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कोहबर : मिथिला की लोक-आस्था की सांस्कृतिक विरासत

कलाएँ मानवीय अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होती हैं। प्राचीन काल से ही मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति कलाओं के विविध रूपों में करता आया है। उसकी कल्पनाओं के आदिम अवशेष आज भी लोक कलाओं में चिह्नित किए जा सकते हैं, जो विकसित अवस्था में पहुँचकर शास्त्रीय या शिष्ट कलाओं के प्रेरणा स्त्रोत बने होंगे। लोक कलाएँ अपनी क्षेत्रीयता के कारण अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं। लोक परंपरा में रेखाओं और आकृतियों के संयोजन से बनाए गए भित्ति चित्र आदिम युग को जानने और समझने के साथ क्षेत्र विशेष की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं, विश्वासों को समझने में मदद करते हैं। सीमित प्राकृतिक संसाधनों से तैयार की गई इन चित्रकलाओं में क्षेत्रीय विविधता के साथ वहाँ के उत्सव, त्योहार, विशेष पर्वों से जुड़ी लोक मान्यताएँ साकार होकर इनको जीवंत बनाते हैं। जैसे विवाह के अवसर पर बनाए जाने वाली कोहबर कला में इस चित्रकला का संबंध महज साज-सज्जा या सौंदर्याकरण से नहीं है, अपितु यह लोक आस्था और श्रद्धा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।

मानव बस्तियों, रीति-रिवाजों और परंपराओं के विकास का इतिहास मिथिला क्षेत्र में अत्यंत समृद्ध और विस्तृत रहा है। प्राचीन काल में यह क्षेत्र मिथिला राज्य के नाम से प्रसिद्ध था। ‘मिथिलांचल’ का प्रथम उल्लेख ‘शतपथ ब्राह्मण’ में मिलता है। बौद्ध, जैन और संस्कृत ग्रंथों में भी इसे एक विशिष्ट धार्मिक क्षेत्र के रूप में वर्णित किया गया है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, यह क्षेत्र कभी घने वनों और दलदली भूभाग से युक्त था, जहाँ अनार्य समुदाय निवास करते थे। बाद में गौतम राहुगण, माधव विदेह तथा वैश्वानर के आगमन के पश्चात यह क्षेत्र कृषि प्रधान बना और क्रमशः आर्य सभ्यता का प्रमुख केंद्र बन गया। (Upendra Thakur, History of Mithila, Mithila Institute, Darbhanga, 1956)

भारत के उत्तरी बिहार स्थित मिथिला क्षेत्र में मधुबनी लोक चित्रकला का उद्भव हुआ। पूरे मिथिला क्षेत्र में चित्रकला के लिए सर्वाधिक प्रचलित शब्द ‘लिखिया’ है, जो संस्कृत शब्द ‘आलेख्य’ से उत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ लेखन और चित्रांकन दोनों होता है।

परंपरागत रूप से ये चित्र त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों तथा विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण अवसरों पर बनाए जाते थे। ब्राह्मण और कायस्थ समुदाय मुख्यतः पौराणिक तथा धार्मिक विषयों को चित्रित करते रहे हैं। मधुबनी चित्रों में दुर्गा, राम और कृष्ण जैसे हिन्दू देवी-देवताओं के साथ-साथ वृक्षों, पक्षियों तथा आकाशीय तत्त्वों जैसे प्राकृतिक प्रतीकों का भी चित्रण मिलता है।

लोकमान्यता है कि कोहबर की शुरुआत श्रीराम और जानकी के विवाह के समय से हुई थी। उस समय राजा जनक ने सीता के स्वयंवर के अवसर पर अपनी नगर को सजाने एवं बारातियों के स्वागत में घरों की दीवारों पर भितिचित्र बनाने का आग्रह किया। उसी समय से लोक परंपरा में इस चित्रकला को विवाह की लोक रीति का अनिवार्य हिस्सा बना दिया गया। आज भी अधिकांश मांगलिक अवसरों पर भूमि चित्र के रूप में अरिपन और भित्तिचित्र (मधुबनी चित्रकला) बनाने की परंपरा देखी जा सकती है। (चौमासा पत्रिका, जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, भोपाल, मार्च-जून 2023, पृष्ठ 66)

मिथिला की विवाह की लोकरीतियाँ बाक़ी क्षेत्रों से अलग व निराली हैं। कारण कि यहाँ चार दिन के लंबे लोकरीतियों व अनुष्ठान के बाद विवाह संपन्न होता है। विवाह की रस्में जिस कक्ष में निभाई जाती हैं, उसको कोहबर कहा जाता है। कोहबर शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है—खोह या कोह यानि गुफ़ा या कमरा, जहाँ वर का निवास स्थान होता है। यह संस्कृत के शब्द ‘कोष्टवर’ का अपभ्रंश भी माना जाता है। मधुबनी चित्रकला भित्ति चित्रांकन है, जबकि कोहबर कला इस अर्थ में अलग है कि ये चित्र विवाह के अवसर पर वर-वधू के विशेष कक्ष में बनाए जाते हैं। वर-वधू कक्ष विशेष में उकेरे गए चित्रों को कोहबर कला के नाम से जाना जाता है।

दो हजार साल से भी प्राचीन इस लोक कला को विश्व के सामने लाने का श्रेय विलियम जी. आर्चर को जाता है। सन् 1934 में बिहार भूकंप से भीषण तबाही ने हज़ारों घर उजाड़ दिए थे। गाँव के गाँव मलबे में तब्दील हो गए थे। भूकंप से मची तबाही का जायजा लेने के लिए मधुबनी ज़िले के ब्रिटिश अधिकारी विलियम जी. आर्चर को भेजा गया। भूकंप प्रभावित गाँव का दौरा करते हुए टूटी दीवारों पर बने चित्रों को देखकर वे हैरान रह गए। घरों की दीवारों पर बने गूढ़ात्मक अभिव्यक्तियों से युक्त इन चित्रों ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया था। उन्होंने इसकी कई तस्वीरों को सन् 1949 में इंडियन आर्ट जर्नल में प्रकाशित करवाया। (चौमासा पत्रिका, जनजातीय लोककला एवं बोली विकास अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, भोपाल, मार्च-जून 2023, पृष्ठ 67)

मिथिला चित्रकला विश्व की उन प्राचीन परंपराओं में से एक है, जिसका विकास स्त्रियों ने किया, जिसे स्त्रियों ने संरक्षित किया और जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित होती रही। मिथिला का आँगन (अंगना) पूर्णतः स्त्रियों का क्षेत्र माना जाता था। गाँवों की स्त्रियाँ विवाह, पर्व और अन्य सांस्कृतिक अवसरों पर सामूहिक रूप से दीवारों पर चित्र बनाती थीं। इसी प्रक्रिया से चित्रकला, लोकगीत और अनेक परंपराओं का विकास हुआ।

कोहबर एक विशेष रूप से सजाया गया पवित्र कक्ष होता है, जिसकी दीवारों पर अत्यंत सूक्ष्म और कलात्मक चित्र बनाए जाते हैं। यह वही स्थान है, जहाँ विवाह के पश्चात नवविवाहित दंपत्ति पहली बार एक-दूसरे से मिलते हैं। समुदाय विशेष की कोहबर चित्रकला में कमल के वृत्ताकार रूप बनाए जाते हैं, जिनके भीतर मानवीय मुख अंकित होते हैं। इन वृत्तों के मध्य से एक ऊर्ध्वाधर तना निकलता है, जिसके शीर्ष पर भी एक समान मुख चित्रित किया जाता है। यह ऊर्ध्वाधर आकृति तालाब की गहराई में जमी कमल की जड़ और तने का प्रतीक है। कमल, जो स्थानीय वर्षा ऋतु में जल से भरे तालाबों से प्रेरित है, उर्वरता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

कोहबर चित्रों में उर्वरता से जुड़े अन्य प्रतीकों का भी समावेश किया जाता है, जैसे सर्प (दिव्यता का प्रतीक), मछली तथा कछुआ (प्रेम का प्रतीक)। सूर्य और चंद्रमा जैसे आकाशीय पिंडों के साथ-साथ देवी-देवताओं को भी विवाह समारोह के साक्षी के रूप में चित्रित किया जाता है। प्रायः कोहबर घर के केंद्र में देवी दुर्गा की प्रतिमा बनाई जाती है, जो विवाह संस्कार की पवित्रता को और अधिक बल प्रदान करती है। इसके चारों ओर पुरैन (कमल की पंखुड़ियों) तथा देवी-देवताओं के चित्र बनाए जाते हैं, जिससे विवाह संस्कार की मंगलमयता बढ़ती है। (Indian Journal Of Traditional Knowledge, Vol 25(2), Feb 2026, Page 193)

यह उल्लेखनीय है कि मिथिला चित्रकला में सभी आयु वर्ग की स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी होती थी। सबसे छोटी लड़कियाँ विभिन्न आकृतियों में रंग भरती थीं, मध्यम आयु की स्त्रियाँ रेखांकन करती थीं और सबसे वरिष्ठ विवाहित स्त्रियाँ, जिन्हें अहिभाती कहा जाता है, दीवार के मध्य में एक शुभ बिंदु अंकित करती थीं। गोसाउनी-का-घर (देवकक्ष) की दीवारों पर चमकीले रंगों से चित्र बनाए जाते हैं। इनमें हरिसौना पूजा चित्र तथा सरोवर चित्र प्रमुख विषय होते हैं, जिनमें मछलियाँ, कछुए और हाथों की छापें अंकित की जाती हैं। गोसाउनी-का-घर के प्रवेश द्वार के चारों ओर फूलों के चित्र बनाए जाते हैं, जो इसकी अनुष्ठानिक शैली को प्रदर्शित करते हैं।

कोहबर घर के भीतर चारों कोनों में नैना जोगिन नामक रहस्यमयी एक-नेत्री स्त्री संरक्षिकाओं का चित्रण किया जाता है। इन्हें विभिन्न वस्तुएँ धारण किए हुए दिखाया जाता है। एक दीवार पर पक्षियों से युक्त बाँस के झुरमुट का चित्र बनाया जाता है, जबकि दूसरी दीवार पर मानव-मुख वाले पुष्पों सहित शैलीबद्ध कमल का पौधा चित्रित किया जाता है, जो चंद्रमा का प्रतीक माना जाता है।

बरामदे के चित्रों में मिथिला के ग्रामीण जीवन के दृश्य प्रदर्शित किए जाते हैं। इनमें भोजन ले जाने वाले पात्र, आम, अनार और कटहल के वृक्ष (जो उर्वरता के प्रतीक हैं), मोरों के प्रणय दृश्य तथा भगवान कृष्ण द्वारा गोपियों के वस्त्र हरण की चंचल लीला का चित्रण किया जाता है। ये चित्र उत्सवों में सम्मिलित लोगों को आकर्षित करते हैं और उर्वरता, आनंद तथा मिथिला की सांस्कृतिक जीवंतता का प्रतीक माने जाते हैं। (Abdul Shaban, F. Vermeylen and C. Handke, Creative industries in India, Taylor & Francis Group, 2022) अनुष्ठानिक महत्त्व के अतिरिक्त, कोहबर घर मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का माध्यम भी है। इसके माध्यम से कला और परंपराएँ जीवित बनी रहती हैं।

कोहबर चित्र बनाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले रंगों में मुख्यतः लाल, पीले, हरे, नीले प्राकृतिक रंग जीवन में उत्साह-प्रसन्नता और हरियाली का प्रतीक हैं। मांगलिक अवसर पर बनाए गए कोहबर चित्रों में काले रंग का प्रयोग निषिद्ध है। चित्र बनाने के लिए बाँस की क़लम या पेड़ की पतली टहनियाँ या माचिस की तीली और आजकल निब वाले पेन का प्रयोग किया जाता है। इस पेंटिंग में कोई भी जगह ख़ाली नहीं छोड़ी जाती। ख़ाली जगहों को ज्यामितीय रेखाओं और पशु पक्षियों, फूल-पत्तियों, बेल-बूटों से भरा जाता है। इन चित्रों में विविध पैटर्न की रेखाओं जिसको कचनी कहा जाता है, की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इन रेखाओं में ठड़ कचनी, तिरछी कचनी, दोहरी कचनी, जंजीरा कचनी, झिलमिल कचनी द्वारा चित्रों की सजीव अभिव्यक्ति की जाती है। कचनी मिथिला चित्रकारी की विशेष पहचान है।

निष्कर्ष रूप में देखे तो कोहबर घर एक पवित्र स्थान है, जहाँ देवी-देवताओं और पूर्वजों का आशीर्वाद नवविवाहित दंपत्ति को प्राप्त होता है, जिससे उनका वैवाहिक जीवन सुखमय और फलदायी बने। कोहबर घर भौतिक और आध्यात्मिक दोनों संसारों का संगम है, जहाँ संपन्न होने वाले संस्कार सांसारिक सीमाओं से ऊपर उठकर धार्मिक और सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण करते हैं। यह मिथिला की सांस्कृतिक दृढ़ता का प्रतीक है और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसकी बहुरंगी विरासत को सुरक्षित रखने का माध्यम भी है।

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