिखना, बस अपने खींचे हुए बेढंग विचार रखने मात्र होगा। यहाँ मैं उन्हें जानने और समझने का जो झूठा दावा कर रही हूँ, उसे थोड़ी देर के लिए सच मान लिया जाए। वह सीधे-सीधे अपनी बात रखने के पक्ष में थे। उन्होंने कभी अपने लिखे को सजाने की कोशिश नहीं की और यही उनके लेखन की सुंदरता है। हाँ, पेपरबैक को ज़रूर सजाया जा सकता है। एमेजॉन पर उनका नाम सर्च करते हुए, कई गुमनाम सस्ते पब्लिशर्स द्वारा प्रकाशित किताबों पर उनका नाम देखकर दु:ख भी होता है, तो एक एहसास भी मन में रहता है कि उनकी किताबों की प्रासंगिकता आज भी कितनी है। ढूँढ़ने पर भी अभी तक उनकी किताब का हार्डकवर नहीं मिला; जिसे मैं अपनी बुकशेल्फ़ पर ठीक वैसे ही सजा सकूँ, जिस तरह मैंने पौड़ी गढ़वाल से लाए चीड़ सजा रखे हैं।

2026 में राहुल सांकृत्यायन को पढ़ना कैसा है? घुमक्कड़ शास्त्र पढ़ने के बाद मैंने ख़ुद से यह सवाल किया था, जिसके जवाब में मैंने यह लिखा है। ऐसे बहुत कम लोग हुए हैं, जिन्हें idolize किया जा सके—राहुल सांकृत्यायन उनमें से एक हैं। जैसा उन्होंने कहा है, “प्रेम रहे, किंतु पंख भी साथ में रहें।”

वैसे साथ में रखने के लिए इस दुनिया में बहुत कुछ हैं, फिलहाल ये दोनों ही सही।

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