(फ़्रांसिस्को गीय्येन के लिए)
फैली हुई भोर में
इंतज़ार करती वह कसी गिटार
काठ की गहरी आवाज़
उदास
देख उसकी कोलाहल भरी कमर,
आह भरते हैं लोग
धुन से भरी कोख है उसकी
पत्थर को मोम कर देती है।
धधकती है गिटार तनहा
ख़त्म होता जाता है चाँद,
धधकती है आज़ाद
लंबे कोट की परत से मुक्त
छोड़ आई पियक्कड़ को उसकी गाड़ी में,
छोड़ी कैबरे को भी उदास
जहाँ ठंड से मरते हैं लोग
हर रात
सुंदर सर उठता तना हुआ
है वह सार्विक भी, क्यूबाई भी,
बिना अफ़ीम, बिना गाँजा
बिना कोकीन।
चाहे हो वह एक गिटार पुरानी,
बनती नई उस सज़ा में फिर से
जो देने चला है दोस्त उसी का,
बिन छोड़े पीछा!
ऊपर सदा ही, झुकी जो कभी ना,
ला दो उसका हँसना-रोना
जीवन के तन में जैसे
आमीआंता' के नाख़ून गाड़ना।
उठा लो उसको, गिटार वादक,
धो दो शराब से मुँह उसका
और साधो तुम अब उसमें
धुन वह तुम्हारी जो संपूर्ण।
वह धुन है परिपक्व प्रेम की,
धुन है तुम्हारी वह संपूर्ण
खुले भविष्य की धुन है वह
धुन है तुम्हारी वह संपूर्ण
दीवार पर पैर रखे जो निकलती
धुन वह तुम्हारी जो संपूर्ण...
उठा लो उसको, गिटार वादक,
धो दो शराब से मुँह उसका
और साधो तुम अब उसमें
धुन वह तुम्हारी जो संपूर्ण।
- पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 193)
- संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
- प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
- संस्करण : 2006
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