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शनिवारेर चिट्ठी : इस बार सावन दहका हुआ है

20:32—बुधवार

बे-तरतीब बारिश हो रही है। मतलब मैं कुछ बे-तरतीब वाक्य संभव करना चाहता हूँ। मसलन बारिश हो रही है। मतलब तुम्हारी याद आ रही है। मतलब बादल अपनी काली देह में बंद समुद्रों की अधूरी स्मृतियाँ लेकर भटक रहे हैं। मतलब पेड़ ऐसे सिसक रहे हैं, जैसे पत्तियाँ अपनी पुरानी चिट्ठियाँ पढ़ रही हों। खिड़की पर ठहरी बूँदें घर और आकाश के बीच भूले हुए संवाद रटकर याद कर रही हैं। इस बार पानी इस शहर के पैरों से चिपकी मेरी यात्राओं के चिह्न धो रहा है। यही शहर है जो कुछ भीगी हुई यादों का बना हुआ एक घर है। इस कमरे की दीवारें नमी से नहीं, बीती बातों की थपकियों से सील रही हैं। बारिश हो रही है, मतलब छत पर आवाज़ें गिर रही हैं। दूर की एक टिमटिमाहट अँधेरे में किसी अकेली आँख की तरह जाग रही है। मेरी परिचित पगडंडियाँ मिट्टी में नहीं, लौटने की किसी पुरानी इच्छा में खो रही होंगी। सब जमा पानी आकाश का छोटा विस्मृत दर्पण बन जाएगा, जब सहर उसे प्रकाश देगी। इधर यह घड़ी की टिक-टिक वर्षा में समय नहीं, प्रतीक्षा माप रही है। उधर शाम बारिश को ओढ़े अपने भीतर का अँधेरा और गहरा कर रही है। बारिश हो रही है; मतलब मेरी नींद आज आँखों से दूर नहीं, तुम्हारी अनुपस्थिति के पास बैठी है। तुम दूर हो और वर्षा है और यह बची हुई रात है तो तुम्हारी स्मृति इस कमरे की सबसे उजली वस्तु बन गई है।

04:51—गुरुवार

यह बात भी वर्षा के बारे में ही है कि देह कभी त्वचा से शुरू नहीं होती, पहले से बनी रही प्रतीक्षा से जन्म लेती है। वह अपनी इच्छाओं को शब्दों में नहीं, रक्त की मंद लयों में सुरक्षित रखती है। हम एक-दूसरे को देह से कम, भीतर की अनाम रिक्तियों से अधिक देखते हैं। देह किसी आकस्मिक ज्वाला का नाम तो नहीं। तुम्हारी उपस्थिति अचानक कमरे की हवा का ताप बदल देती है और मुझे लगता है कि मेरी देह सोच भी सकती है। स्पर्श का सबसे गहरा अर्थ त्वचा पर नहीं, उस मौन में प्रकट होता है जो दो साँसों के बीच ठहर जाता है। प्रेम फिर वही क्षण है, जब देह अपने अकेलेपन को पहली बार किसी दूसरी देह में पहचान लेती है। हम एक-दूसरे को चूमते नहीं, सृष्टि की सबसे पुरानी भूख को आसरैत देते हैं। क्या आलिंगन दो व्यक्तियों का ही न हो करके, दो अधूरी आत्मकथाओं का मिलन है! मेरी देह में ऐसे अँधेरे का वास रहा है, जहाँ कोई नैतिकता प्रवेश नहीं करती। बस स्वीकृतियाँ रहीं वहाँ और संस्वीकृतियाँ। संस्वीकृतियाँ कभी अश्लील नहीं होती। उसे अश्लील हमारी हिचकियाँ बनाती हैं। त्वचा पर ठहरा हुआ एक क्षण कितनी ही बार वर्ष भर के संवाद से अधिक सत्य बोल देता है। मैंने कपड़े इसलिए नहीं पहन रखे कि देह छिप जाए, इसलिए कि मेरी इच्छा को अवकाश मिल सके। क्या प्रत्येक स्पर्श अपने भीतर किसी अनुपस्थित स्पर्श की स्मृति लेकर नहीं आता! सबसे अधिक भूख देह को स्पर्श की नहीं, देखे जाने की होती है। प्रेम की पूर्णता वहाँ भी जहाँ आत्मा देह का स्वप्न देखने लगती है और देह आत्मा की भाषा समझने लगती है। तब इच्छा पाप, पुण्य, भय और तृष्णा से परे एक शांत नदी बन जाती है, जिसमें दो मनुष्य नहीं उतरते—दो एकांत उतरते हैं और वे लौटते हैं तो रूपांतरित लौटते हैं।

11:11—गुरुवार

तुम्हें लिख रहा हूँ तो लग रहा है कि मेरी इच्छाएँ शब्दों में व्यक्त नहीं हो पातीं। इस क्षण तुम्हारे यहाँ होने का ख़याल मेरे भीतर किसी धीमी आग की तरह सुलग रहा है। मैं तुम्हें छूने की नहीं, छुअन में सतत बने रहने की इच्छा करता हूँ। सुबह के तुम्हारे किसी एक संवाद ने मेरे पूरे दिन को तुम्हारी उपस्थिति से घेरे रखा। तुम्हारे पास होकर मेरे भीतर जो नीरव ठहरता है, वही मेरी सच्ची इच्छा है। तुम्हारी अनुपस्थिति मुझे बताती है कि तुम्हारी उपस्थिति मेरी ज़रूरत है। लेकिन मेरी इच्छा में कोई उतावली नहीं, वह तुम्हारे सान्निध्य की धीमी प्रतीक्षा करना जानती है। 

23:03—गुरुवार 

कैसी रात है! सावन की रात और तुम्हारी कमी—गहरी और गहरी। बाहर बादल बरस रहे हैं, भीतर तुम्हारी स्मृति का ताप बढ़ रहा है। हथेली पर एक बूँद ली तो वह तुम्हारे गीले चुम्बन-सा लगा। बूँदें स्पर्श की अनुभूति बाँटने का डाकिया बनी हुई हैं... और भीगी हवा में आज तुम्हारी साँसों की कल्पना घुली हुई है। बारिश-घर में खिड़की आज भीतरी प्रवेश का दरवाज़ा है। यह क्षण जितना ठंडा है, तुम्हारा ख़याल उतना ही उष्ण। तुम दूर हो, फिर यह रात तुम्हारी उपस्थिति से कैसे भरी है! तुम उस दूर दीखते क्षितिज पर ज़रूर रहती हो, नहीं मालूम... लेकिन है वह कौन-सी दिशा? मानचित्र देखूँगा और रेखा खींचूँगा कि तुम किस दिशा में रहती हो। बारिश कुछ थम गई है, लेकिन तुम्हें अभी देखने की इच्छा नहीं थमी है। नमी ने मेरे भीतर की आकुलता जगा दी है। तुम नहीं हो तो सावन बस ऋतु है, अनुभव नहीं। यह रात बीतेगी तो तुम्हारी प्रतीक्षा का मौसम भी।

15:47—शुक्रवार

सप्ताहांत में हम लौटेंगे। यह विचार इन्हीं दिनों मेरे भीतर किसी साधारण प्रतीक्षा की तरह नहीं, एक शांत आश्वासन की तरह बना हुआ है। लौटना केवल दूरी समाप्त करना नहीं होगा। इतने दिनों तक अपने-अपने समय में बँटे रहने के बाद फिर उसी साझा समय में प्रवेश करना होगा, जिसे हमने वर्षों में धीरे-धीरे बनाया है। तुम जिसे अपने जीवन के एक परिचित हिस्से की तरह जानता हूँ। यही तो है कि तुम्हारी अनुपस्थिति में भी तुम पूरी तरह अनुपस्थित नहीं होतीं। यहाँ भी तो हज़ार छोटी-छोटी चीज़ों में तुम्हारी उपस्थिति बनी ही रहती है। फिर भी यह वास्तविक निकटता का कोई विकल्प तो नहीं। तुम्हारे पास बैठना, बिना कुछ कहे हमारी थकान बाँटना। जीवन में वे दिन आते हैं, जब प्रेम अपनी शुरुआती चमक से आगे निकलकर एक गहरी पहचान बन जाता है। तब होने से अधिक साथ होने का अर्थ महत्त्वपूर्ण हो जाता है। इस एकांत अभी जब स्पर्श की चाहना है, एक टीस, तो उसमें केवल इच्छा नहीं है। इनमें इन वर्षों की स्मृतियाँ हैं—वे दिन जब हम एक-दूसरे के पास थे, वे दिन जब नहीं थे। वे असहमतियाँ, वे अनकहे क्षण, वे साधारण शामें जिन्हें हमने तब साधारण समझा था और अब उनका मूल्य समझ आता है।

देह भी तो स्मृति रखती है। वह उन स्पर्शों को भूलती नहीं जिनमें केवल आकर्षण नहीं, भरोसा भी रहा हो। इन्हीं दिनों हम साथ होंगे तो शायद बहुत कम बोलेंगे। आँखों से खेलेंगे। बाहर वर्षा होगी और भीतर वह परिचित शांति, जो दो ऐसे लोगों के बीच होती है जिन्होंने एक-दूसरे को पर्याप्त समय तक देखा है। अभी तुम्हारे पास होना चाहता हूँ—इच्छा की पूर्ति के लिए नहीं, उस जीवन में होने के लिए जो हमने साथ मिलकर बनाया है। दूरी ने मुझे समझाया है कि प्रेम हमेशा किसी तीव्र क्षण में नहीं रहता। वह उन शांत जगहों में भी रहता है, जहाँ हम एक-दूसरे के साथ बिना किसी प्रयत्न के रह सकते हैं। 

सप्ताहांत में हम लौटेंगे और मैं चाहता हूँ कि बाहर तब भी वर्षा हो।

00:45—शनिवार 

बे-तरतीब बारिश हो रही है और मैं तुम्हारे लिए जॉयस की तरह की कोई चिट्ठी लिखना चाह रहा हूँ...

...तुम्हारी वसना को ऊपर उठाकर तुम्हारे उष्ण अंतर्वस्त्रों को कोमलता से खोलूँगा, फिर तुम्हारे समीप लेटकर आलस्य-भरे स्नेह से तुम्हारे रोमावली के आस-पास चुम्बन आरंभ करूँगा। तुम अस्फुट व्याकुलता से करवट लेने लगोगी, तब मैं अपनी प्रिया के उस अंतरंग स्थल का अधर-स्पर्श करूँगा। तुम निद्रा में ही करुण-स्वर निकालोगी—मंद सीत्कार, मर्मर, उच्छ्वास और कामोन्मत्त श्वासों से स्पंदित होती हुई। तत्पश्चात् मैं अधिक तीव्रता से, अधिक उत्कंठा से, मानो किसी अतृप्त जीव की भाँति, तुम्हें चूमता रहूँगा, जब तक कि तुम्हारा अंग नदी न हो जाए और तुम पूर्ण कामावेश में...

इससे पहले कि मन बावरा हो, विषयांतर करना चाहिए। आओ फ़िलहाल यह अंतरा सुनें—“इस बार सावन दहका हुआ है, इस बार मौसम बहका...”

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