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स्वर्ग के बारे में एक रपट

svarg ke bare mein ek rapat

अनुवाद : सुरेश सलिल

ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

स्वर्ग के बारे में एक रपट

ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

और अधिकज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त

    स्वर्ग में काम का तयशुदा हफ़्ता तीस घंटे का है

    ऊँची तनख़ाहें हैं और क़ीमतें लगातार नीचे जाती हुई

    शारीरिक श्रम थकाने वाला नहीं है (गुरुत्व शक्ति कम होने की

    वजह से)

    लकड़ी चीरना टाइप करने से ज़्यादा मुश्किल नहीं

    सामाजिक प्रणाली टिकाऊ है और हुक्मरान बुद्धिमान

    सचमुच किसी भी मुल्क की तुलना में

    स्वर्ग में आदमी की हालत बेहतर है

    शुरू-शुरू में स्वर्ग की नगर-योजना अलग तरह से तैयार की गई थी

    रोशन चौराहे, गान-मंडलियाँ और भिन्न-भिन्न स्तर के भेदभाव

    लेकिन वह सब आत्मा को शरीर से ठीक-ठीक अलगाने में सक्षम नहीं था

    लिहाज़ा स्वर्ग की साख में गिरावट आई,

    उस सबसे निबटना ज़रूरी था

    ज़रूरी था कि एक हिस्सा कंक्रीट में एक हिस्सा मिट्टी भी मिलाई जाए,

    लिहाज़ा एक बार और उसूल से इधर-उधर होना पड़ा

    बस, आख़िरी

    बार इसका पूर्वानुमान सिर्फ़ जॉन कर पाया 'तुम्हारा पुनरुद्धार होगा'

    यहाँ ईश्वर के दर्शन ज़्यादा लोगों को नहीं हो पाते

    वह सिर्फ़ उन्हीं को दर्शन देता है जो शत-प्रतिशत पवित्र आत्मा हों

    बाक़ी लोग उसके चमत्कारों और उसकी कोपदृष्टि के दृष्टांत सुनते हैं

    कहते हैं, एक एक दिन ईश्वर सभी को दर्शन देगा,

    लेकिन वह शुभ दिन कब आएगा कोई नहीं जानता।

    फ़िलहाल हर शनिवार को दोपहर के वक़्त

    साइरन मीठी-मीठी डकारें लेते हैं

    और देवतुल्य कामगार फ़ैक्टरियों से बाहर निकलते हैं

    भदेस ढंग से, अपने डैने, वायलिन की तरह बग़ल में दबाए हुए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 330)
    • रचनाकार : ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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