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बेड़ियाँ

beDiyan

अनुवाद : सुरेश सलिल

हो चि मिन्ह

हो चि मिन्ह

बेड़ियाँ

हो चि मिन्ह

और अधिकहो चि मिन्ह

     

    (1)

    किसी धूर्त राक्षस की भाँति अपना खाभुर मुँह फाड़े 

    हर रात लोगों की टाँगें निगल जाती हैं बेड़ियाँ : 

    दायीं टाँग हरेक क़ैदी की उनके जबड़ों की जकड़ में होती है 

    सिर्फ़ बायीं आज़ाद रहती है मोड़ने और फैलाने के लिए।

     

    (2)

    तब भी इस दुनिया में एक अजीब चीज़ देखने में आती है 

    कि लोगों की भीड़ें दौड़ी चली जाती हैं उसी तरफ़ 

    जकड़ी जाती हैं जहाँ टाँगें बेड़ियों में।

    एक बार बेड़ियाँ पड़ जाने पर से सुकून से सो सकते हैं 

    वर्ना सिर टिकाने-भर को मयस्सर न होती उन्हें कहीं जगह।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 110)
    • रचनाकार : हो चि मिन्ह
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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